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चंदे से चुनाव लड़कर विधायक बने थे त्रिलोकचंद्र

Wed, 11 Jan 2017 11:07 PM IST
अमर उजाला/बुलंदशहर
अमर उजाला/बुलंदशहर Updated Wed, 11 Jan 2017 11:07 PM IST
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Contributions were fought legislator Trilokchandra
एक कार्यक्रम का फीता काटकर उद्घाटन करते पीडब्लूडी मंत्री त्रिलोक चंद। (फाइल फोटो) - फोटो : ब्यूरो

ऐसे नेता भी रहे, जिन्हें चुनाव जीतने के लिए कभी पैसों की जरूरत नहीं पड़ी। किसान-मजदूर ही चुनाव के लिए चंदा देते थे। आजीवन भारतीय कृषक समाज के प्रदेश अध्यक्ष रहे बाबू त्रिलोक चंद किसान-मजदूर के चंदे से ही चुनाव लड़कर विधानसभा और लोकसभा पहुंचते रहे।

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जहांगीराबाद के गांव जलीलपुर में दो दिसंबर 1935 को किसान चैनसुख के घर जन्मे बाबू त्रिलोक चंद्र राजनीति के शिखर तक पहुंचे। प्रारंभिक पढ़ाई गांव में ही करने के बाद उन्होंने खुर्जा के एनआरसी कॉलेज से 1962 में वकालत की पढ़ाई पूरी की। वकालत की पढ़ाई करते दौरान ही चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल से 1962 में छतारी विधानसभा से चुनाव लड़ा।
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पहले चुनाव में त्रिलोक चंद्र को मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा। 32 साल की उम्र में वह 1967 में बीकेडी की तरफ से शिकारपुर विधानसभा से चुनाव लड़े और बड़े अंतर से जीते भी। पहली बार विधानसभा पहुंचे त्रिलोकचंद्र तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह की सरकार में कारागार मंत्री बने।
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इसके बाद वह 1972 में शिकारपुर से ही चुनाव लड़े और मामूली अंतर से हार गए। 1977 में वह शिकारपुर विधानसभा से रिकॉर्ड वोटों से जीत हासिल कर तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबू बनारसी दास की सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री बने। 1980 में त्रिलोक चंद्र लोकदल मुखिया चौधरी चरण सिंह के निर्देश पर खुर्जा लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर संसद पहुंचे।

1984 में वह चौधरी चरण सिंह की दलित-मजदूर किसान पार्टी से शिकारपुर विधानसभा से चुनाव जीते और तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी की सरकार में विधानसभा उपाध्यक्ष रहे। बाबू त्रिलोक चंद्र को किसी चुनाव में पैसे की जरूरत नहीं पड़ती थीं। पिछले दिनों उनका देहावसान हो गया।

राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ थे बाबूजी
चौधरी चरण सिंह के करीबी रहे बाबू त्रिलोक चंद्र राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ थे। यही कारण है कि उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत को किसी पुत्र या पुत्री को नहीं सौंपा। वह आजीवन चौधरी चरण सिंह के पदचिह्नों पर चले।  उनके दोनों बेटे गांव में रहकर कृषि कार्य करते हैं।


बाबूजी के खाते में थे 12 हजार रुपये
कई सरकारों में अहम मंत्रालय संभालने वाले बाबू त्रिलोक चंद्र जीवनभर ईमानदार रहे। दोनों बेटे कृषि कार्य करते हैं। उनके बेटे धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि मरने के बाद बाबूजी के खाते में महज 12 हजार रुपये थे।

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