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चीन के सामान के बहिष्कार के चलते बढ़ी मांग, कुम्भकारों के चेहरे खिले
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सकीट में दीवाली को लेकर मिट्टी के दीपक तैयार करती महिलाएं ।
- फोटो : ETAH
सकीट (एटा)। कोरोना के कारण सात माह से बेरोजगार बैठे मिट्टी के बर्तनों का कारोबार करने वाले कुंभकार करवाचौथ व दीपावली के त्योहार को लेकर खुश नजर आ रहे हैं। अबकी बार चीन के सामान के बहिष्कार के चलते मिट्टी के दीपक की मांग बढ़ी है।
नगर के मोहल्ला काजी निवासी कुंभकार इकरार और अजीज बताते हैं कि चार नवंबर को करवाचौथ है। ऐसे में करवा बनाने का कार्य अंतिम चरण में है। इसके बाद रोशनी के त्योहार दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाएंगी। दीपोत्सव पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने को महिलाएं मिट्टी के दीपक खरीदती हैं। इसे बनाने वाले कुम्हारों के चाक ने करीब एक माह से रफ्तार पकड़ ली है। इससे कुम्हारों को आर्थिक संकट से उबरने की उम्मीद जागी है। कुम्हार पूरे दिन चाक से मिट्टी को आकार देने में जुटे हुए हैं। बच्चे व महिलाओं को लगाकर एक दिन में करीब एक हजार दीए और करीब सौ करवा बना लेते हैं। चाक से मिट्टी के दीया, करवा, गोलक, छोटे कलश, मटकी, प्याला बनाने का काम किया जा रहा है।
ताल-तलैया समाप्त होने से नहीं मिलती मिट्टी
अजीज बताते है कि अब बर्तन बनाने के लिए मिट्टी नहीं मिल रही है। ताल तलैया समाप्त होने से मिट्टी नहीं मिलती है। जिससे पुश्तैनी कार्य को जिंदा रखना मुश्किल हो रहा है। बर्तन बनाने के लिए जिस मिट्टी की आवश्यकता पड़ती है, वह हर जगह नहीं मिलती है। इकरार और अजीज ने सरकार से मांग करते हुए कहा है कि सरकार को कुम्हार जाति के लोगों को तालाबों का पट्टा देना चाहिए।
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नगर के मोहल्ला काजी निवासी कुंभकार इकरार और अजीज बताते हैं कि चार नवंबर को करवाचौथ है। ऐसे में करवा बनाने का कार्य अंतिम चरण में है। इसके बाद रोशनी के त्योहार दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाएंगी। दीपोत्सव पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने को महिलाएं मिट्टी के दीपक खरीदती हैं। इसे बनाने वाले कुम्हारों के चाक ने करीब एक माह से रफ्तार पकड़ ली है। इससे कुम्हारों को आर्थिक संकट से उबरने की उम्मीद जागी है। कुम्हार पूरे दिन चाक से मिट्टी को आकार देने में जुटे हुए हैं। बच्चे व महिलाओं को लगाकर एक दिन में करीब एक हजार दीए और करीब सौ करवा बना लेते हैं। चाक से मिट्टी के दीया, करवा, गोलक, छोटे कलश, मटकी, प्याला बनाने का काम किया जा रहा है।
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ताल-तलैया समाप्त होने से नहीं मिलती मिट्टी
अजीज बताते है कि अब बर्तन बनाने के लिए मिट्टी नहीं मिल रही है। ताल तलैया समाप्त होने से मिट्टी नहीं मिलती है। जिससे पुश्तैनी कार्य को जिंदा रखना मुश्किल हो रहा है। बर्तन बनाने के लिए जिस मिट्टी की आवश्यकता पड़ती है, वह हर जगह नहीं मिलती है। इकरार और अजीज ने सरकार से मांग करते हुए कहा है कि सरकार को कुम्हार जाति के लोगों को तालाबों का पट्टा देना चाहिए।
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