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ग्राउंड रिपोर्ट
Updated Wed, 30 Aug 2017 10:49 PM IST
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रुद्रपुर/एकौना। दुश्वारियां भरी जिंदगी जी रहे दोआबा के कई गांवों में अब तक सरकारी इमदाद नहीं पहुंच पाई है। गांव में नाव और बोट से जाने वाले हर व्यक्ति की तरफ पीड़ित आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। सूखा खाद्य सामग्री खाकर और बाढ़ का पानी पीकर जान बचाना उनकी मजबूरी बन गई है।
बुधवार को ‘अमर उजाला टीम’ ने जगदीशपुर, भेऊर, बहोरा दलपतपुर, पलिया, सुल्तानी गांव का हाल जाना। गांव में इंसान की जिंदगी तो अभी बची है, पर चारे के अभाव में मवेशी तड़पते हुए दिखे। पशुओं की रोती आंखें उनके दर्द को बयां कर रही हैं। ऐसे में किसान उनकी प्राण बचाने को जान जोखिम में डालकर चारा की जुगत में लगे हैं। गांव के कटान स्थल पर पेड़ की टहनी के सहारे लोग पानी पार कर पशुओं के चारा का इंतजाम करते देखे गए। भेलउर गांव के श्याम यादव, रामवृक्ष, रामनगीना ने कहा कि वह बंधों पर परिवार के साथ जिंदगी गुजार रहे हैं। बाढ़ आने पर घर से लेकर आए आटा, चावल से पेट की आग बुझ जा रही, पर प्यास बुझाने को नदी का पानी पीना पड़ रहा है। प्रशासन की ओर से सिर ढंकने को प्लास्टिक तक नहीं मिली। गांव के सर्वजीत, प्रभुनाथ, घनश्याम, रामानंद ने कहा कि अब जान बच पाना मुश्किल लग रहा है। पलिया, सुल्तानी के मुन्ना गौड़, मनोज, उदय, भान, श्यामा गुप्ता ने कहा कि पानी घट रहा है, पर खतरा बढ़ता जा रहा। सांस लेने में दिक्कत हो रही है। चारा के अभाव में मर रहे पशुओं की लाशों से उठ रहीं दुर्गंध से बच्चे बीमार होने लगे हैं।
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बुधवार को ‘अमर उजाला टीम’ ने जगदीशपुर, भेऊर, बहोरा दलपतपुर, पलिया, सुल्तानी गांव का हाल जाना। गांव में इंसान की जिंदगी तो अभी बची है, पर चारे के अभाव में मवेशी तड़पते हुए दिखे। पशुओं की रोती आंखें उनके दर्द को बयां कर रही हैं। ऐसे में किसान उनकी प्राण बचाने को जान जोखिम में डालकर चारा की जुगत में लगे हैं। गांव के कटान स्थल पर पेड़ की टहनी के सहारे लोग पानी पार कर पशुओं के चारा का इंतजाम करते देखे गए। भेलउर गांव के श्याम यादव, रामवृक्ष, रामनगीना ने कहा कि वह बंधों पर परिवार के साथ जिंदगी गुजार रहे हैं। बाढ़ आने पर घर से लेकर आए आटा, चावल से पेट की आग बुझ जा रही, पर प्यास बुझाने को नदी का पानी पीना पड़ रहा है। प्रशासन की ओर से सिर ढंकने को प्लास्टिक तक नहीं मिली। गांव के सर्वजीत, प्रभुनाथ, घनश्याम, रामानंद ने कहा कि अब जान बच पाना मुश्किल लग रहा है। पलिया, सुल्तानी के मुन्ना गौड़, मनोज, उदय, भान, श्यामा गुप्ता ने कहा कि पानी घट रहा है, पर खतरा बढ़ता जा रहा। सांस लेने में दिक्कत हो रही है। चारा के अभाव में मर रहे पशुओं की लाशों से उठ रहीं दुर्गंध से बच्चे बीमार होने लगे हैं।
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