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गन्ने का मोह छोड़ा, मूसली और सतावर से बने आत्मनिर्भर
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किसान आनंद सिंह द्वारा उगाई गई सतावर की फसल।
- फोटो : BULANDSHAHR
गन्ने का मोह छोड़ा, मूसली और सतावर से बने आत्मनिर्भर
बुलंदशहर। जनपद में कई प्रगतिशील किसान पारंपरिक खेती को छोड़कर व्यावसायिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। कोई जैविक तरीके से विभिन्न फसलों का उत्पादन कर रहा है तो कोई फूल और फल के माध्यम से कम लागत में अधिक लाभ कमा रहा है। डिबाई तहसील क्षेत्र के गांव तलवार निवासी किसान आनंद सिंह औषधीय फसल सतावर और सफेद मूसली की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। वह विभिन्न किसान मेलों में किसानों को जागरूक भी कर रहे हैं।
किसान आनंद सिंह ने बताया कि उन्होंने बीएससी एग्रीकल्चर तक की पढ़ाई की है। नौकरी नहीं मिलने पर उन्होंने खेती का मन बनाया। पिछले छह साल से वह अश्वगंधा, सफेद मूसली, तुलसी और सतावर आदि औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं। इन फसलों से अच्छी आमदनी होती है। खास बात यह है कि इन फसलों को बेचने के लिए भटकना नहीं पड़ता है। सतावर और सफेद मूसली से कई तरह की दवाइयाें का निर्माण होता है। सतावर का उपयोग पशुओं में दुग्ध बढ़ाने के लिए किया जाता है। भूख बढ़ाने और पाचन सुधारने में भी सतावर से निर्मित औषधि का उपयोग किया जाता है। सतावर चर्म रोग, अनिद्रा आदि की दवाइयों में प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा सतावर की खेती में कीट आदि और बीमारी नहीं लगती है। कांटेदार पौधे होने की वजह से जानवर भी इसे नहीं खाते हैं। इस फसल में शुरू के तीन माह तक कांटे नहीं होते। इसलिए इन दिनों में इसे आवारा पशुओं से बचाने की जरूरत होती है। उसके बाद कांटे आ जाते हैं तो आवारा पशु नुकसान नहीं कर पाते हैं।
18 माह में तैयार होती है सतावर की फसल
किसान आनंद ने बताया कि सतावर की बुआई जुलाई से लेकर सितंबर तक होती है। एक एकड़ फसल में करीब 80 हजार से एक लाख रुपये का खर्च आता है। करीब 18 माह बात फसल तैयार हो जाती है। यदि मार्केट में दाम सही है तो एक एकड़ में दो से तीन लाख तक का मुनाफा हो जाता है। सतावर 20 से 30 हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकता है। उद्यान विभाग से 26 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अनुदान राशि भी मिलती थी, लेकिन अब बंद हो चुकी है।
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सफेद मूसली से भी अच्छी होती है आमदनी
आनंद ने बताया कि इस बार दो बीघा जमीन में सफेद मूसली की फसल बोई है। इस फसल को तैयार करने में करीब दस हजार रुपये का खर्च आता है। यह फसल छह से नौ महीने के अंतराल में तैयार हो जाती है। फसल तैयार होने पर 70 से 80 हजार रुपये प्रति बीघा आमदनी हो जाती है। फसल खरीदने के लिए दिल्ली, गाजियाबाद, बरेली और हाथरस आदि स्थानों से खरीदार गांव में ही पहुंच जाते हैं। सफेद मूसली की खेती करने में सिंचाई की जरूरत भी कम होती है।
कोट
औषधीय खेती करने से किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं। आनंद सिंह कई साल से औषधीय खेती से जुड़े हैं। उन्होंने सतावर और सफेद मूसली की खेती कर एक अलग पहचान बनाई है। साथ ही वह इससे अच्छी आमदनी भी कर रहे हैं। वह समय-समय पर जनपद में लगने वाले कृषि मेलों में किसानों को जागरूक भी करते हैं। - डॉ. धीरेंद्र सिंह, जिला उद्यान अधिकारी
