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कृष्ण भक्ति में सराबोर व्यक्ति पर नहीं पड़ता मोह, माया का असर
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उझानी (बदायूं)। हनुमान मंदिर परिसर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में बृहस्पतिवार को परमानंद महाराज ने कृष्ण जन्म और गोकुल में उनकी बाल्यावस्था से जुड़े प्रसंग सुनाए। उन्होंने कृष्ण के प्रति भक्ति का भी जिक्र किया। कहा- कृष्ण के प्रेम में गोपिकाएं सुध-बुध खो बैठती थीं। इंसान ईश्वर की भक्ति में रम जाए तो उस पर मोह और माया का असर नहीं पड़ता।
कथावाचक परमानंद महाराज ने कहा कि श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं से अच्छे आचरण का संदेश देने का काम किया है। उनके जन्म से पहले माता देवकी को मिले कष्टों के बारे में जब कोई सोचता है तो वह सिहर उठता है। प्रभु तो अजन्मे हैं। जन्म भी उनकी लीलाओं का हिस्सा है। गोकुल में बाल्यावस्था के दौरान भगवान कृष्ण ने हरेक को रिझा लिया था। गोपिकाएं भी उनके प्रेम में दीवानी हो गईं। उद्यव आगमन से लेकर अक्रूर के साथ मथुरा गमन और इससे पहले के कई उदाहरण गोपिकाओं की दीवानगी प्रमाणित करते हैं।
बाल्यावस्था में उन्होंने राक्षस और राक्षसी का वध कर दिया था। कृष्ण के प्रति इंसान में अटूट आस्था है। उनके प्रति भक्ति भाव में इंसान सबकुछ भुला बैठता है। वह मोह और माया के जाल में भी नहीं फंसता। कथावाचक ने कहा कि जीवन को सफल बनाने के लिए प्रभु में ध्यान लगाना होगा। वह अपने भक्त को सर्वोपरि मानते हैं। सुख और दुख में वह इंसान का साथ नहीं छोड़ते। कथा की व्यवस्थाओं में गोपीबल्लभ शर्मा, नीरज माहेश्वरी, उदय सिंघल आदि का सहयोग रहा।
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कथावाचक परमानंद महाराज ने कहा कि श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं से अच्छे आचरण का संदेश देने का काम किया है। उनके जन्म से पहले माता देवकी को मिले कष्टों के बारे में जब कोई सोचता है तो वह सिहर उठता है। प्रभु तो अजन्मे हैं। जन्म भी उनकी लीलाओं का हिस्सा है। गोकुल में बाल्यावस्था के दौरान भगवान कृष्ण ने हरेक को रिझा लिया था। गोपिकाएं भी उनके प्रेम में दीवानी हो गईं। उद्यव आगमन से लेकर अक्रूर के साथ मथुरा गमन और इससे पहले के कई उदाहरण गोपिकाओं की दीवानगी प्रमाणित करते हैं।
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बाल्यावस्था में उन्होंने राक्षस और राक्षसी का वध कर दिया था। कृष्ण के प्रति इंसान में अटूट आस्था है। उनके प्रति भक्ति भाव में इंसान सबकुछ भुला बैठता है। वह मोह और माया के जाल में भी नहीं फंसता। कथावाचक ने कहा कि जीवन को सफल बनाने के लिए प्रभु में ध्यान लगाना होगा। वह अपने भक्त को सर्वोपरि मानते हैं। सुख और दुख में वह इंसान का साथ नहीं छोड़ते। कथा की व्यवस्थाओं में गोपीबल्लभ शर्मा, नीरज माहेश्वरी, उदय सिंघल आदि का सहयोग रहा।
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