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आज भी जीवित है होली पर उबटन लगाने की परंपरा
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इलिया। आधुनिक समय में शरीर में दर्द और कष्ट होने पर लोग डॉक्टर के पास जाकर दवा ले लेते हैं लेकिन प्राचीन परंपरा के अनुसार उबटन लगाए जाने का अलग ही महत्व है। उबटन लगाने से दर्द में आराम मिलने के साथ ही चर्म रोग, फोड़ा-फुंसी भी समाप्त हो सकता है। होलिका दहन से पूर्व महिलाएं बच्चों और पुरुषों को सरसों पीसकर उसके उबटन से शरीर में मालिश करती हैं। उसके बाद उसे होलिका में डाल दिया जाता है।
स्थानीय गांव में आज भी होलिका दहन के दिन उबटन लगाने परंपरा है। बुजुर्गों के अनुसार सरसों को पीसकर उसमें थोड़ा सा सरसों का तेल मिलाकर पूरे शरीर में मालिश करने के बाद समें से निकलने वाले मैल को होलिका में डाला जाता है। मान्यता है कि इससे चर्म रोग सहित अन्य शारीरिक बीमारियां होलिका में दहन हो जाती हैं। यह परंपरा आज भी गांवों में चल रही है। कस्बा के बड़े बुजुर्ग भानु प्रताप गुप्ता, मोतीलाल, राकेश गुप्ता, दशरथ केसरी, मुरारी लाल आदि ने बताया कि होलिका दहन के दिन उबटन लगाने की पुरानी परंपरा रही है।
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स्थानीय गांव में आज भी होलिका दहन के दिन उबटन लगाने परंपरा है। बुजुर्गों के अनुसार सरसों को पीसकर उसमें थोड़ा सा सरसों का तेल मिलाकर पूरे शरीर में मालिश करने के बाद समें से निकलने वाले मैल को होलिका में डाला जाता है। मान्यता है कि इससे चर्म रोग सहित अन्य शारीरिक बीमारियां होलिका में दहन हो जाती हैं। यह परंपरा आज भी गांवों में चल रही है। कस्बा के बड़े बुजुर्ग भानु प्रताप गुप्ता, मोतीलाल, राकेश गुप्ता, दशरथ केसरी, मुरारी लाल आदि ने बताया कि होलिका दहन के दिन उबटन लगाने की पुरानी परंपरा रही है।
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