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चंदौली : डेढ़ साल से जंजीरों में जकड़ा बेजुबान, कोई नहीं दे रहा ध्यान
Thu, 06 May 2021 10:35 PM IST
गीतार्जुन गौतम
अमर उजाला नेटवर्क, चंदौली
अमर उजाला नेटवर्क, चंदौली
Published by: गीतार्जुन गौतम
Updated Thu, 06 May 2021 10:35 PM IST
सार
अक्टूबर 2020 से वन्यजीव संरक्षण विभाग, रामनगर में ‘कैद में’ है हाथी
बबुरी मेले में हाथी ने एक व्यक्ति की पटककर हत्या कर दी थी
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रामनगर वन्यजीव संरक्षण विभाग के परिसर में बंधा हाथी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
चंदौली के पीडीडीयू नगर इंसान अपनी पीड़ा बयां कर देते हैं, बेजुबान चाहकर भी अपनी पीड़ा किसी से बता नहीं सकते। वन्यजीव संरक्षण विभाग, रामनगर में पिछले डेढ़ सालों से जंजीरों में जकड़े गजराज की पीड़ा भी कुछ ऐसी ही है। वह बता नहीं सकता और इंसान उसे समझना नहीं चाहते। पांच डिग्री न्यूनतम तापमान की हाड़कंपाती ठंड, भारी बारिश, गर्मी और चिलचिलाती धूप, यह सब कुछ यह बेजुबान हाथी पिछले 18 महीनों से सह रहा है। पर इसकी पीड़ा दूर करने वाला कोई नहीं।
चंदौली के बबुरी मेले में 20 अक्टूबर 2020 को इस हाथी ने रमाशंकर सिंह नाम के व्यक्ति की पटककर हत्या कर दी थी। इसके बाद महावत और हाथी दोनों पर बबुरी थाने में मुकदमा दर्ज किया गया। महावत को अदालत से जमानत मिल पाई। लेकिन हाथी को ऐसी राहत नहीं मिल पाई है। घटना के बाद से यह हाथी रामनगर के वन्यजीव संरक्षण विभाग में (कैद) है। इसके जौनपुर निवासी मालिक प्रेमशंकर तिवारी ने हाईकोर्ट में अपील भी की है पर दो बार के लॉकडाउन की वजह से मामले की सुनवाई नहीं हो पा रही है।
स्थिति यह है कि चारों पैरों में लोहे की जंजीरें बंधने से पैर में बड़े गड्ढे हो गए हैं। हाथी के रहने की जगह पर काफी गंदगी हो गई है। महीनों से हाथी का मल भी वहीं जमा है। हालांकि सफाई के लिए दो कर्मचारी रखे गए हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि जब से यह हाथी आया है किसी ने इसे कभी बैठे हुए नहीं देेखा।
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चंदौली के बबुरी मेले में 20 अक्टूबर 2020 को इस हाथी ने रमाशंकर सिंह नाम के व्यक्ति की पटककर हत्या कर दी थी। इसके बाद महावत और हाथी दोनों पर बबुरी थाने में मुकदमा दर्ज किया गया। महावत को अदालत से जमानत मिल पाई। लेकिन हाथी को ऐसी राहत नहीं मिल पाई है। घटना के बाद से यह हाथी रामनगर के वन्यजीव संरक्षण विभाग में (कैद) है। इसके जौनपुर निवासी मालिक प्रेमशंकर तिवारी ने हाईकोर्ट में अपील भी की है पर दो बार के लॉकडाउन की वजह से मामले की सुनवाई नहीं हो पा रही है।
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स्थिति यह है कि चारों पैरों में लोहे की जंजीरें बंधने से पैर में बड़े गड्ढे हो गए हैं। हाथी के रहने की जगह पर काफी गंदगी हो गई है। महीनों से हाथी का मल भी वहीं जमा है। हालांकि सफाई के लिए दो कर्मचारी रखे गए हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि जब से यह हाथी आया है किसी ने इसे कभी बैठे हुए नहीं देेखा।
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दुधवा नेशनल पार्क और मथुरा भी नहीं जा सका
