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नहीं रहे एमए लारी
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पूर्व मंत्री एमए लारी।
- फोटो : SALEMPUR
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गंगा-जमुनी तहजीब के मिसाल थे एमए लारी
देवरिया। युवा तुर्क नेता के रूप में उभरे पूर्व मंत्री एमए लारी ने अंतिम सांस लेने तक अपनी शर्तों पर राजनीतिक पारी खेली। सत्ता हासिल करने की चाहत में कभी भी उन्होंने पार्टी की नीतियों से कभी समझौता नहीं किया। राह चलते लोगों से मिलना और कुशलक्षेम पूछना उनके स्वभाव में शामिल था। जाति धर्म से ऊपर उठकर सभी वर्ग के चहेते बने रहे।
लार के रहने वाले पूर्व मंत्री एमए लारी का बचपन का अधिकांश वक्त भले ही लखनऊ में बीता, लेकिन लार से उनका काफी लगाव था। युवा नेता के रूप में उभरे एमए लारी लखनऊ जाने वाले गांव जवार के लोगों की मदद करते थे। 1985 में सलेमपुर विधानसभा से जनता पार्टी से चुनाव लड़े, लेकिन सफलता नहीं मिली। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के करीबियों में एमए लारी एक थे। जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो एमए लारी विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) चुने गए। उसके बाद पर्यटन मंत्री 1990 से 96 तक रहे। मंत्री बनने के बाद सलेमपुर विधानसभा के दीर्घेश्वर नाथ मंदिर (मझौलीराज) का सुंदरीकरण कराया। इसके अलावा क्षेेत्र के लिए काफी विकास किया। उसके अपने छोटे भाई मुराद लारी को बसपा से चुनाव लड़ाकर विधायक बनाए। मुराद के निधन के बाद उनकी बीवी गजाला लारी को बसपा से चुनाव लड़ाकर विधायक बनाया और लोगों का सहानुभूति भी इस चुनाव में मिली। वर्ष 2007 में बसपा से सलेमपुर विधानसभा से चुनाव लड़े जिसमें हार का सामना करना पड़ा था और सपा से चुनाव लड़ रहीं गजाला लारी की जीत हुई थी। अन्य राजनीतिक दलों से एमए लारी को बुलावा आया, लेकिन उन्होंने बसपा से नाता नहीं तोड़ा। राह चलते गरीबों की मदद करना और उनके लिए दो कदम चलना उनकी दिनचर्या में शामिल रही। कई बार लारी हाउस पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का भी आगमन हुआ।
‘पैदल लारी’ के नाम से लखनऊ में थे चर्चित
एमए लारी लखनऊ में पैदल ही चलते थे। इसकी वजह से लोगों ने इन्हें प्यार से ‘पैदल लारी’ कहते थे। घर में भी लोग पैदल लारी के नाम से पुकारते थे। जाति धर्म की भी राजनीति नहीं किए और इलाके में अपनी ख्याति स्थापित की।
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मुझे लार में ही करना सुपुर्दे ए खाक
एमए लारी राजनीति में रहते हुए खुदैरा बीबी मकदूम गर्ल्स कॉलेज की स्थापना की। ताकि क्षेत्र के लड़कियों को बेहतर शिक्षा मिल सके। खुद वह कॉलेज में समय देते थे। बीमार होने के बाद वह घरवालों से कहा था कि निधन के बाद उनकी मिट्टी लार में होगी, लखनऊ में नहीं।
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देवरिया। युवा तुर्क नेता के रूप में उभरे पूर्व मंत्री एमए लारी ने अंतिम सांस लेने तक अपनी शर्तों पर राजनीतिक पारी खेली। सत्ता हासिल करने की चाहत में कभी भी उन्होंने पार्टी की नीतियों से कभी समझौता नहीं किया। राह चलते लोगों से मिलना और कुशलक्षेम पूछना उनके स्वभाव में शामिल था। जाति धर्म से ऊपर उठकर सभी वर्ग के चहेते बने रहे।
लार के रहने वाले पूर्व मंत्री एमए लारी का बचपन का अधिकांश वक्त भले ही लखनऊ में बीता, लेकिन लार से उनका काफी लगाव था। युवा नेता के रूप में उभरे एमए लारी लखनऊ जाने वाले गांव जवार के लोगों की मदद करते थे। 1985 में सलेमपुर विधानसभा से जनता पार्टी से चुनाव लड़े, लेकिन सफलता नहीं मिली। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के करीबियों में एमए लारी एक थे। जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो एमए लारी विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) चुने गए। उसके बाद पर्यटन मंत्री 1990 से 96 तक रहे। मंत्री बनने के बाद सलेमपुर विधानसभा के दीर्घेश्वर नाथ मंदिर (मझौलीराज) का सुंदरीकरण कराया। इसके अलावा क्षेेत्र के लिए काफी विकास किया। उसके अपने छोटे भाई मुराद लारी को बसपा से चुनाव लड़ाकर विधायक बनाए। मुराद के निधन के बाद उनकी बीवी गजाला लारी को बसपा से चुनाव लड़ाकर विधायक बनाया और लोगों का सहानुभूति भी इस चुनाव में मिली। वर्ष 2007 में बसपा से सलेमपुर विधानसभा से चुनाव लड़े जिसमें हार का सामना करना पड़ा था और सपा से चुनाव लड़ रहीं गजाला लारी की जीत हुई थी। अन्य राजनीतिक दलों से एमए लारी को बुलावा आया, लेकिन उन्होंने बसपा से नाता नहीं तोड़ा। राह चलते गरीबों की मदद करना और उनके लिए दो कदम चलना उनकी दिनचर्या में शामिल रही। कई बार लारी हाउस पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का भी आगमन हुआ।
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‘पैदल लारी’ के नाम से लखनऊ में थे चर्चित
एमए लारी लखनऊ में पैदल ही चलते थे। इसकी वजह से लोगों ने इन्हें प्यार से ‘पैदल लारी’ कहते थे। घर में भी लोग पैदल लारी के नाम से पुकारते थे। जाति धर्म की भी राजनीति नहीं किए और इलाके में अपनी ख्याति स्थापित की।
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मुझे लार में ही करना सुपुर्दे ए खाक
एमए लारी राजनीति में रहते हुए खुदैरा बीबी मकदूम गर्ल्स कॉलेज की स्थापना की। ताकि क्षेत्र के लड़कियों को बेहतर शिक्षा मिल सके। खुद वह कॉलेज में समय देते थे। बीमार होने के बाद वह घरवालों से कहा था कि निधन के बाद उनकी मिट्टी लार में होगी, लखनऊ में नहीं।