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कमीशन के खेल में नियत खराब, हर साल बदल देते हैं किताब

Mon, 08 Apr 2019 10:55 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 08 Apr 2019 10:55 PM IST
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कमीशन के खेल में नियत खराब, हर साल बदल देते हैं किताब
कमीशन के खेल में हर साल बदल देते हैं किताब
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सीबीएसई से जुड़े स्कूल सेलेबस में एनसीईआरटी की किताबें ही कर सकते हैं शामिल
हर साल किताब बदले जाने से अभिभावक परेशान, स्टेशनरी की अलग से बनी है लिस्ट
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। नए सत्र में प्रवेश शुरू होते ही शहर के प्राइवेट स्कूलों में किताब लेने के नाम पर अभिभावकों को जमकर चूना लगाया जा रहा है। स्कूल वाले हर साल किताब बदल दे रहे हैं। कमीशन के चक्कर में नियमों का खुलेआम माखौल उड़ाते हुए निजी प्रकाशकों की ही किताबें लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। आलम यह है कि छात्रों के प्रयोग में आने वाली स्टेशनरी की भी उन्होंने सूची बना रखी है। इससे अलग ब्रांड का सामान लेने पर छात्रों को डांट सुननी पड़ती है।
शहर के प्राइवेट स्कूलों की मनमानी से अभिभावक खासे परेशान हैं। सीबीएसई बोर्ड से जुड़े स्कूल पाठ्यक्रम में एनसीईआरटी की ही किताबें शामिल कर सकते हैं, जबकि प्राइवेट स्कूल कमीशन के फेर में निजी प्रकाशकों की किताबें चलवा रहे हैं। निजी प्रकाशक अपनी किताबें लागू करवाने के लिए स्कूलों को कमीशन देते हैं। स्कूलों को भी संबंधित दुकानदारों से 10 से लेकर 30 प्रतिशत कमीशन का लाभ मिलता हैं। राघवनगर, कसया बाईपास रोड, भटवलिया, सोन्दा, हनुमान मंदिर, कसया रोड, पुरवा चौराहा, हाटा रोड में स्थित स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से कहा गया है कि निजी प्रकाशकों की किताबें ही खरीदें। जिनकी कीमत पांच से लेकर सात हजार रुपये तक है। वह बाकायदा अभिभावकों को लिस्ट देकर मौखिक तौर बता देते हैं कि किस दुकान से किताबें खरीदनी हैं।
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बेचने के लिए शिक्षकों की लगाई है ड्यूटी
सीबीएसई, सीआईएससीई से मान्यता प्राप्त स्कूलों ने किताबें, स्टेशनरी बेचने के लिए अपने यहां रखे शिक्षकों की ड्यूटी भी लगा रखी है। कई स्कूलों में तो परिसर के अंदर ही दुकानें लगाकर अभिभावकों को स्कूल से ही किताबें, स्टेशनरी खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है। खास बात यह है कि पिछले साल के मुकाबले इस बार किताबें महंगी होने से हर तरह से जेब अभिभावकों की ही कटनी है। प्री, नर्सरी से लेकर आठवीं तक के कक्षाओं की एनसीईआरटी की किताब 50 रुपये से अधिक मूल्य की नहीं है। जबकि निजी प्रकाशकों की पांच प्रमुख विषयों की किताबों में प्रत्येक का मूल्य 150 रुपये से भी अधिक ही है। एनसीईआरटी की किताबों का जो सेट 250 रुपये में हैं, निजी प्रकाशकों के किताबों का सेट ढाई से चार हजार रुपये में पड़ रहा है। स्टेशनरी में कलर बाक्स, पेंसिल, पेंट ब्रेश तक तय ब्रांड का ही खरीदना मजबूरी हो गई है।
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मनमानी पर रोक लगाने की मांग
राघवनगर नगर के अभिभावक राकेश उपाध्याय और साकेतनगर के रामाजी यादव, सुभाष चौहान, रजनी शुक्ला आदि ने बताया कि पहले साल दर साल एक ही किताबें लगती थी। परिवार के कई बच्चे उसे ही पढ़कर अगली कक्षाओं में प्रवेश लेते थे। अब प्राइवेट स्कूल हर साल किताबें बदल देते हैं। मध्यम वर्ग का अभिभावक कैसे इस खर्च को वहन करेगा। स्कूलों की मनमानियों पर रोक लगाई जानी चाहिए।


किताबों के लिए अभिभावकों से जबरदस्ती नहीं की जा सकती। निजी प्रकाशकों की ही किताबें चलाने वाले स्कूलों के खिलाफ अगर शिकायत मिलती है तो इनके खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई होगी।
- शिवचंद राम, डीआईओएस
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