जून 2020 में वन विभाग की ओर से हाथी को दुधवा नेशनल पार्क भेजे जाने की कवायद शुरू हुई। पर इसी दौरान उसने गुस्से में विभाग की चहारदीवारी तोड़ दी। बाद में उसकी हालत को देखते दुधवा पार्क ने उसे ले जाने से इनकार कर दिया। उनको आशंका थी कि मस्त सीजन के चलते हाथी पार्क में उत्पात मचा सकता है। फिर वन विभाग ने मथुरा स्थित एक रेस्क्यू सेंटर में संपर्क किया। वह हाथी को ले जाने को तैयार था पर वन विभाग की प्रार्थना अदालत में स्वीकार नहीं हुई। हाथी के मालिक ने हाइकोर्ट में भी अपील की है। इस पर सुनवाई बाकी है। इस बीच, जरूरत इस बात की है कि उसके लिए तय जगह पर ही उसकी उचित देखभाल हो।
खानपान और देखरेख में खर्च हो गए 5.40 लाख रुपये
वन विभाग के डीएफओ दिनेश सिंह ने बताया कि हाथी के खानपान और देखरेख में रोजाना करीब एक हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। हाथी के देखभाल और इसे नहलाने के लिए दो कर्मचारी रखे गए हैं। इनकी प्रतिदिन की मजदूरी 201 रुपये है। हाथी को रोजाना पांच किलो आटा, पांच किलो चावल, दो किलो गुड़, आधा किलो दाल और एक किलो चना खिलाया जाता है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार महीने में हाथी पर 30 हजार रुपये खर्च किए जाते हैं। 18 महीने से हाथी यहां है तो 5.40 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। खाने और देखरेख की हकीकत यह है कि हाथी के पास मल का ढेर लगा हुआ है। उसके शरीर पर धूल की मोटी परत जमी है। वह काफी दुबला भी हो चुका है।
हाथी को डॉक्टर चेक करते रहते हैं। कोई दिक्कत होने पर दवा दी जाती है। खानपान का पूूरा ध्यान रखा जाता है। रोज इसे नहलाया जाता है। मामला कोर्ट में है। लॉकडाउन की वजह से इस बार भी सुनवाई टल गई। ऐसे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि यह कब अपने मालिक के पास जा सकेगा। -दिनेश सिंह, डीएफओ
जून 2020 में वन विभाग की ओर से हाथी को दुधवा नेशनल पार्क भेजे जाने की कवायद शुरू हुई। पर इसी दौरान उसने गुस्से में विभाग की चहारदीवारी तोड़ दी। बाद में उसकी हालत को देखते दुधवा पार्क ने उसे ले जाने से इनकार कर दिया। उनको आशंका थी कि मस्त सीजन के चलते हाथी पार्क में उत्पात मचा सकता है। फिर वन विभाग ने मथुरा स्थित एक रेस्क्यू सेंटर में संपर्क किया। वह हाथी को ले जाने को तैयार था पर वन विभाग की प्रार्थना अदालत में स्वीकार नहीं हुई। हाथी के मालिक ने हाइकोर्ट में भी अपील की है। इस पर सुनवाई बाकी है। इस बीच, जरूरत इस बात की है कि उसके लिए तय जगह पर ही उसकी उचित देखभाल हो।
खानपान और देखरेख में खर्च हो गए 5.40 लाख रुपये
वन विभाग के डीएफओ दिनेश सिंह ने बताया कि हाथी के खानपान और देखरेख में रोजाना करीब एक हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। हाथी के देखभाल और इसे नहलाने के लिए दो कर्मचारी रखे गए हैं। इनकी प्रतिदिन की मजदूरी 201 रुपये है। हाथी को रोजाना पांच किलो आटा, पांच किलो चावल, दो किलो गुड़, आधा किलो दाल और एक किलो चना खिलाया जाता है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार महीने में हाथी पर 30 हजार रुपये खर्च किए जाते हैं। 18 महीने से हाथी यहां है तो 5.40 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। खाने और देखरेख की हकीकत यह है कि हाथी के पास मल का ढेर लगा हुआ है। उसके शरीर पर धूल की मोटी परत जमी है। वह काफी दुबला भी हो चुका है।
हाथी को डॉक्टर चेक करते रहते हैं। कोई दिक्कत होने पर दवा दी जाती है। खानपान का पूूरा ध्यान रखा जाता है। रोज इसे नहलाया जाता है। मामला कोर्ट में है। लॉकडाउन की वजह से इस बार भी सुनवाई टल गई। ऐसे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि यह कब अपने मालिक के पास जा सकेगा। -दिनेश सिंह, डीएफओ