{"_id":"16061","slug":"Bulandshahr-16061-110","type":"story","status":"publish","title_hn":"पीड़ितों की आंखों में जिंदा हैं जुल्मों के निशां","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पीड़ितों की आंखों में जिंदा हैं जुल्मों के निशां
Bulandshahr
Updated Tue, 08 May 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन
सिकंदराबाद/ककोड़। पहली बरसी पर सोमवार को किसान और सियासी दल के नेता भट्टा-पारसौल पहुंचे। उन्होंने मृतक किसानों के परिवारों को सांत्वना दी। इस दौरान शहीद किसानों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए।
सोमवार सुबह करीब सात बजे गांव पारसौल, मुतैना, सक्का, आच्छेपुर, ठसराना के किसान सैकड़ों की तादाद में धरना स्थल पर पहुंचे। किसानों ने सात मई, 2011 को पुलिस की गोली का शिकार किसान हरीओम, राजपाल और राजवीर को श्रद्धाजंलि दी। सभा की अध्यक्षता हरदन सिंह और संचालन अजीत दौला ने किया। हरदन सिंह ने कहा कि भूमि अधिग्रहण की आड़ में तत्कालीन यूपी सरकार ने किसानों पर अत्याचार किए। इससे भट्टा और पारसौल के तीन किसानोें की मौत हो गई थी। एक वर्ष पुराने पुलिस के अत्याचार को याद कर आज भी किसान सिहर उठते हैं। इस दौरान किसानों के अलावा कांग्रेस के धीरेंद्र सिंह, खुर्जा विधायक बंशी पहाड़िया, रमन यादव, चिन्ना ठाकुर, मनवीर तेवतिया की पत्नी नूतन तेवतिया, सुभाष यादव, सतपाल यादव, त्रिलोक चंद्र, योगेंद्र चौधरी ने तत्कालीन सरकार की आलोचना की। नेताओं ने सात मई को काला दिवस घोषित किया।
भट्टा नहीं पहुंचे बड़े नेता
एक साल में ही राजनीतिक दलों के बड़े नेता भट्टा-पारसौल को भूल गए। छोटे नेताओं को छोड़ दें तो बरसी पर बड़े नेता नहीं पहुंचे।
कब किया हुआ था...
17 जनवरी : यमुना एक्सप्रेस वे के किसान मुआवजे के लिए भट्टा धरने पर बैठे, 28 जनवरी को किसानों ने रेलवे ट्रैक बाधिक किया।
18 फरवरी : प्राधिकरण के डीसीईओ एवं डिप्टी कलेक्टर को बंधक बनाया।
23 फरवरी: मनवीर तेवतिया और सहयोगियों ने पीएसी जवानों को बंधक बनाया।
28 मार्च: मेरठ मंडल के कृषि उप निदेशक और समाज कल्याण विभाग के उपनिदेशक की गाड़ियों में आग लगाई और बंधक बनाया
28 अप्रैल : किसानों ने महामायानगर नगर डिप्टी सीएमओ के परिवार की गाड़ियों पर फायरिंग की, 04 मई: यमुना एक्सप्रेस वे का काम रोका गया
07 मई: रोडवेज के बंधक कर्मचारियों को बचाने आई पुलिस और किसानों में संघर्ष। जिसमें दो पुलिस वाले और तीन किसानों की मौत हो गई।
पारसौल के नाम से सहम उठता है कुलदीप
बुगरासी। ‘पुलिस ने बहुत मारा है। घरों में आग लगा दी। घर से लोगों के बाल पकड़कर निकाल दिया। बचाने वालों को भी बहुत पीटा।’ यह दर्द है 10 वर्षीय कुलदीप पुत्र सूरज का। जो एक साल पहले पारसौल के गांव में रहता था। वह अब एक वर्ष पूर्व गौतमबुद्धनगर के भट्टा-पारसौल में हुए पुलिस तांडव के बाद भागकर बुगरासी क्षेत्र के ग्राम किरयावली में बुआ राजकुमारी पत्नी चोखेलाल के घर आ गया। कुलदीप यहीं रहकर पढ़ाई कर रहा है। कुलदीप आज भी इस कदर दहशत में है कि परिजनों द्वारा वापस पारसौल ले जाने पर रोने लगता है। बुआ राजकुमारी बताती हैं कि जब कभी कुलदीप के सामने भट्टा-पारसौल कांड का जिक्र हो जाता है तो उस रात वे सो नहीं पाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
