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फर्जी एनकाउंटर: 3 पुलिसवालों को फांसी, 5 को उम्रकैद
लखनऊ/ब्यूरो/इंटरनेट डेस्क
Updated Fri, 05 Apr 2013 06:53 PM IST
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उत्तरप्रदेश में गोंडा के माधोपुर गांव में कुछ डकैतों को पकड़ने के नाम पर हुए फर्जी एनकाउंटर के मामले में सीबीआई अदालत ने 3 पुलिसकर्मियों को फांसी और 5 को उम्रकैद की सजा सुनाई है।
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देश में संभवतः ये पहली बार है, जब किसी मामले में पुलिस कर्मियों को फांसी हुई है।
मामला 30 साल पहले का है, जब रेड करने गए डिप्टी एसपी केपी सिंह की फायरिंग में मौत हो गई थी। उसके बाद इन पुलिसकर्मियों ने फर्जी एनकाउंटर में 12 लोगों को मार गिराया था। मरने वाले सभी गांव वाले थे।
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सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में कुल 19 पुलिस वालों को आरोपी बनाया था।
इनमें से गोंडा के तत्कालीन उपाधीक्षक बीएम शर्मा, तत्कालीन थानाध्यक्ष कटरा टीआर पाल, शहर कोतवाल रामपाल सिंह, केपी राय, आरके त्रिपाठी, उपनिरीक्षक रामवृक्ष यादव, श्रीकांत पांडेय, गया प्रसाद तिवारी, सिपाही सत्यनाम तिवारी व जंग बहादुर की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई।
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कोर्ट ने तत्कालीन थानाध्यक्ष कोड़िया आरबी सरोज, पीएसी के तत्कालीन सूबेदार रमाकांत दीक्षित, तत्कालीन उपनिरीक्षक नसीम अहमद, मंगला सिंह, परवेज हुसैन, राजेंद्र प्रसाद सिंह, तत्कालीन मुख्य कांस्टेबल राम नायक पांडेय व सिपाही रामकरन को दोषी ठहराकर जेल भेज दिया।
साक्ष्य के अभाव में बरी किए गए वर्तमान में रिटायर्ड उपनिरीक्षक प्रेम सिंह रैकवार के अधिवक्ता अवधेश सिंह यादव ने कोर्ट को बताया कि वह केपी सिंह को गोली लगने के बाद उन्हें अस्पताल ले गए थे।
ये थी पुलिस की कहानी
कोर्ट के दस्तावेज के अनुसार, 13 मार्च 1982 को गोंडा में दर्ज मामले की पहली रिपोर्ट के मुताबिक, 13 मार्च को तड़के 4 बजे केपी सिंह पुलिस टीम लेकर रामबरन के घर पहुंचे और दरवाजा खटकटाया। इसी दौरान अंदर से चली गोली से केपी सिंह घायल हो गए, अस्पताल ले जाते समय उनकी मौत हो गई।
पुलिस ने इस मुठभेड़ में 12 डकैतों को मार गिराया और काफी मात्रा में गोला बारूद तथा हथियार बरामद किए। बलरामपुर कोतवाली थाना प्रभारी एबी सिंह ने विवेचना कर 8 मई 1983 को एफआईआर को सही बता फाइनल रिपोर्ट लगा दी।
24 फरवरी 1984 को सीजेएम गोंडा ने पुलिस की ओर से दाखिल फाइनल रिपोर्ट को स्वीकृत कर दिया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से मामले की विवेचना सीबीआई को सौंप दी गई।
सीबीआई ने 17 अगस्त 1984 को मामला दर्ज करके विवेचना शुरू की और 19 आरोपियों के खिलाफ 28 दिसंबर 1989 को कोर्ट में चार्जशीट पेश की। सीबीआई ने कोर्ट में कुल 31 गवाहों का परीक्षण कराया।
सीबीआई की जांच में उजागर हुआ सच
सीबीआई ने विवेचना में पाया कि एसआई आरबी सरोज व टीआरपाल ने 12 मार्च 1982 को गोंडा के तत्कालीन एसपी यशपाल सिंह को माधोपुर में रामबरन के घर तेरही में हथियारों से लैस कुछ डकैतों के आने की सूचना दी।
इस पर गोंडा के विभिन्न थानों की पुलिस व पीएसी को उपाधीक्षक केपी सिंह के नेतृत्व में तीन टीमें बनाकर माधोपुर गांव भेजा गया था। 13 मार्च 1982 को भोर में करीब चार बजे डीएसपी केपी सिंह ने रामबरन के घर का दरवाजा खटखटाया तो अंदर से चली गोली में केपी सिंह घायल हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा था लेकिन रास्ते में मौत हो गई।
आरोप लगाया गया कि केपी सिंह की मौत के बाद पुलिस फोर्स ने गांव में घुसकर साधू, जगराय, परिक्रमादीन, भुलावन पंडित, रामधन, रामचंद्र, मुन्ना, ओम प्रकाश, भुसैली, अख्तर अली उर्फ बाबू तेली, राम समुझ, जगदत्त को पकड़ लिया व नदी किनारे ले गए। पुलिस वालों ने पकड़े लोगों को डकैत बता गोलियां मार दी, इसमें सभी मारे गए।
सीबीआई की जांच में उजागर हुआ कि जिन लोगों को डकैत बताकर मारा गया उन सभी को गोलियां सामने से लगी हैं। ओमप्रकाश, मुन्ना और बाबू तेली को तो बेहद करीब से गोली मारी गई।
पुलिस ने गांव के जिन घरों के पास मुठभेड़ का दावा किया है वहां न तो गोली के निशान हैं न ही गोलीबारी में कोई पशु घायल हुआ। यहां तक कि रामबरन के घर से न तो कोई हथियार बरामद किया न ही कोई अपराधी पकड़ा।