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एटा की माटी ने दीं जैन समाज को त्याग की प्रतिमूर्तियां

Mon, 02 Sep 2019 11:42 PM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Mon, 02 Sep 2019 11:42 PM IST
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jain Monk
जैन मुनि का फोटो- अमर उजाला - फोटो : ETAH
एटा। जैन समाज में एटा जिले का विशेष स्थान है। एटा की माटी ने कई दिगंबर संत समाज को दिए, जिन्होंने समाज और धर्म के उत्थान के लिए सुख सुविधाओं का त्याग किया और तपस्या के बल पर पूरे विश्व में जैन धर्म और एटा जिले का डंका बजाया। आज से पर्यूषण पर्व शुरू हो रहे हैं, ऐसे में जिले के गौरव रहे महान संतों का याद करना बनता है। इन संतों ने जैन श्रावकों को धर्म की राह दिखाई, साथ ही जगत के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।
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आचार्य विमल सागर महाराज
जिले के जलेसर विकासखंड के गांव कोसमा में वर्ष 1915 में जन्मे आचार्य विमल सागर ने पूरे विश्व में जैन धर्म की पताका फहराई। बताया जाता है कि आचार्य विमल सागर महाराज ने हेडमास्टर की नौकरी भी की, लेकिन उनका घर-गृहस्थी में मन न लगा। इस पर उन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा ले ली। इसके बाद अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने हजारों भक्तों को जीवन जीने की कला सिखाई। हालांकि आचार्य विमल सागर महराज की समाधि हो चुकी है, लेकिन आज भी जैन श्रावक गुरु उपकारों को समय-समय पर याद करते हैं। गुरु की याद में कोसमा में वात्सल्य आरोग्य धाम का निर्माण किया गया है।
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आचार्य सन्मति सागर
जिले के शिकोहाबाद रोड स्थित गांव फफोतू निवासी प्यारेलाल के पुत्र ओमप्रकाश ने भी स्वात्म कल्याण की लगन लगाकर जैन धर्म का नाम आगे बढ़ाया। जैनेश्वरी दीक्षा के बाद उनको आचार्य सन्मति सागर महाराज नाम मिला। उन्होंने आचार्य महावीर कीर्ति महाराज से शास्त्रों का अध्ययन किया और तपस्या के बल पर समाज को नई पहचान दी। आचार्य सन्मति सागर महीनों तक उपवास रखते थे और महीनों तक मौन रखकर साधना करते थे। उनकी तपस्या का परिणाम है कि आज भी भक्त आचार्य सन्मति सागर को भूलते नहीं हैं।
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उपाध्याय उजर्यंत सागर
शहर के पुरानी बस्ती निवासी बर्तन व्यापारी लाला बंगालीदास जैन के घर में जन्मे राहुल जैन ने भी जैनेश्वरी दीक्षा अंगीकार कर उजर्यंत सागर नाम पाया। उन्होंने जैन श्रावकों को सिखाया कि धर्म की राह पर चलकर मोक्ष को कैसे पाया जाता है? भगवान महावीर के सिद्धांतों का प्रचार प्रसार और त्याग मार्ग को अंगीकार कर वे जिनधर्म की प्रभावना कर रहे हैं।

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इन संतों पर भी समाज को नाज
इन तीन संतों के अलावा एटा के कई श्रावकों ने त्याग मार्ग को अपनाया है। इनमें मुनि विष्णु सागर, मुनि अनुकंपा सागर, मुनि सुपार्श्व सागर, मुनि सुमर सागर, मुनि पदम सागर, मुनि अनन्त सागर, आर्यिका विनीतमती, आर्यिका विव्रांतश्री, आर्यिका मनोमती, आर्यिका नियममती, आर्यिका विज्ञमती, ऐलक विश्वयज्ञ सागर, क्षुल्लक विजय सागर, क्षुल्लिका विलक्षण मती, क्षुल्लक सुरेंद्र सागर, क्षुल्लिका विमोहमती, क्षुल्लिका विर्वधमती, आर्यिका मोक्षमती, आर्यिका श्रेष्ठमती प्रमुख हैं।
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