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Deoria News: भगवान भाव के भूखे हैं, पूजा के नहीं
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क्षेत्र के बसावन चक गांव में श्रीमद्भागवत कथा हुई
संवाद न्यूज एजेंसी
बनकटा/ रामपुर बुजुर्ग। क्षेत्र के बसावन चक गांव में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन रविवार को वृंदावन की कथा वाचिका श्यामा किशोरी शास्त्री ने कहा कि भाव से की गई भक्ति अहंकार और घमंड के चढ़ावे से कहीं बेहतर होती है। भगवान भाव के भूखे हैं, पूजा के नहीं। कथा का रसपान कराते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान शबरी के जूठे बेर भी भाव से खिलाने पर स्वीकार किया। भगवान श्रीकृष्ण ने भी दुर्योधन के मेवों को त्यागकर विधुर के घर साग खाना पसंद किया। यहां तक कि उन्होंने विधुरानी द्वारा भाव से खिलाए गए केलों के छिलकों को भी रुचिपूर्ण खाया। मर्यादा के विरुद्ध आचरण तथा मर्यादा का उल्लंघन करने के फलस्वरूप प्रत्येक जीव को ऋषि द्वारा नित्य प्रति सात दिन में मरने का श्राप मिलता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण चक्रवर्ती सम्राट परीक्षित हैं। प्रत्येक जीव का नैतिक कर्तव्य बनता है कि परीक्षित और सुकदेव जैसे परमवंदनीय गुरु के चरण कमल सन्निधि प्राप्त करते हुए गुरु के बताए मार्ग का अनुसरण करें। कलियुग में इसका एकमात्र सर्वोत्कृष्ट साधन है। कथा के क्रम में महाराज चतुर्थ स्कंध की कथा करते हुए यथा क्रम से धर्म अर्थ काम मोक्ष की कथा का निरूपण किया, जिसमें सती चरित्र के माध्यम से दक्ष के अभिमान को दूर करने का भी वर्णन किया। कथा में प्रमुख रूप से मुख्य यजमान रामदयाल शर्मा, पूनम शर्मा, मुसाफिर, चंदन, रजनीश, ओमकार, धनंजय और राजेश शर्मा सहित क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु शामिल रहे।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बनकटा/ रामपुर बुजुर्ग। क्षेत्र के बसावन चक गांव में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन रविवार को वृंदावन की कथा वाचिका श्यामा किशोरी शास्त्री ने कहा कि भाव से की गई भक्ति अहंकार और घमंड के चढ़ावे से कहीं बेहतर होती है। भगवान भाव के भूखे हैं, पूजा के नहीं। कथा का रसपान कराते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान शबरी के जूठे बेर भी भाव से खिलाने पर स्वीकार किया। भगवान श्रीकृष्ण ने भी दुर्योधन के मेवों को त्यागकर विधुर के घर साग खाना पसंद किया। यहां तक कि उन्होंने विधुरानी द्वारा भाव से खिलाए गए केलों के छिलकों को भी रुचिपूर्ण खाया। मर्यादा के विरुद्ध आचरण तथा मर्यादा का उल्लंघन करने के फलस्वरूप प्रत्येक जीव को ऋषि द्वारा नित्य प्रति सात दिन में मरने का श्राप मिलता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण चक्रवर्ती सम्राट परीक्षित हैं। प्रत्येक जीव का नैतिक कर्तव्य बनता है कि परीक्षित और सुकदेव जैसे परमवंदनीय गुरु के चरण कमल सन्निधि प्राप्त करते हुए गुरु के बताए मार्ग का अनुसरण करें। कलियुग में इसका एकमात्र सर्वोत्कृष्ट साधन है। कथा के क्रम में महाराज चतुर्थ स्कंध की कथा करते हुए यथा क्रम से धर्म अर्थ काम मोक्ष की कथा का निरूपण किया, जिसमें सती चरित्र के माध्यम से दक्ष के अभिमान को दूर करने का भी वर्णन किया। कथा में प्रमुख रूप से मुख्य यजमान रामदयाल शर्मा, पूनम शर्मा, मुसाफिर, चंदन, रजनीश, ओमकार, धनंजय और राजेश शर्मा सहित क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु शामिल रहे।