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शहर के बाद गांव के छात्र भी आ रहे अवसाद में
Updated Tue, 17 May 2016 12:32 AM IST
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suicide
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अमूमन अब तक तो शहरी इलाकों में ही छात्रों में अवसाद देखा जाता था, लेकिन अब अवसाद की जद में गांव के विद्यार्थी भी आने लगे हैं। गांव के विद्यार्थियों में भी उत्तीर्ण होने और आगे बढ़ने की ललक पैदा हो रही है। हालांकि, फेल होने पर विद्यार्थियों के खुदकुशी जैसा कदम उठाने को लेकर समाजशास्त्री भी हैरत में हैं।
विद्यार्थियों पर परिवार वालों की अपेक्षाओं को भारी दवाब होता है। दास कॉलेज के समाजशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार सिंह की मानें तो विद्यार्थियों से उनके परिवार को अपेक्षाएं ज्यादा होती हैं, लेकिन उनको काउंसिलिंग नहीं मिलती। अपेक्षाओं पर भरा ने उतरने वह वह हताश हो जाते हैं। फेल होने पर खुदकुशी अवसाद कम हताशा ज्यादा है। इसके लिए जरूरी है कि शिक्षकों के साथ अभिभावक भी विद्यार्थियों की काउंसिलिंग करके उनका मनोबल बढ़ाएं। यह कहना भी गलत नहीं कि शहरी इलाके में विद्यार्थियों को काउंसिलिंग मिल जाती है, जबकि गांवों में ज्यादातर विद्यार्थियों को काउंसिलिंग नहीं मिलती।
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विद्यार्थियों पर परिवार वालों की अपेक्षाओं को भारी दवाब होता है। दास कॉलेज के समाजशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार सिंह की मानें तो विद्यार्थियों से उनके परिवार को अपेक्षाएं ज्यादा होती हैं, लेकिन उनको काउंसिलिंग नहीं मिलती। अपेक्षाओं पर भरा ने उतरने वह वह हताश हो जाते हैं। फेल होने पर खुदकुशी अवसाद कम हताशा ज्यादा है। इसके लिए जरूरी है कि शिक्षकों के साथ अभिभावक भी विद्यार्थियों की काउंसिलिंग करके उनका मनोबल बढ़ाएं। यह कहना भी गलत नहीं कि शहरी इलाके में विद्यार्थियों को काउंसिलिंग मिल जाती है, जबकि गांवों में ज्यादातर विद्यार्थियों को काउंसिलिंग नहीं मिलती।
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