सोमवार सुबह करीब सात बजे गांव पारसौल, मुतैना, सक्का, आच्छेपुर, ठसराना के किसान सैकड़ों की तादाद में धरना स्थल पर पहुंचे। किसानों ने सात मई, 2011 को पुलिस की गोली का शिकार किसान हरीओम, राजपाल और राजवीर को श्रद्धाजंलि दी। सभा की अध्यक्षता हरदन सिंह और संचालन अजीत दौला ने किया। हरदन सिंह ने कहा कि भूमि अधिग्रहण की आड़ में तत्कालीन यूपी सरकार ने किसानों पर अत्याचार किए। इससे भट्टा और पारसौल के तीन किसानोें की मौत हो गई थी। एक वर्ष पुराने पुलिस के अत्याचार को याद कर आज भी किसान सिहर उठते हैं। इस दौरान किसानों के अलावा कांग्रेस के धीरेंद्र सिंह, खुर्जा विधायक बंशी पहाड़िया, रमन यादव, चिन्ना ठाकुर, मनवीर तेवतिया की पत्नी नूतन तेवतिया, सुभाष यादव, सतपाल यादव, त्रिलोक चंद्र, योगेंद्र चौधरी ने तत्कालीन सरकार की आलोचना की। नेताओं ने सात मई को काला दिवस घोषित किया।
विज्ञापन
भट्टा नहीं पहुंचे बड़े नेता
एक साल में ही राजनीतिक दलों के बड़े नेता भट्टा-पारसौल को भूल गए। छोटे नेताओं को छोड़ दें तो बरसी पर बड़े नेता नहीं पहुंचे।
कब किया हुआ था...
17 जनवरी : यमुना एक्सप्रेस वे के किसान मुआवजे के लिए भट्टा धरने पर बैठे, 28 जनवरी को किसानों ने रेलवे ट्रैक बाधिक किया।
18 फरवरी : प्राधिकरण के डीसीईओ एवं डिप्टी कलेक्टर को बंधक बनाया।
23 फरवरी: मनवीर तेवतिया और सहयोगियों ने पीएसी जवानों को बंधक बनाया।
28 मार्च: मेरठ मंडल के कृषि उप निदेशक और समाज कल्याण विभाग के उपनिदेशक की गाड़ियों में आग लगाई और बंधक बनाया
28 अप्रैल : किसानों ने महामायानगर नगर डिप्टी सीएमओ के परिवार की गाड़ियों पर फायरिंग की, 04 मई: यमुना एक्सप्रेस वे का काम रोका गया
07 मई: रोडवेज के बंधक कर्मचारियों को बचाने आई पुलिस और किसानों में संघर्ष। जिसमें दो पुलिस वाले और तीन किसानों की मौत हो गई।
पारसौल के नाम से सहम उठता है कुलदीप
बुगरासी। ‘पुलिस ने बहुत मारा है। घरों में आग लगा दी। घर से लोगों के बाल पकड़कर निकाल दिया। बचाने वालों को भी बहुत पीटा।’ यह दर्द है 10 वर्षीय कुलदीप पुत्र सूरज का। जो एक साल पहले पारसौल के गांव में रहता था। वह अब एक वर्ष पूर्व गौतमबुद्धनगर के भट्टा-पारसौल में हुए पुलिस तांडव के बाद भागकर बुगरासी क्षेत्र के ग्राम किरयावली में बुआ राजकुमारी पत्नी चोखेलाल के घर आ गया। कुलदीप यहीं रहकर पढ़ाई कर रहा है। कुलदीप आज भी इस कदर दहशत में है कि परिजनों द्वारा वापस पारसौल ले जाने पर रोने लगता है। बुआ राजकुमारी बताती हैं कि जब कभी कुलदीप के सामने भट्टा-पारसौल कांड का जिक्र हो जाता है तो उस रात वे सो नहीं पाता है।
विज्ञापन