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इंसानों का अस्पताल, टहलते आवारा जानवर
बदायूं।
Updated Fri, 26 Feb 2016 08:05 PM IST
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करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी जिला महिला अस्पताल में व्यवस्थाएं पटरी पर नहीं आ रहीं। 79 बेड का यह अस्पताल सिर्फ औपचारिकताओं तक सीमित होकर रह गया है। स्थिति लगातार बदतर हो रही है। कहने को तो ये इंसानों का अस्पताल है, लेकिन टहलते जानवर हैं। जिम्मेदार अफसर भी इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। जननी सुरक्षा योजना, जननी शिशु सुरक्षा योजना समेत कई कल्याणकारी योजनाओं के बाद भी संस्थागत प्रसव की स्थिति नहीं संभल रही। बाल और मातृ मृत्युदर के मामले में भी स्थिति बदतर हो रही है।
सरकार संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। ताकि जननी-शिशु मृत्यु दर पर भी अंकुश लग सके। जिले में 79 बेड का महिला अस्पताल है, लेकिन इसका लाभ लोगों को नहीं मिल रहा। महिला अस्पताल में औसतन 15 से 20 महिलाएं रोज प्रसव के लिए पहुंचती हैं। इनमें ज्यादातर को रेफर कर दिया जाता है। जो बाहर जाने में असमर्थ रहते हैं, उनका मजबूरन यहां प्रसव कराया जाता है। इसकी औसतन संख्या सात-आठ प्रसव रोज की है। महिला अस्पताल में सिर्फ पांच डॉक्टरों की तैनाती है। इनमें दो गायनी सर्जन की हैं। पांच डॉक्टर में तीन डॉक्टर फोर्स लीव पर रहते हैं। ऐसे में स्थिति और भी बदतर हो रही है। पानी की उचित व्यवस्था नहीं है। गंदगी गेट से लकर अंदर तक नजर आती है।
न्यू वॉर्न केसर यूनिट का काम भी लटका
महिला अस्पताल में 40 लाख रुपये की लागत से न्यू वॉर्न केसर यूनिट का निर्माण होना है। इसका काम भी अधर में लटका है। भवन बनाने का जिम्मा पैक्सपैड को दिया गया है। कार्यदायी संस्था समय से काम पूरा नहीं कर सकी है। 40 लाख रुपये में 28 लाख भवन निर्माण को दिए गए थे और 12 लाख रुपये से उपकरणों की खरीद होनी है। धनराशि मिलने के बाद भी न्यू वॉर्न केयर यूनिट का काम जल्द पूरा होता नजर नहीं आ रहा। इलाज के अभाव में नवजात अक्सर दम तोड़ देते हैं।
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मेडिकोलीगल रिपोर्ट में भी होती है देरी
डॉक्टरों की मनमानी के चलते महिला अस्पताल में दुष्कर्म पीड़िताओं के मेडिकोलीगल रिपोर्ट में भी देरी होती है। नियमानुसार दुष्कर्म के मामले में 24 घंटे के भीतर मेडिकल हो जाना चाहिए, लेकिन यहां डॉक्टरों की मनमानी का यह आलत है कि मेडिकल में कई-कई दिन लग जाते हैं।
व्यवस्थाओं को सुधारने पर पूरा जोर है। न्यू वॉर्न केयर यूनिट का काम भी जल्द पूरा हो जाएगा। लापरवाही करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने पर हमारा जोर है।-डॉ. अनीता दत्ता, एडी हेल्थ
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सरकार संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। ताकि जननी-शिशु मृत्यु दर पर भी अंकुश लग सके। जिले में 79 बेड का महिला अस्पताल है, लेकिन इसका लाभ लोगों को नहीं मिल रहा। महिला अस्पताल में औसतन 15 से 20 महिलाएं रोज प्रसव के लिए पहुंचती हैं। इनमें ज्यादातर को रेफर कर दिया जाता है। जो बाहर जाने में असमर्थ रहते हैं, उनका मजबूरन यहां प्रसव कराया जाता है। इसकी औसतन संख्या सात-आठ प्रसव रोज की है। महिला अस्पताल में सिर्फ पांच डॉक्टरों की तैनाती है। इनमें दो गायनी सर्जन की हैं। पांच डॉक्टर में तीन डॉक्टर फोर्स लीव पर रहते हैं। ऐसे में स्थिति और भी बदतर हो रही है। पानी की उचित व्यवस्था नहीं है। गंदगी गेट से लकर अंदर तक नजर आती है।
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न्यू वॉर्न केसर यूनिट का काम भी लटका
महिला अस्पताल में 40 लाख रुपये की लागत से न्यू वॉर्न केसर यूनिट का निर्माण होना है। इसका काम भी अधर में लटका है। भवन बनाने का जिम्मा पैक्सपैड को दिया गया है। कार्यदायी संस्था समय से काम पूरा नहीं कर सकी है। 40 लाख रुपये में 28 लाख भवन निर्माण को दिए गए थे और 12 लाख रुपये से उपकरणों की खरीद होनी है। धनराशि मिलने के बाद भी न्यू वॉर्न केयर यूनिट का काम जल्द पूरा होता नजर नहीं आ रहा। इलाज के अभाव में नवजात अक्सर दम तोड़ देते हैं।
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मेडिकोलीगल रिपोर्ट में भी होती है देरी
डॉक्टरों की मनमानी के चलते महिला अस्पताल में दुष्कर्म पीड़िताओं के मेडिकोलीगल रिपोर्ट में भी देरी होती है। नियमानुसार दुष्कर्म के मामले में 24 घंटे के भीतर मेडिकल हो जाना चाहिए, लेकिन यहां डॉक्टरों की मनमानी का यह आलत है कि मेडिकल में कई-कई दिन लग जाते हैं।
व्यवस्थाओं को सुधारने पर पूरा जोर है। न्यू वॉर्न केयर यूनिट का काम भी जल्द पूरा हो जाएगा। लापरवाही करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने पर हमारा जोर है।-डॉ. अनीता दत्ता, एडी हेल्थ