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हाथ नहीं तो पैरों से किस्मत लिख रही ये बेटी: मशीन से उखड़ गए थे दोनों हाथ फिर भी नहीं मानी हार, जज्बे को सलाम

Fri, 09 Dec 2022 11:23 AM IST
किरन रौतेला न्यूज जेस्क, अमर उजाला, चंदौली
न्यूज जेस्क, अमर उजाला, चंदौली Published by: किरन रौतेला Updated Fri, 09 Dec 2022 11:23 AM IST
सार

चंदौली की नौ वर्षीय बिटिया वंदना कुमारी के दो वर्ष पूर्व मशीन की चपेट में आने से दोनों हाथ उखड़ गए तो उसने पैरों को ही हाथ बना लिया। दुर्घटना के पांच महीने बाद ही पैरों से लिखना, पढ़ना और घर का सारा काम करना शुरू कर दिया। रोज स्कूल जाने के साथ ही वंदना विभिन्न प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर भाग लेती है। बिटिया का हौसला देखकर हर कोई हैरान है।

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Both hands were uprooted from the machine two years ago does the work of writing, reading, eating with feet
हाथ नहीं तो पैरों से किस्मत लिख रही ये बेटी: मशीन से उखड़ गए थे दोनों हाथ फिर भी नहीं मानी हार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

‘लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’। हरिवंश राय बच्चन की इन पंक्तियों को सत्य साबित किया है बरांव गांव की नौ वर्षीय बिटिया वंदना कुमारी ने। दो वर्ष पूर्व मशीन की चपेट में आने से दोनों हाथ उखड़ गए तो उसने पैरों को ही हाथ बना लिया। दुर्घटना के पांच महीने बाद ही पैरों से लिखना, पढ़ना और घर का सारा काम करना शुरू कर दिया। रोज स्कूल जाने के साथ ही वंदना विभिन्न प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर भाग लेती है। बिटिया का हौसला देखकर हर कोई हैरान है।

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चंदौली के शहाबगंज विकासखंड के बरांव गांव निवासी बबलू प्रजापति कृषक हैं। खेती से ही परिवार का पालन-पोषण करते हैं। उनके दो पुत्र शुभम (13) व शिवम (11) और पुत्री वंदना (9) है। 22 जनवरी 2020 को उनके घर के बाहर मशीन से धान की कुटाई हो रही थी तभी गेंद लाने के दौरान वंदना मशीन के पट्टे की चपेट में आ गई। इससे उसके दोनों हाथ उखड़ गए। डॉक्टरों ने बताया कि वंदना के हाथ अब जुड़ नहीं सकते। पिता बबलू ने लाखों खर्च कर उसका इलाज कराया। 

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Both hands were uprooted from the machine two years ago does the work of writing, reading, eating with feet
हाथ नहीं तो पैरों से किस्मत लिख रही ये बेटी - फोटो : अमर उजाला
वंदना घर आई तो पड़ोसी और रिश्तेदार कहने लगे कि अब बेटी किसी काम की नहीं रही। इसे जिंदगी भर दूसरे के सहारे ही रहना पड़ेगा, लेकिन सभी तब हैरान हो गए जब पांच महीने बाद ही वंदना ने पैरों से पेंसिल पकड़ने की कोशिश शुरू कर दी। देखते ही देखते वह पैरों से पेंसिल पकड़कर लिखने लगी। मां किरण देवी ने उसे काफी प्रोत्साहित किया। आज वंदना रोजाना स्कूल जाती है और सामान्य बच्चों की तरह बेंच पर बैठकर लिखती पढ़ती है। साथ ही पैरों से ही खाना खाने, झाड़ूू लगाने, बर्तन मांजने और कपड़ा धोने तक का कार्य कर लेती है। वंदना ने बताया कि उसका सपना इंजीनियर बनने का है इसके लिए वह दिन-रात मेहनत करेगी। पिता बबलू प्रजापति ने भावुक होकर कहा बिटिया जो करना चाहेगी उसे कराएंगे। किसी भी कोशिश से हार नहीं मानेंगे।
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