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पर्याप्त बुलेट प्रूफ जैकेट होने के बाद भी नहीं किया इस्तेमाल
अमर उजाला ब्यूरो, चित्रकूट
Updated Fri, 25 Aug 2017 11:17 PM IST
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मुठभेड़ स्थल पर बुलट प्रूफ जैकेट पहनकर कांबिंग में जाते एडीजी बीएन सावत व डीआईजी ज्ञानेश्वर तिवारी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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आठ साल पहले डाकू घनश्याम केवट से मुठभेड़ में चार जवानों की शहादत से भी पुलिस ने सबक नहीं लिया। घनश्याम तो अकेला था, लेकिन गुरुवार को निही के औदर जंगल में कुख्यात पांच लाख तीस हजार के इनामी डाकू बबुली कोल का पूरा गैंग मौजूद था। इसके बावजूद पुलिस टीम बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट का उपयोग किए बिना डकैतों से लोहा लेने उतर गई। हालांकि विभाग का दावा है कि जिले के हर थाने और चौकी में पर्याप्त बुलेटप्रूफ जैकेट हैं।
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पुलिस भी मानती है कि डाकू बबुली कोल गैंग के पास सबसे अधिक फायर व मैनपावर है। मानिकपुर के निही चिरैया गांव से जुड़े औदर के जंगल में गुरुवार को दस्यु बबुली कोल गैंग से मुठभेड़ मेें दो दरोगा को गोली लगी थी। दरोगा जेपी सिंह शहीद हो गए, जबकि वीरेंद्र त्रिपाठी को इलाहाबाद रेफर किया गया है। शहीद दरोगा के सीने पर गोली लगी, यानी वे बुलेटप्रूफ जैकेट पहने होते तो जान बच जाती।
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कुख्यात डाकुओं से मुठभेड़ में कई बार पुलिस को मुंह की खानी पड़ी है। इसके बावजूद पूरी लोेकेशन और असलहों से लैस पूरे गैंग की मौजूदगी की सूचना पर भी एसपी, अपर एसपी, सीओ और एंटी डकैती टीम ने घेराबंदी के समय बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहनी। डेढ़ घंटे चली मुठभेड़ में दोनों ओर से फायरिंग हुई। पुलिस मिशन पर आगे बढ़ रही थी। अचानक डकैतों की ओर से एक सनसनाती हुई गोली आई और दरोगा का सीना चीर गई। इससे टीम को कदम पीछे खींचने पड़े।
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किसी भी टीम ने नहीं पहना था बुलेटप्रूफ जैकेट
जिला पुलिस में पुलिस अधीक्षक, अपर पुलिस अधीक्षक, तीन सीओ, 15 इंस्पेक्टर, 150 हेड कांस्टेबल, 65 दरोगा और पांच सौ सिपाही हैं।
जिले में नौ थाने और चार चौकी हैं। विभाग का दावा है कि हर थाना चौकी में आपातकाल के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट है। कांबिंग में गए एसपी-अपर एसपी की टीम के सदस्योें ने जैकेट क्यों नहीं पहनी, इस सवाल का जवाब कोई नहीं दे पा रहा है। मुठभेड़ के दौरान चार टीमें थीं, लेकिन किसी ने भी यह जैकेट नहीं पहनी।
अफसरों ने जंगल में पहने जैकेट
पुलिस अधिकारियों की मानें तो जरूरत के समय जैकेट भी पहनकर जवान जातेे हैं। मुठभेड़ के दौरान पुलिस वाहनों में जैकेट व हेलमेट मौजूद थे। एक जवान की शहादत के बाद जब कमिश्नर अजय शुक्ला, एडीजी बीएन सावंत, डीआईजी जंगल पहुुंचे तो पुलिस कर्मियों ने उन्हें पहले बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट पहनाया। इसके बाद वे कांबिंग पर निकले थे।
20-25 किलो का होता अतिरिक्त भार
बुलेटप्रूफ जैकेट का वजन बीस किलो होता है। इसमें आगे और पीछे दस-दस किलो की प्लेटें होती हैं। हेलमेट का वजन भी लगभग पांच किलो होता है। घने जंगलों और ऊबड़खाबड़ रास्ते पर असलहे, पानी की बोतल, मैगजीन पट्टा आदि लेकर कांबिंग करनी पड़ती है। ऐसे में शरीर पर अतिरिक्त भार लेकर पहाड़ पर चढ़ना कठिन होता है। इस मामले में डीआईजी ज्ञानेश्वर तिवारी का कहना है कि मुठभेड़ के दौरान जंगल और मौसम की स्थिति पर निर्भर करता है। कांबिंग में बुलेटप्रूफ जैकेट के साथ घने जंगल के अंदर घुसना आसान नहीं था। शायद यही कारण है कि दरोगा जेपी सिंह ने बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहनी थी।