{"_id":"590f67294f1c1b3b54851287","slug":"salma-demand-in-kolkata-century-goes-crazy","type":"story","status":"publish","title_hn":"कोलकाता में ‘सलमा’ की डिमांड, ‘सेंचुरी’ निकला दगाबाज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कोलकाता में ‘सलमा’ की डिमांड, ‘सेंचुरी’ निकला दगाबाज
अमर उजाला ब्यूरो उझानी (बदायूं)।
Updated Mon, 08 May 2017 12:06 AM IST
विज्ञापन
तरबूज
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कटरी के हाईब्रिड तरबूज की हरियाणा और दिल्ली में भी लोडिंग शुरू
नेपाल तक पहुंच रहा है बदायूं, संभल और फर्रुखाबाद के तरबूज
हाईब्रिड प्रजातियों का तरबूज इस बार देश के कई राज्यों के लोगों की पसंद में शुमार हो गया है। गंगा की कटरी से जुड़े बदायूं और संभल समेत फर्रुखाबाद जिले में इस बार उत्पादन पिछले साल के मुकाबले करीब 20 फीसदी कम रहा लेकिन डिमांड बढ़ती गई। हाईब्रिड प्रजाति में सेंचुरी खेतों में ही दगा दे गया। सलमा प्रजाति के तरबूज की पश्चिम बंगाल के लिए जो खेप लोड की गई, उसे हाथोंहाथ खरीदार मिल गए। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में ‘सलमा’ की डिमांड सबसे ऊपर है।
संभल के गुन्नौर से लेकर फर्रुखाबाद तक कटरी की बेल्ट में कई इलाके ऐसे हैं, जहां पालेज की खेती में खासकर तरबूज को वरीयता मिलती रही है। किसान ककड़ी और खरबूजे की खेती भी करते हैं लेकिन उत्पादन कम होने की वजह से रकबा कम होता गया। तरबूज की हाईब्रिड प्रजातियों में इन दिनों नंबर- 295 और सलमा की पैदावार अच्छी हुई है। सेंचुरी प्रजाति की कई किसानों ने खेती की लेकिन उत्पादन पहले के मुकाबले काफी कम रहा। उसका रेट भी चार सौ रुपया प्रति क्विंटल से ऊपर नहीं पहुंच पाया। सेंचुरी नामक तरबूज आकार में लौकी की तरह होता है। अच्छी गुणवत्ता की सलमा प्रजाति का थोक में रेट पांच से छह सौ रुपया प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। कोलकाता से आकर कछला में डेरा जमाए बैठे थोक के व्यापारी बाबू ने तो पश्चिम बंगाल के कई जिलों के लिए आठ दिन के अंदर 20 ट्रक माल लोड कराके भेज दिया है। बाबू के अनुसार, उसने सलमा प्रजाति की पहली खेप भेजी तो वह सबसे पहले बिक गया। इलाके के किसानों में हरपाल कहते हैं कि जो व्यापारी इलाके में पहुंचे हैं, उनमें से कई लोग हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और नेपाल को भी ट्रक लोड कराके भेज रहे हैं।
जौनपुरी और मटया प्रजाति से मोहभंग
उझानी। प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र से पहुंचे जौनपुरी प्रजाति के तरबूज के प्रति इलाके के किसानों का खासा आकर्षण रहा था। कटरी में भी जौनपुरी तरबूज बहुतायत में उगाया गया। पांच साल पहले तक जौनपुरी की डिमांड भी अधिक थी। आकार में छोटा लेकिन मिठास की वजह से लोगों ने उसे पसंद भी खूब किया। कमोवेश ऐसा ही हाल मटया प्रजाति का भी रहा। मटया आकार में बड़ा होता है। वह पकने में ज्यादा वक्त लगाता है, सो किसानों ने उसे भी नजरअंदाज कर दिया।
विज्ञापन
कीट के प्रकोप से उत्पादन में गिरावट