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बुलंदशहर। जनपद में कई प्रगतिशील किसान पारंपरिक खेती को छोड़कर व्यावसायिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। कोई जैविक तरीके से विभिन्न फसलों का उत्पादन कर रहा है तो कोई फूल और फल के माध्यम से कम लागत में अधिक लाभ कमा रहा है। डिबाई तहसील क्षेत्र के गांव तलवार निवासी किसान आनंद सिंह औषधीय फसल सतावर और सफेद मूसली की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। वह विभिन्न किसान मेलों में किसानों को जागरूक भी कर रहे हैं।
किसान आनंद सिंह ने बताया कि उन्होंने बीएससी एग्रीकल्चर तक की पढ़ाई की है। नौकरी नहीं मिलने पर उन्होंने खेती का मन बनाया। पिछले छह साल से वह अश्वगंधा, सफेद मूसली, तुलसी और सतावर आदि औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं। इन फसलों से अच्छी आमदनी होती है। खास बात यह है कि इन फसलों को बेचने के लिए भटकना नहीं पड़ता है। सतावर और सफेद मूसली से कई तरह की दवाइयाें का निर्माण होता है। सतावर का उपयोग पशुओं में दुग्ध बढ़ाने के लिए किया जाता है। भूख बढ़ाने और पाचन सुधारने में भी सतावर से निर्मित औषधि का उपयोग किया जाता है। सतावर चर्म रोग, अनिद्रा आदि की दवाइयों में प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा सतावर की खेती में कीट आदि और बीमारी नहीं लगती है। कांटेदार पौधे होने की वजह से जानवर भी इसे नहीं खाते हैं। इस फसल में शुरू के तीन माह तक कांटे नहीं होते। इसलिए इन दिनों में इसे आवारा पशुओं से बचाने की जरूरत होती है। उसके बाद कांटे आ जाते हैं तो आवारा पशु नुकसान नहीं कर पाते हैं।
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18 माह में तैयार होती है सतावर की फसल
किसान आनंद ने बताया कि सतावर की बुआई जुलाई से लेकर सितंबर तक होती है। एक एकड़ फसल में करीब 80 हजार से एक लाख रुपये का खर्च आता है। करीब 18 माह बात फसल तैयार हो जाती है। यदि मार्केट में दाम सही है तो एक एकड़ में दो से तीन लाख तक का मुनाफा हो जाता है। सतावर 20 से 30 हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकता है। उद्यान विभाग से 26 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अनुदान राशि भी मिलती थी, लेकिन अब बंद हो चुकी है।
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सफेद मूसली से भी अच्छी होती है आमदनी
आनंद ने बताया कि इस बार दो बीघा जमीन में सफेद मूसली की फसल बोई है। इस फसल को तैयार करने में करीब दस हजार रुपये का खर्च आता है। यह फसल छह से नौ महीने के अंतराल में तैयार हो जाती है। फसल तैयार होने पर 70 से 80 हजार रुपये प्रति बीघा आमदनी हो जाती है। फसल खरीदने के लिए दिल्ली, गाजियाबाद, बरेली और हाथरस आदि स्थानों से खरीदार गांव में ही पहुंच जाते हैं। सफेद मूसली की खेती करने में सिंचाई की जरूरत भी कम होती है।
कोट
औषधीय खेती करने से किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं। आनंद सिंह कई साल से औषधीय खेती से जुड़े हैं। उन्होंने सतावर और सफेद मूसली की खेती कर एक अलग पहचान बनाई है। साथ ही वह इससे अच्छी आमदनी भी कर रहे हैं। वह समय-समय पर जनपद में लगने वाले कृषि मेलों में किसानों को जागरूक भी करते हैं। - डॉ. धीरेंद्र सिंह, जिला उद्यान अधिकारी