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आजादी का अमृत महोत्सव: ब्रिटिश हुकूमत की याद ताजा करती है चकिया कोठी, यहां अंग्रेजों ने किया था राज

Sat, 13 Aug 2022 08:33 AM IST
vivek shukla अनिरुद्ध कुमार गुप्ता, देवरिया (प्रतापपुर)।
अनिरुद्ध कुमार गुप्ता, देवरिया (प्रतापपुर)। Published by: vivek shukla Updated Sat, 13 Aug 2022 08:33 AM IST
सार

17वीं शताब्दी में सर्वप्रथम एआरसी वाटसन एवं टायस मार्किन मेकडानल्ड नाम के अंग्रेज सपरिवार यहां आए। ब्रिटिश शासन के दौरान क्षेत्र में तकरीब 400 एकड़ जमीन पर अंग्रेजों ने खेती भी की तथा प्रतापपुर में चीनी मिल स्थापित की।

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Chakia Kothi is reminiscent of British rule in Deoria
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भाटपाररानी तहसील मुख्यालय से 16 किलोमीटर की दूरी पर भिंगारी से भवानी छापर मार्ग पर स्थित चकिया कोठी देश की आजादी से पूर्व ब्रिटिश हुकूमत का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। यहां पर गोरों की तूती बोलती थी तथा क्षेत्र में उनकी हुकूमत चलती थी। टूट रही  इमारत आज भी ब्रिटिश हुकूमत की याद ताजा करती है।

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ईस्ट इंडिया कंपनी की करीब सन 1600 ईसवी में स्थापना के बाद अंग्रेजों ने संपूर्ण भारतवर्ष में अपना पांव पसारना शुरू कर दिया था। इस दौरान गोरों ने अपनी हुकूमत चलाने के लिए क्षेत्र के कुछ स्थानों पर कोठियों का निर्माण  कराया, जिसमें चकिया कोठी प्रमुख रही है। इसके अलावा अंग्रेजों ने प्रतापपुर व रतसिया में भी कोठी का निर्माण कराया। चकिया कोठी अंग्रेजी सत्ता संचालन का केंद्र बिंदु रही है।
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बताया जाता है कि 17वीं शताब्दी में सर्वप्रथम एआरसी वाटसन एवं टायस मार्किन मेकडानल्ड नाम के अंग्रेज सपरिवार यहां आए। ब्रिटिश शासन के दौरान क्षेत्र में तकरीब 400 एकड़ जमीन पर अंग्रेजों ने खेती भी की तथा प्रतापपुर में चीनी मिल स्थापित की। वहीं चकिया कोठी स्थित फार्म में धान, गेहूं, मक्का, गन्ना के अलावा नील की खेती प्रमुख थी। अंग्रेजों ने यहां नील बनाने के लिए ब्रिटिश इंडिगो फैक्ट्री भी स्थापित की और यहां से नील विदेशों में भेजा जाने लगा।
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अंग्रेज यहां लोगों पर जुल्मों सितम बरसाते थे। जबकि चकिया कोठी के अंग्रेज नित्य घोड़े पर सवार होकर लाल पगड़ी बांधकर गांव गांव में घूम घूम कर लोगों का हाल-चाल जानते थे। क्षेत्र के पिछड़ेपन को देखते हुए अंग्रेजों ने यहां 1936 में एक अस्पताल व एक स्कूल की भी स्थापना की। प्रमुख अंग्रेज अधिकारी एफ वकील के बाद 1940 में मेजर एआर कैंट अंतिम प्रशासक बनकर यहां आए और अपने मित्रवत व्यवहार के कारण क्षेत्रीय जनता में वह काफी लोकप्रिय रहे।


इसी बीच 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसमें भारत माता को आजादी के दीवानों ने जान की प्रवाह किए बगैर जगह-जगह अंग्रेजों की कोठियां लूटनी शुरू कर दी। इसी क्रम में क्रांतिकारी चकिया कोठी भी लूटने आ पहुंचे। कैंट की उदारवादी नीति के चलते चकिया कोठी के आस पास के ग्राम राजपुर, दीस्तोवली, सिरसिया पवार, करजनिया, पिपरा बघेल, भगतपुरा, भवानी छापर, बलिवन गांव के सैकड़ों लोगों ने कोठी को लूटने से बचा लिया था। जिसके एवज में कैंट ने बचाव में आए लोगों को इनाम भी दिया था। लूटने से कोठी बच जाने से गदा गद मेजर कैंट ने स्वयं तिरंगा फहरा कर भारत माता का जयकारा लगाया था।

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