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नौकरी छोड़ गांव के बच्चों का भविष्य संवारने में जुटे आलोक
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मारहरा (एटा)। नोएडा में एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले आलोक लोधी को आराम की जिंदगी रास नहीं आई। चिंता अपने क्षेत्र के गरीब बच्चों के भविष्य की सताती थी। चार साल पहले नौकरी को अलविदा कहा और अपने गांव नगला कलुआ आकर शिक्षा की ज्योति जलाना शुरू कर दिया। अभिभावकों को जागरूक कर बच्चों को निशुल्क पढ़ाने में जुट गए। करीब तीन हजार बच्चों को पढ़ा चुके हैं। उनका उद्देश्य गांव के गरीब होनहार बच्चों को अच्छी दिशा प्रदान कर उनका भविष्य संवारना है।
आलोक विज्ञान वर्ग से बीएससी करने के बाद बीएड, यूपी टीईटी, सीटीईअी, सुपर टेट क्वालीफाई कर चुके हैं। करीब नौ साल पहले यूएस की एक मल्टीनेशनल कंपनी में उन्हें प्रोसेज डेवलप पद पर नौकरी मिली। वेतन मासिक 65 हजार रुपये था। यूं तो गांव से आगे बढ़कर शहर में अच्छी नौकरी मिलने का सपना पूरा हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद कसक गांव के अन्य बच्चों को लेकर हुई। इसी उधेड़बुन में पांच साल नौकरी करने के बाद 2018 में इस्तीफा दे आए। यहां आकर अपनी खेती संभाली और अपने व आसपास के गांव के गरीब परिवारों के बच्चों को पढ़ाने के लिए अभिभावकों से संपर्क करना शुरू किया। शुरूआत कठिन रही, अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें समझाकर सहमत किया और बच्चों को गांव में पढ़ाना शुरू कर दिया।
कोरोना काल में विद्यालय बंद हुए तो उनकी पाठशाला बच्चों के लिए काफी फायदेमंद रही। नगला कलुआ से लेकर नोजलपुर, करुआमई, मिरहची मारहरा तक पहुंचकर बच्चों को पढ़ाते रहे। यह सिलसिला जारी है। इस साल दो बच्चों के सैनिक स्कूल में प्रवेश को वह प्रारंभिक सफलता मानते हैं। वह कहते हैं कि पढ़ाई से ही आर्थिक और सामाजिक स्थिति में बदलाव लाया जा सकता है। इसलिए गरीब परिवार के बच्चों के लिए अच्छी पढ़ाई बेहद जरूरी है। स्कूल के बाद उन्हें अतिरिक्त कोचिंग के रूप में पढ़ने का मौका मिलेगा तो निश्चित रूप से वह आगे बढ़ेंगे। संवाद
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एक पुस्तकालय शुरू, दूसरे की तैयारी
आलोक ने अपने व्यक्तिगत प्रयास से गांव अथैया में पुस्तकालय बनवाया है। यहां सामान्य सिलेबस के अलावा प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। जिन्हें पढ़कर बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें। अब इसी तरह का पुस्तकालय पिदौरा में खोलने की तैयारी है।
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आलोक विज्ञान वर्ग से बीएससी करने के बाद बीएड, यूपी टीईटी, सीटीईअी, सुपर टेट क्वालीफाई कर चुके हैं। करीब नौ साल पहले यूएस की एक मल्टीनेशनल कंपनी में उन्हें प्रोसेज डेवलप पद पर नौकरी मिली। वेतन मासिक 65 हजार रुपये था। यूं तो गांव से आगे बढ़कर शहर में अच्छी नौकरी मिलने का सपना पूरा हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद कसक गांव के अन्य बच्चों को लेकर हुई। इसी उधेड़बुन में पांच साल नौकरी करने के बाद 2018 में इस्तीफा दे आए। यहां आकर अपनी खेती संभाली और अपने व आसपास के गांव के गरीब परिवारों के बच्चों को पढ़ाने के लिए अभिभावकों से संपर्क करना शुरू किया। शुरूआत कठिन रही, अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें समझाकर सहमत किया और बच्चों को गांव में पढ़ाना शुरू कर दिया।
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कोरोना काल में विद्यालय बंद हुए तो उनकी पाठशाला बच्चों के लिए काफी फायदेमंद रही। नगला कलुआ से लेकर नोजलपुर, करुआमई, मिरहची मारहरा तक पहुंचकर बच्चों को पढ़ाते रहे। यह सिलसिला जारी है। इस साल दो बच्चों के सैनिक स्कूल में प्रवेश को वह प्रारंभिक सफलता मानते हैं। वह कहते हैं कि पढ़ाई से ही आर्थिक और सामाजिक स्थिति में बदलाव लाया जा सकता है। इसलिए गरीब परिवार के बच्चों के लिए अच्छी पढ़ाई बेहद जरूरी है। स्कूल के बाद उन्हें अतिरिक्त कोचिंग के रूप में पढ़ने का मौका मिलेगा तो निश्चित रूप से वह आगे बढ़ेंगे। संवाद
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एक पुस्तकालय शुरू, दूसरे की तैयारी
आलोक ने अपने व्यक्तिगत प्रयास से गांव अथैया में पुस्तकालय बनवाया है। यहां सामान्य सिलेबस के अलावा प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। जिन्हें पढ़कर बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें। अब इसी तरह का पुस्तकालय पिदौरा में खोलने की तैयारी है।