उझानी। तरबूज की खेती के जानकारों की मानें तो इस बार गंगा में जलस्तर पिछले साल के मुकाबले कम रहा। इस वजह से किसानों को समय पर सिंचाई करने में भी दिक्कत हुई। तरबूज एक ऐसी खेती है जिसमें मेंथा से अधिक बार सिचाई की आवश्यकता पड़ती है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. अर्जुन सिंह कहते हैं कि सिंचाई में दिक्कत की वजह से पालेज पर कीट का प्रकोप बढ़ गया था। कीट ने पालेज को करीब 20 फीसदी तक नुकसान भी पहुंचाया।
विज्ञापन
नेपाल तक पहुंच रहा है बदायूं, संभल और फर्रुखाबाद के तरबूज
हाईब्रिड प्रजातियों का तरबूज इस बार देश के कई राज्यों के लोगों की पसंद में शुमार हो गया है। गंगा की कटरी से जुड़े बदायूं और संभल समेत फर्रुखाबाद जिले में इस बार उत्पादन पिछले साल के मुकाबले करीब 20 फीसदी कम रहा लेकिन डिमांड बढ़ती गई। हाईब्रिड प्रजाति में सेंचुरी खेतों में ही दगा दे गया। सलमा प्रजाति के तरबूज की पश्चिम बंगाल के लिए जो खेप लोड की गई, उसे हाथोंहाथ खरीदार मिल गए। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में ‘सलमा’ की डिमांड सबसे ऊपर है।
संभल के गुन्नौर से लेकर फर्रुखाबाद तक कटरी की बेल्ट में कई इलाके ऐसे हैं, जहां पालेज की खेती में खासकर तरबूज को वरीयता मिलती रही है। किसान ककड़ी और खरबूजे की खेती भी करते हैं लेकिन उत्पादन कम होने की वजह से रकबा कम होता गया। तरबूज की हाईब्रिड प्रजातियों में इन दिनों नंबर- 295 और सलमा की पैदावार अच्छी हुई है। सेंचुरी प्रजाति की कई किसानों ने खेती की लेकिन उत्पादन पहले के मुकाबले काफी कम रहा। उसका रेट भी चार सौ रुपया प्रति क्विंटल से ऊपर नहीं पहुंच पाया। सेंचुरी नामक तरबूज आकार में लौकी की तरह होता है। अच्छी गुणवत्ता की सलमा प्रजाति का थोक में रेट पांच से छह सौ रुपया प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। कोलकाता से आकर कछला में डेरा जमाए बैठे थोक के व्यापारी बाबू ने तो पश्चिम बंगाल के कई जिलों के लिए आठ दिन के अंदर 20 ट्रक माल लोड कराके भेज दिया है। बाबू के अनुसार, उसने सलमा प्रजाति की पहली खेप भेजी तो वह सबसे पहले बिक गया। इलाके के किसानों में हरपाल कहते हैं कि जो व्यापारी इलाके में पहुंचे हैं, उनमें से कई लोग हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और नेपाल को भी ट्रक लोड कराके भेज रहे हैं।
विज्ञापन
जौनपुरी और मटया प्रजाति से मोहभंग
उझानी। प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र से पहुंचे जौनपुरी प्रजाति के तरबूज के प्रति इलाके के किसानों का खासा आकर्षण रहा था। कटरी में भी जौनपुरी तरबूज बहुतायत में उगाया गया। पांच साल पहले तक जौनपुरी की डिमांड भी अधिक थी। आकार में छोटा लेकिन मिठास की वजह से लोगों ने उसे पसंद भी खूब किया। कमोवेश ऐसा ही हाल मटया प्रजाति का भी रहा। मटया आकार में बड़ा होता है। वह पकने में ज्यादा वक्त लगाता है, सो किसानों ने उसे भी नजरअंदाज कर दिया।
विज्ञापन
कीट के प्रकोप से उत्पादन में गिरावट
उझानी। तरबूज की खेती के जानकारों की मानें तो इस बार गंगा में जलस्तर पिछले साल के मुकाबले कम रहा। इस वजह से किसानों को समय पर सिंचाई करने में भी दिक्कत हुई। तरबूज एक ऐसी खेती है जिसमें मेंथा से अधिक बार सिचाई की आवश्यकता पड़ती है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. अर्जुन सिंह कहते हैं कि सिंचाई में दिक्कत की वजह से पालेज पर कीट का प्रकोप बढ़ गया था। कीट ने पालेज को करीब 20 फीसदी तक नुकसान भी पहुंचाया।