{"_id":"671fe7005732018e0d00f1ad","slug":"mobile-addiction-children-becoming-hyperactive-risking-their-lives-if-they-refuse-deoria-news-c-208-1-deo1004-138691-2024-10-29","type":"story","status":"publish","title_hn":"Deoria News: मोबाइल की लत... हाइपर एक्टिव हो रहे बच्चे, मना करने पर दे रहे जान तका","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Deoria News: मोबाइल की लत... हाइपर एक्टिव हो रहे बच्चे, मना करने पर दे रहे जान तका
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
देवरिया। अगर आपका बच्चा मोबाइल पर पढ़ाई करता है या ऑनलाइन गेम खेलता है, तो उनकी निगरानी जरूर करें। कहीं ऐसा न हो कि उसे धीरे-धीरे मोबाइल की लत लग जाए। विशेषज्ञों की मानें तो यह लत उन्हें हाइपर एक्टिव बना देती है, जिससे बच्चों में अटेंशन की कमी हो जाती है। किसी कारण से जब वे कुंठित होते हैं तो गुस्सा आता है और इस गुस्से को निकालने में कई बार वे जानलेवा कदम भी उठा लेते हैं।
मनोविज्ञान चिकित्सक अंबु पांडेय कहती हैं कि मोबाइल गेम की लत को एक डिसऑर्डर माना गया है। निस्संदेह, यह मन-मस्तिष्क के अस्त-व्यस्त होने की स्थिति ही है कि बड़ों की सलाह मानने की बजाय बच्चे ऐसे खौफनाक कदम उठा ले रहे हैं। चिंताजनक यह भी है कि अभिभावकों के लिए बच्चों को इस मन:स्थिति से बाहर निकालना बड़ी समस्या बन गई है। माता-पिता स्वयं भय में रहते हैं। यह डर बाल मन की नासमझी के चलते आत्मघाती कदम उठा लेने का ही नहीं, बच्चों के आपराधिक गतिविधियों की ओर प्रवृत्त होने का भी है। ऑनलाइन गेम में पैसे गंवाने या ठगी का शिकार होने पर बच्चे अपराध करने से भी नहीं पीछे हटते हैं। मनोविज्ञान चिकित्सक की मानें तो मोबाइल पर बहुत ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों में सामाजिकता खत्म हो जाती है। अपराध करने और असहज मानवीय अनुभूतियों तक को समझने के बजाय दुस्साहसी कदम उठाने वाले बच्चों के बढ़ते उदाहरण इन्हीं बातों को पुख्ता करते हैं।
संत विनोबा पीजी कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ.तूलिका पांडेय कहती हैं कि आजकल के बच्चों व युवा वर्ग के अंदर कुंठा बर्दाश्त करने की क्षमता कम हो गई है। इसे मनोविज्ञान की भाषा में लो फ्रस्ट्रेशन टाॅलरेंस कहते हैं। ऊपर से मोबाइल की लत उनके अटेंशन को कम कर रही है, जिस कारण वे जल्दी उग्र हो जाते हैं और सही फैसला नहीं लेे पाते। ऐसे में कभी किसी बात पहर डांटे जाते हैं तो वह डांटने वालों की अपेक्षा खुद को नुकसान पहुंचा लेते हैं। इसलिए ऐसे बच्चों की निगरानी बेहद जरूरी है, जो मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
देवरिया। अगर आपका बच्चा मोबाइल पर पढ़ाई करता है या ऑनलाइन गेम खेलता है, तो उनकी निगरानी जरूर करें। कहीं ऐसा न हो कि उसे धीरे-धीरे मोबाइल की लत लग जाए। विशेषज्ञों की मानें तो यह लत उन्हें हाइपर एक्टिव बना देती है, जिससे बच्चों में अटेंशन की कमी हो जाती है। किसी कारण से जब वे कुंठित होते हैं तो गुस्सा आता है और इस गुस्से को निकालने में कई बार वे जानलेवा कदम भी उठा लेते हैं।
मनोविज्ञान चिकित्सक अंबु पांडेय कहती हैं कि मोबाइल गेम की लत को एक डिसऑर्डर माना गया है। निस्संदेह, यह मन-मस्तिष्क के अस्त-व्यस्त होने की स्थिति ही है कि बड़ों की सलाह मानने की बजाय बच्चे ऐसे खौफनाक कदम उठा ले रहे हैं। चिंताजनक यह भी है कि अभिभावकों के लिए बच्चों को इस मन:स्थिति से बाहर निकालना बड़ी समस्या बन गई है। माता-पिता स्वयं भय में रहते हैं। यह डर बाल मन की नासमझी के चलते आत्मघाती कदम उठा लेने का ही नहीं, बच्चों के आपराधिक गतिविधियों की ओर प्रवृत्त होने का भी है। ऑनलाइन गेम में पैसे गंवाने या ठगी का शिकार होने पर बच्चे अपराध करने से भी नहीं पीछे हटते हैं। मनोविज्ञान चिकित्सक की मानें तो मोबाइल पर बहुत ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों में सामाजिकता खत्म हो जाती है। अपराध करने और असहज मानवीय अनुभूतियों तक को समझने के बजाय दुस्साहसी कदम उठाने वाले बच्चों के बढ़ते उदाहरण इन्हीं बातों को पुख्ता करते हैं।
विज्ञापन
संत विनोबा पीजी कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ.तूलिका पांडेय कहती हैं कि आजकल के बच्चों व युवा वर्ग के अंदर कुंठा बर्दाश्त करने की क्षमता कम हो गई है। इसे मनोविज्ञान की भाषा में लो फ्रस्ट्रेशन टाॅलरेंस कहते हैं। ऊपर से मोबाइल की लत उनके अटेंशन को कम कर रही है, जिस कारण वे जल्दी उग्र हो जाते हैं और सही फैसला नहीं लेे पाते। ऐसे में कभी किसी बात पहर डांटे जाते हैं तो वह डांटने वालों की अपेक्षा खुद को नुकसान पहुंचा लेते हैं। इसलिए ऐसे बच्चों की निगरानी बेहद जरूरी है, जो मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं।
विज्ञापन