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मक्का पर पड़ी मौसम की मार, रेट में 30 फीसदी गिरावट
उझानी।
Updated Thu, 13 Jul 2017 12:14 AM IST
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किसान डेमो
पिछले दिनों बरसात में बहे थे मक्का उत्पादकों के अरमान
अच्छे उत्पादन के बाद भी लागत निकलना हुई मुश्किल
मक्का की खेती इस बार किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हुई है। उत्पादन हालांकि बंपर रहा लेकिन मक्का जैसे ही घर-आंगन में पहुंची मौसम ने ऐसी करवट बदली कि उत्पादकों के अरमानों पर पानी फिर गया। सुखाते समय ही भीग कर दागी हुई मक्का की मार्केट में डिमांड कम हो गई है। आढ़तों पर खरीदार दागी मक्का का रेट सात-आठ सौ रुपया प्रति क्विंटल से ज्यादा नहीं दे रहे हैं। रेट में तीस फीसदी तक की गिरावट की वजह से लागत निकलना भी मुश्किल हो गया है।
मक्का उत्पादन के सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो अगेती फसल ने उत्पादकों की बल्ले-बल्ले कर दी थी। प्रति बीघा करीब आठ क्विंटल तक की पैदावार लेने वाले वही किसान फायदे में रहे जिन्होंने सारा काम बरसात से पहले ही पूरा कर माल आढ़तों पर बेच दिया। लेकिन ऐसे किसानों की संख्या आठ-नौ फीसदी ही रही। ज्यादातर खेतों में मक्का की कटाई का काम जून के अंतिम सप्ताह तक चला। गहाई कराके किसानों ने मक्का सुखानी शुरू की, उसी दौरान बरसात ने अनाज का चपेट में ले लिया। किसानों की मानें तो 60 प्रतिशत तक मक्का बरसात में प्रभवित होकर दागी हो गई। कटे पड़े भुंटे सड़ने के कगार पर पहुंच गए।
इसके बाद एक भी दिन ऐसा नहीं आया जिस दिन मक्का सूख पाती। दागी मक्का के रेट को लेकर आढ़ती कृष्ण कुमार वार्ष्णेय उर्फ बॉबी कहते हैं कि बरसात में भीगी मक्का का भंडारण नहीं किया जा सकता। बरसात से पहले तक रेट प्रति क्विंटल 14 सौ रुपया तक था लेकिन दगीली मक्का को सात-आठ सौ रुपया प्रति क्विंटल से अधिक नहीं खरीदा जा सकता। इधर, लागत को लेकर किसानों का कहना है कि बुआई से लेकर गहाई तक प्रति बीघा चार हजार रुपया तक खर्च हो गया। तीन महीने की मेहनत-मजदूरी छोड़िए, लागत आना भी मुश्किल हो गया है।
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कइयों ने कर्ज लेकर बोए थे अरमान
उझानी। मक्का की खेती के प्रति इस साल रुझान अधिक रहा। बुआई के दौरान मौसम का मिजाज भी किसानों के अनुरूप रहा, सो उन्होंने सिंचाई से लेकर गहाई तक फसल की जरूरत को पूरा करने के लिए ब्याज पर रुपये लेने से भी मुंह नहीं मोड़ा। ऐसे ही किसानों में शामिल हरीराम कहते हैं कि पैदावार अच्छी रही लेकिन बरसात ने खेल खराब कर दिया। हरीराम की तरह की कई और किसानों को कर्ज की मूल रकम चुकाना तो दूर ब्याज देना भी मुश्किल हो गया है।
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वर्जन
मक्का उत्पादकों को बरसात की वजह से काफी नुकसान हुआ है। इसकी भरपाई कर पाना फिलहाल मुश्किल है। बरसात से मक्का की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। किसानों को चाहिए कि वह मक्का को सुखाने की कोशिश करते रहें। अगर फिर से बरसात हो तो उसे भीगने से बचाने की कोशिश की जाए।
