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आस्था के आगे गिरी मजहब की दीवार
Updated Fri, 27 Oct 2017 11:17 PM IST
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हनुमान मंदिर पोखरा पर छठ पूजा में शामिल महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
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डॉ केएन मल्ल
एकौना। पिड़रा घाट स्थित गोर्रा नदी के तट पर शुक्रवार को आस्था के सामने मजहबी दीवार टूट गई। सूर्यषष्ठी पर तीन माह के बेटे के दीर्घ जीवन के लिए निर्जला व्रत रखी मुस्लिम महिला चक्कर आने के बाद भी अनुष्ठान पूरा किया। तीन माह के ईशान की सलामती के लिए नूरजहां ने 36 घंटे उपवास रखकर सूर्य की आराधना की।
गोरखपुर के माल्हनपार गांव की नूरजहां एक वर्ष पहले ननद पुतुल के घर पचलड़ी आई थी। नूरजहां की शादी के सात वर्ष बीतने के बाद भी कोई संतान नहीं था। बीते वर्ष छठ पूजा के दौरान ननद के घर आई नूरजहां व्रती महिलाओं के साथ छठ घाट पर गईं। वहां उसने महिलाओं की आस्था देख घाट पर पुत्र प्राप्ति को मन्नत मांगी। तीन माह पहले उसे बेटा ईशान पैदा हुआ। सूर्यषष्ठी पर वह पूरी तैयारी के साथ ईशान को लेकर ननद के घर आई। नूरजहां ने विधि-विधान से व्रत रखा और सूर्य की आराधना को शाम को नदी के तट पर पहुंची। अहले सुबह वह भी व्रती महिलाओं के साथ नदी के तट पर पहुंच कर सूर्य के उदय का इंतजार करती रही। करीब तीन घटे इंतजार के बाद सूर्य उदय के समय अर्घ्य देते समय उसे चक्कर आ गया। वह लड़खड़ा कर गिरने वाली थी कि बगल में खड़ी महिलाओं ने संभाल लिया। बावजूद इसके नूरजहां ने व्रत नहीं तोड़ा और सूर्य को अर्घ्य देने का रश्म पूरा किया। नूरजहां ने कहा कि छठ मैया के आशीर्वाद से सात वर्ष के बाद बेटे की प्राप्ति हुई है। आस्था के सामने मजहब कोई मायने नहीं रखता। मैं हर साल छठ का व्रत रखकर पूजा करूंगी।
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एकौना। पिड़रा घाट स्थित गोर्रा नदी के तट पर शुक्रवार को आस्था के सामने मजहबी दीवार टूट गई। सूर्यषष्ठी पर तीन माह के बेटे के दीर्घ जीवन के लिए निर्जला व्रत रखी मुस्लिम महिला चक्कर आने के बाद भी अनुष्ठान पूरा किया। तीन माह के ईशान की सलामती के लिए नूरजहां ने 36 घंटे उपवास रखकर सूर्य की आराधना की।
गोरखपुर के माल्हनपार गांव की नूरजहां एक वर्ष पहले ननद पुतुल के घर पचलड़ी आई थी। नूरजहां की शादी के सात वर्ष बीतने के बाद भी कोई संतान नहीं था। बीते वर्ष छठ पूजा के दौरान ननद के घर आई नूरजहां व्रती महिलाओं के साथ छठ घाट पर गईं। वहां उसने महिलाओं की आस्था देख घाट पर पुत्र प्राप्ति को मन्नत मांगी। तीन माह पहले उसे बेटा ईशान पैदा हुआ। सूर्यषष्ठी पर वह पूरी तैयारी के साथ ईशान को लेकर ननद के घर आई। नूरजहां ने विधि-विधान से व्रत रखा और सूर्य की आराधना को शाम को नदी के तट पर पहुंची। अहले सुबह वह भी व्रती महिलाओं के साथ नदी के तट पर पहुंच कर सूर्य के उदय का इंतजार करती रही। करीब तीन घटे इंतजार के बाद सूर्य उदय के समय अर्घ्य देते समय उसे चक्कर आ गया। वह लड़खड़ा कर गिरने वाली थी कि बगल में खड़ी महिलाओं ने संभाल लिया। बावजूद इसके नूरजहां ने व्रत नहीं तोड़ा और सूर्य को अर्घ्य देने का रश्म पूरा किया। नूरजहां ने कहा कि छठ मैया के आशीर्वाद से सात वर्ष के बाद बेटे की प्राप्ति हुई है। आस्था के सामने मजहब कोई मायने नहीं रखता। मैं हर साल छठ का व्रत रखकर पूजा करूंगी।
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