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कर्मनाशा के तटवर्ती खेतों में लहलहा रही अरहर की फसल
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कंदवा। कर्मनाशा नदी के तटवर्ती इलाकों में नदी के किनारे के खेतों में इन दिनों अरहर की फसल लहलहा रही है। इस जमीन पर धान-गेहूं की फसल उपजाना संभव नहीं हो पाता है। इससे किसान केवल एक ही फसल का लाभ ले पाते हैं।
कर्मनाशा नदी के किनारे के खेत समतल नहीं हैं। वहीं किसानों को प्रतिवर्ष बाढ़ का दंश भी झेलना पड़ता है। किसानों का मानना है कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद जमीन उपजाऊ हो जाती है। कर्मनाशा नदी के किनारे खेतों के समतल न होने के चलते धान व गेहूं की फसल पैदा करना संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में यहां किसान सिर्फ एक फसल का ही लाभ ले पाते हैं। किसान कम लागत में अच्छा मुनाफा कमाने की सोच से अरहर की खेती करते हैं। बरहनी विकासखंड के अरंगी, मुड्डा, धनाइतपुर, पोखरा, दैथा, चारी, चिरईगांव सहित दर्जनों गांव कर्मनाशा नदी के तट पर बसे हैं। यहां कर्मनाशा नदी के किनारे की जमीन पर जुलाई माह के शुरुआत में ही खेतों की दो बार जुताई कर अरहर की बोआई कर दी जाती है। करीब डेढ़ किलो प्रति बीघा के हिसाब से बोआई और कर्मनाशा नदी के जल से एक बार की हल्की सिंचाई के बाद अरंगी से मुड्डा गांव तक अरहर की फसल खेतों में लहलहा रही है।
कंदवा। किसानों ने बताया अरहर की खेती करने में एक बीघा में एक हजार का खर्च आता है। वहीं फूल आने पर बेहतर पैदावार के लिए दवा का छिड़काव अत्यंत आवश्यक होता है। यदि समय से बारिश हो जाए तो अरहर की बोआई भी समय से हो जाती है। कहा कि यदि मौसम अनुकूल रहा तो प्रति बीघा डेढ़ से दो कुंतल अरहर पैदा हो सकता है। कर्मनाशा नदी के किनारे की जमीन पर धान व गेहूं की फसल पैदा करना संभव तो नहीं हो पाता लेकिन बाढ़ की वजह से उपजाऊ जमीन पर अरहर के अलावा चना, मसूर, अलसी, सरसो की फसल अच्छी होती है।
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कर्मनाशा नदी के किनारे के खेत समतल नहीं हैं। वहीं किसानों को प्रतिवर्ष बाढ़ का दंश भी झेलना पड़ता है। किसानों का मानना है कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद जमीन उपजाऊ हो जाती है। कर्मनाशा नदी के किनारे खेतों के समतल न होने के चलते धान व गेहूं की फसल पैदा करना संभव नहीं हो पाता है। ऐसे में यहां किसान सिर्फ एक फसल का ही लाभ ले पाते हैं। किसान कम लागत में अच्छा मुनाफा कमाने की सोच से अरहर की खेती करते हैं। बरहनी विकासखंड के अरंगी, मुड्डा, धनाइतपुर, पोखरा, दैथा, चारी, चिरईगांव सहित दर्जनों गांव कर्मनाशा नदी के तट पर बसे हैं। यहां कर्मनाशा नदी के किनारे की जमीन पर जुलाई माह के शुरुआत में ही खेतों की दो बार जुताई कर अरहर की बोआई कर दी जाती है। करीब डेढ़ किलो प्रति बीघा के हिसाब से बोआई और कर्मनाशा नदी के जल से एक बार की हल्की सिंचाई के बाद अरंगी से मुड्डा गांव तक अरहर की फसल खेतों में लहलहा रही है।
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कंदवा। किसानों ने बताया अरहर की खेती करने में एक बीघा में एक हजार का खर्च आता है। वहीं फूल आने पर बेहतर पैदावार के लिए दवा का छिड़काव अत्यंत आवश्यक होता है। यदि समय से बारिश हो जाए तो अरहर की बोआई भी समय से हो जाती है। कहा कि यदि मौसम अनुकूल रहा तो प्रति बीघा डेढ़ से दो कुंतल अरहर पैदा हो सकता है। कर्मनाशा नदी के किनारे की जमीन पर धान व गेहूं की फसल पैदा करना संभव तो नहीं हो पाता लेकिन बाढ़ की वजह से उपजाऊ जमीन पर अरहर के अलावा चना, मसूर, अलसी, सरसो की फसल अच्छी होती है।
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