- डॉ. अर्जुन सिंह, कृषि वैज्ञानिक
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अच्छे उत्पादन के बाद भी लागत निकलना हुई मुश्किल
मक्का की खेती इस बार किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हुई है। उत्पादन हालांकि बंपर रहा लेकिन मक्का जैसे ही घर-आंगन में पहुंची मौसम ने ऐसी करवट बदली कि उत्पादकों के अरमानों पर पानी फिर गया। सुखाते समय ही भीग कर दागी हुई मक्का की मार्केट में डिमांड कम हो गई है। आढ़तों पर खरीदार दागी मक्का का रेट सात-आठ सौ रुपया प्रति क्विंटल से ज्यादा नहीं दे रहे हैं। रेट में तीस फीसदी तक की गिरावट की वजह से लागत निकलना भी मुश्किल हो गया है।
मक्का उत्पादन के सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो अगेती फसल ने उत्पादकों की बल्ले-बल्ले कर दी थी। प्रति बीघा करीब आठ क्विंटल तक की पैदावार लेने वाले वही किसान फायदे में रहे जिन्होंने सारा काम बरसात से पहले ही पूरा कर माल आढ़तों पर बेच दिया। लेकिन ऐसे किसानों की संख्या आठ-नौ फीसदी ही रही। ज्यादातर खेतों में मक्का की कटाई का काम जून के अंतिम सप्ताह तक चला। गहाई कराके किसानों ने मक्का सुखानी शुरू की, उसी दौरान बरसात ने अनाज का चपेट में ले लिया। किसानों की मानें तो 60 प्रतिशत तक मक्का बरसात में प्रभवित होकर दागी हो गई। कटे पड़े भुंटे सड़ने के कगार पर पहुंच गए।
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इसके बाद एक भी दिन ऐसा नहीं आया जिस दिन मक्का सूख पाती। दागी मक्का के रेट को लेकर आढ़ती कृष्ण कुमार वार्ष्णेय उर्फ बॉबी कहते हैं कि बरसात में भीगी मक्का का भंडारण नहीं किया जा सकता। बरसात से पहले तक रेट प्रति क्विंटल 14 सौ रुपया तक था लेकिन दगीली मक्का को सात-आठ सौ रुपया प्रति क्विंटल से अधिक नहीं खरीदा जा सकता। इधर, लागत को लेकर किसानों का कहना है कि बुआई से लेकर गहाई तक प्रति बीघा चार हजार रुपया तक खर्च हो गया। तीन महीने की मेहनत-मजदूरी छोड़िए, लागत आना भी मुश्किल हो गया है।
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कइयों ने कर्ज लेकर बोए थे अरमान
उझानी। मक्का की खेती के प्रति इस साल रुझान अधिक रहा। बुआई के दौरान मौसम का मिजाज भी किसानों के अनुरूप रहा, सो उन्होंने सिंचाई से लेकर गहाई तक फसल की जरूरत को पूरा करने के लिए ब्याज पर रुपये लेने से भी मुंह नहीं मोड़ा। ऐसे ही किसानों में शामिल हरीराम कहते हैं कि पैदावार अच्छी रही लेकिन बरसात ने खेल खराब कर दिया। हरीराम की तरह की कई और किसानों को कर्ज की मूल रकम चुकाना तो दूर ब्याज देना भी मुश्किल हो गया है।
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वर्जन
मक्का उत्पादकों को बरसात की वजह से काफी नुकसान हुआ है। इसकी भरपाई कर पाना फिलहाल मुश्किल है। बरसात से मक्का की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। किसानों को चाहिए कि वह मक्का को सुखाने की कोशिश करते रहें। अगर फिर से बरसात हो तो उसे भीगने से बचाने की कोशिश की जाए।
- डॉ. अर्जुन सिंह, कृषि वैज्ञानिक