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पिता के परिश्रम और प्रेरणा की प्रबलता से मिली सफलता
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कंदवा। यूं तो हर किसी के अपने सपने होते हैं, लेकिन ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो अपने सपनों को सच कर पाते हैं। जिनके सपने सच होते हैं, उनकी सफलता में पिता की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कभी वह प्रेरक बनकर तो कभी मार्गदर्शक बनकर तो कहीं सहयोगी बनकर मदद करते हैं। जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर सफल लोगों ने पिता के योगदान को याद किया।
कंदवा। बरहनी ब्लॉक के कम्हरियां गांव निवासी और वर्तमान मं लखनऊ में जलिा उद्यान अधिकारी बैजनाथ सिंह ने बताया कि मेरे पिता दयाशंकर सिंह प्रतिष्ठित शिक्षक रहे। उन्होंने मुझे पीसीएस बनने के लिए प्रेरित किया। पिता के उत्साहवर्धन के कारण ही मेरा चयन पीसीएस में हो सका। पिता से मुझे विरासत में सच्चाई और ईमानदारी की सीख मिली है। पिताजी हमेशा सिखाते हैं कि झूठ टिकाऊ नहीं होता। कठिन परिश्रम मेरे पिता से मुझे विरासत में मिली है। आज मैं जो कुछ भी हूं पिता की बदौलत हूं। पिता के परिश्रम का ही परिणाम है कि मैं आज यहां तक पहुंच पाया हूं और जिला उद्यान अधिकारी के रूप में तैनात हूं। पिता मेरे मार्गदर्शक हैं।
पिता की मेहनत से ही राष्ट्रीय स्तर पर दोनो भाईयों ने कमाया नाम
कंदवा। तीरंदाजी में कई राष्ट्रीय पदक जीत चुके बरहनी विकास खंड के कम्हरिया गांव निवासी अभिषेक सिंह का कहना है कि हमारे पिता अनिल सिंह झुन्ना ने गांव में रहकर खेती किसानी कर हमें खेलों में आगे बढ़ाया। वे खुद खेती करते रहे लेकिन हमें शिक्षा के साथ खेलों में भी आगे बढ़ने के लिए हौसला बढ़ाते रहे। कई बार हमारा हौसला बढ़ाने के लिए खेती किसानी का काम छोड़कर हमारे पिता खेल के मैदान पर पहुंच जाते थे। उन्होंने बताया कि जीत के जश्न में ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमें अगली मंजिल की तरफ बढ़ना है। हमारी आज की सभी कामयाबियों में हमारे पिता ही हम लोगों के आधार हैं। पिता के मेहनत का नतीजा है कि मैंने तीरंदाजी तो बड़े भाई राहुल सिंह ने वालीबाल में राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया है।
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कंदवा। बरहनी ब्लॉक के कम्हरियां गांव निवासी और वर्तमान मं लखनऊ में जलिा उद्यान अधिकारी बैजनाथ सिंह ने बताया कि मेरे पिता दयाशंकर सिंह प्रतिष्ठित शिक्षक रहे। उन्होंने मुझे पीसीएस बनने के लिए प्रेरित किया। पिता के उत्साहवर्धन के कारण ही मेरा चयन पीसीएस में हो सका। पिता से मुझे विरासत में सच्चाई और ईमानदारी की सीख मिली है। पिताजी हमेशा सिखाते हैं कि झूठ टिकाऊ नहीं होता। कठिन परिश्रम मेरे पिता से मुझे विरासत में मिली है। आज मैं जो कुछ भी हूं पिता की बदौलत हूं। पिता के परिश्रम का ही परिणाम है कि मैं आज यहां तक पहुंच पाया हूं और जिला उद्यान अधिकारी के रूप में तैनात हूं। पिता मेरे मार्गदर्शक हैं।
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पिता की मेहनत से ही राष्ट्रीय स्तर पर दोनो भाईयों ने कमाया नाम
कंदवा। तीरंदाजी में कई राष्ट्रीय पदक जीत चुके बरहनी विकास खंड के कम्हरिया गांव निवासी अभिषेक सिंह का कहना है कि हमारे पिता अनिल सिंह झुन्ना ने गांव में रहकर खेती किसानी कर हमें खेलों में आगे बढ़ाया। वे खुद खेती करते रहे लेकिन हमें शिक्षा के साथ खेलों में भी आगे बढ़ने के लिए हौसला बढ़ाते रहे। कई बार हमारा हौसला बढ़ाने के लिए खेती किसानी का काम छोड़कर हमारे पिता खेल के मैदान पर पहुंच जाते थे। उन्होंने बताया कि जीत के जश्न में ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमें अगली मंजिल की तरफ बढ़ना है। हमारी आज की सभी कामयाबियों में हमारे पिता ही हम लोगों के आधार हैं। पिता के मेहनत का नतीजा है कि मैंने तीरंदाजी तो बड़े भाई राहुल सिंह ने वालीबाल में राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया है।
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