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ओपीडी में बैठे नहीं और 50 मरीजों का रोज इलाज
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चिकित्सक
- फोटो : demo pic
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एटा। जिला अस्पताल में डाक्टरों की कारस्तानी का एक और मामला सामने आया है। यहां तैनात दंत चिकित्सक छह महीने से अधिक समय से ओपीडी में नहीं बैठा, लेकिन 50 मरीजों के दांतों का इलाज उसने रोजाना किया। यह कमाल उन्होंने सिर्फ कागजों में किया है। दंत चिकित्सक के खिलाफ हुई शिकायत के बाद मामला उजागर हुआ है।
जिला अस्पताल में कार्यरत दंत चिकित्सक पर आरोप है कि उन्होंने अक्तूबर 2018 से कोई मरीज नहीं देखा है, लेकिन फर्जी तरीके से रजिस्टर में हर रोज 40 से 50 मरीजों का इलाज दर्शाया गया है। दंत चिकित्सक डॉ. जयेश करोली सीएमएस के खास बताए जाते हैं, यही वजह है कि सीएमएस छुट्टी अथवा अस्पताल से बाहर जाते हैं तो उन्हीं को प्रभारी सीएसएस का चार्ज दे दिया जाता है। सीएमएस की मौजूदगी में भी वह ओपीडी में नहीं बैठते हैं और सरकारी कामकाज भी इनके हस्ताक्षरों से होते हैं।
बीडीएस को नहीं मिल सकता सीएमएस का चार्ज
नियमानुसार बीडीएस चिकित्सक को सीएमएस का चार्ज नहीं दिया जा सकता है। प्रभारी सीएमएस बनाने के लिए एमबीबीएस होना जरूरी है, लेकिन जिला अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से बीडीएस सर्जन लंबे समय से मरीजों का उपचार करने से बच रहा है।
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हस्ताक्षरों में भी किया गोलमाल
उपस्थिति रजिस्टर में दंत चिकित्सक आए दिन अस्पताल से गायब रहते हैं। हस्ताक्षर रजिस्टर में पहले सीएल लगी होती हैं, लेकिन बाद में गोलमाल कर हस्ताक्षर कर दिए जाते हैं। यह सबूत रजिस्टर खुद बयां कर रहा है। इससे पहले भी अन्य चिकित्सकों के ओवर राइटिंग हस्ताक्षर होने का मामला सामने आया था। पिछले दिनों डीएम ने निरीक्षण के दौरान गैरहाजिरी पर हस्ताक्षर होने का मामला पकड़ा था।
जनप्रतिनिधि भी कर चुके हैं शिकायत
जिला अस्पताल में तैनात चिकित्सकों की लापरवाही की शिकायत जनप्रतिनिधि भी प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से कर चुके हैं। राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने जिला योजना समिति की बैठक में भी चिकित्सकों की गैरहाजिरी पर नाराजगी जाहिर की थी, लेकिन अस्पताल के डाक्टरों पर कोई असर नहीं पड़ सका है।
जिला अस्पताल में चिकित्सकों की काफी कमी है, ऐसे में दंत चिकित्सक की ओर से मरीजों को नहीं देखना गंभीर मामला है। वह प्रशासनिक कार्य में व्यस्त ज्यादा रहते हैं, जबकि मरीजों को देखना चाहिए। दंत चिकित्सक को सीएमएस नहीं बनाया जा सकता, लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है, मामले की जांच कराई जाएगी और उच्चाधिकारियों को भी लिखा जाएगा।
डॉ. अजय अग्रवाल, सीएमओ।
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जिला अस्पताल में कार्यरत दंत चिकित्सक पर आरोप है कि उन्होंने अक्तूबर 2018 से कोई मरीज नहीं देखा है, लेकिन फर्जी तरीके से रजिस्टर में हर रोज 40 से 50 मरीजों का इलाज दर्शाया गया है। दंत चिकित्सक डॉ. जयेश करोली सीएमएस के खास बताए जाते हैं, यही वजह है कि सीएमएस छुट्टी अथवा अस्पताल से बाहर जाते हैं तो उन्हीं को प्रभारी सीएसएस का चार्ज दे दिया जाता है। सीएमएस की मौजूदगी में भी वह ओपीडी में नहीं बैठते हैं और सरकारी कामकाज भी इनके हस्ताक्षरों से होते हैं।
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बीडीएस को नहीं मिल सकता सीएमएस का चार्ज
नियमानुसार बीडीएस चिकित्सक को सीएमएस का चार्ज नहीं दिया जा सकता है। प्रभारी सीएमएस बनाने के लिए एमबीबीएस होना जरूरी है, लेकिन जिला अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से बीडीएस सर्जन लंबे समय से मरीजों का उपचार करने से बच रहा है।
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हस्ताक्षरों में भी किया गोलमाल
उपस्थिति रजिस्टर में दंत चिकित्सक आए दिन अस्पताल से गायब रहते हैं। हस्ताक्षर रजिस्टर में पहले सीएल लगी होती हैं, लेकिन बाद में गोलमाल कर हस्ताक्षर कर दिए जाते हैं। यह सबूत रजिस्टर खुद बयां कर रहा है। इससे पहले भी अन्य चिकित्सकों के ओवर राइटिंग हस्ताक्षर होने का मामला सामने आया था। पिछले दिनों डीएम ने निरीक्षण के दौरान गैरहाजिरी पर हस्ताक्षर होने का मामला पकड़ा था।
जनप्रतिनिधि भी कर चुके हैं शिकायत
जिला अस्पताल में तैनात चिकित्सकों की लापरवाही की शिकायत जनप्रतिनिधि भी प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से कर चुके हैं। राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने जिला योजना समिति की बैठक में भी चिकित्सकों की गैरहाजिरी पर नाराजगी जाहिर की थी, लेकिन अस्पताल के डाक्टरों पर कोई असर नहीं पड़ सका है।
जिला अस्पताल में चिकित्सकों की काफी कमी है, ऐसे में दंत चिकित्सक की ओर से मरीजों को नहीं देखना गंभीर मामला है। वह प्रशासनिक कार्य में व्यस्त ज्यादा रहते हैं, जबकि मरीजों को देखना चाहिए। दंत चिकित्सक को सीएमएस नहीं बनाया जा सकता, लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है, मामले की जांच कराई जाएगी और उच्चाधिकारियों को भी लिखा जाएगा।
डॉ. अजय अग्रवाल, सीएमओ।