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हर शिकायत पर लगाई फर्जी जांच रिपोर्ट
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बदायूं। किसान सहकारी समिति के निलंबित सचिव राजेंद्रपाल शर्मा और उनका परिवार पिछले करीब एक साल से न्याय के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। उन्होंने कई बार ऑनलाइन पोर्टल पर शिकायतें कीं, लेकिन उनका निस्तारण नहीं हुआ। आरोप है कि सभी शिकायतों पर फर्जी जांच रिपोर्ट लगाकर मामला खत्म कर दिया गया। 20 जुलाई को निलंबित समिति सचिव ने आखिरी शिकायत की थी, जिसमें न्याय न मिलने पर कुछ गलत करने की चेतावनी दी गई थी।
राजेंद्रपाल शर्मा के मुताबिक इस मामले की शुरुआत वर्ष 2020 में हुई थी। उस समय वह इस्लामनगर के सिठौली किसान सेवा सहकारी समिति के प्रभारी सचिव थे। अप्रैल 2020 में उन्हें गेहूं खरीद के दो केंद्रों का चार्ज दिया गया था। जहां उन्होंने सात हजार दो सौ क्विंटल गेहूं खरीद की थी। इसमें उन्होंने पल्लेदारी से लेकर परिवहन भाड़ा, मंडी शुल्क आदि के छह लाख रुपये का भुगतान अपने पास से किया था। इसका उन्हें एक रुपया भी भुगतान नहीं दिया गया। उन्होंने कई बार अपना भुगतान मांगा था। विभागीय अधिकारी सहयोग करने के बजाय अपना पीछा छुड़ाने लगे थे। उन्हें भुगतान न देना पड़े, इसलिए दो लाख 29 हजार रुपये के गबन का आरोप लगाकर राजेंद्रपाल को निलंबित कर दिया गया। उनकी दोनों समितियां सील कर दी गईं। फिर बिना किसी सूचना के दोनों समितियों के ताले तोड़कर दूसरे को चार्ज दे दिया गया। राजेंद्रपाल के मुताबिक उन्होंने पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करते हुए विभाग को 40 लाख रुपये का लाभ पहुंचाया। उन्होंने सौ प्रतिशत डिमांड की वसूली भी की। फिर भी उन्हें दोषी ठहरा दिया गया। हद तो तब हो गई कि जब उनका भुगतान किसी और को दे दिया गया। उन्होंने बताया कि उनके समिति पर 10 लाख रुपये निकलते हैं। ये रुपये खाते में पड़े भी थे। मगर कई बार कहने के बावजूद उन्हें रुपये नहीं दिए गए। आखिर में कह दिया गया कि उनका भुगतान कर दिया गया। उन्होंने इसका जिम्मेदार एडीओ प्रदीप यादव, एडीसीओ मनोज कुमार उत्तम, पीसीएफ डीएसओ संजीव को ठहराया है। उन्होंने इसकी जांच कराने की मांग की है।
राजेंद्रपाल शर्मा ने बताया कि उन्हें पांच हजार तीन सौ रुपये वेतन दिया जाता था। विभागीय अधिकारियों ने वेतन बढ़ाकर 11 हजार छह सौ रुपये कर दिया था। इसके आदेश भी दिए गए, लेकिन उनका वेतन नहीं बढ़ाया गया। इसकी वजह यह थी कि उन्हें पद से हटाना और उनका भुगतान न करना था।
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निलंबित सचिव राजेंद्रपाल के बेटे मनोज का आरोप है कि वर्ष 2019-2020 में साढ़े सात हजार कट्टे खाद आई थी। इसका खर्चा 16 रुपये प्रति कट्टा मिलना था, लेकिन उन्हें केवल आठ रुपये प्रति कट्टे के हिसाब से भुगतान किया गया। उनका एक लाख 25 हजार रुपये भाड़ा था। उसमें 42 हजार रुपये का ही भुगतान किया गया।
घोटाले की बुनियाद पर खड़ी हैं सहकारी समितियां
जिले में संचालित सहकारी समितियां घोटाले की बुनियाद पर खड़ी हैं। इनमें लाखों करोड़ों रुपये का घोटाला हो चुका है। तीन साल पहले पीसीएफ गोदामों में तीन करोड़ रुपये का खाद घोटाला हुआ था। इसमें कई बड़े अधिकारी फंस रहे थे, लेकिन मामला आकर चौकीदार पर अटक गया। फिर उसी को दोषी करार देकर चार्जशीट दाखिल कर दी गई। अभी तक ये खुलासा नहीं किया गया कि इसमें आरोपी परिवहन ठेकेदार आखिर कौन था? जब तक विवेचना चली तब तक परिवहन ठेकेदार पद ही लिखा गया। इसके अलावा डेढ़ करोड़ रुपये का खाद घोटाला और हुआ था। उसमें भी गोदाम प्रभारी और चौकीदार ही आरोपी बनाए गए।
तमाम नेताओं ने खींचे कदम, नहीं दिलाया न्याय
निलंबित सचिव राजेंद्रपाल के बेटे ने कई नेताओं के नाम गिनाए। उनका कहना है कि वह सबसे पहले अपने इलाके के भाजपा विधायक के पास पहुंचे। सांसद से भी शिकायत की थी। एक चेयरमैन को भी समस्या के बारे में बताया था, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला।
समिति सचिव का निलंबन हमने नहीं बल्कि बोर्ड ने किया था। उन पर दो लाख रुपये का गबन का आरोप है। हमसे तो वह वेतन मांग रहे थे। जबकि भाड़े का भुगतान पीसीएफ करती है। इन्होंने खाद बिक्री का पैसा जमा नहीं किया था। इससे कमेटी गठित कर समिति में ताले डाले गए थे। जब इन्होंने चार्ज नहीं छोड़ा तो दूसरे सचिव को चार्ज दिया गया। फिर इनके खिलाफ गबन की तहरीर इस्लामनगर थाने में कई दिन पहले दे दी गई। पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी तो हम क्या कर सकते हैं। यह पूरा घटनाक्रम अधिकारियों और व्यवस्था पर दबाव बनाने के लिए किया गया है। - मनोज कुमार उत्तम, एडीसीओ
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राजेंद्रपाल शर्मा के मुताबिक इस मामले की शुरुआत वर्ष 2020 में हुई थी। उस समय वह इस्लामनगर के सिठौली किसान सेवा सहकारी समिति के प्रभारी सचिव थे। अप्रैल 2020 में उन्हें गेहूं खरीद के दो केंद्रों का चार्ज दिया गया था। जहां उन्होंने सात हजार दो सौ क्विंटल गेहूं खरीद की थी। इसमें उन्होंने पल्लेदारी से लेकर परिवहन भाड़ा, मंडी शुल्क आदि के छह लाख रुपये का भुगतान अपने पास से किया था। इसका उन्हें एक रुपया भी भुगतान नहीं दिया गया। उन्होंने कई बार अपना भुगतान मांगा था। विभागीय अधिकारी सहयोग करने के बजाय अपना पीछा छुड़ाने लगे थे। उन्हें भुगतान न देना पड़े, इसलिए दो लाख 29 हजार रुपये के गबन का आरोप लगाकर राजेंद्रपाल को निलंबित कर दिया गया। उनकी दोनों समितियां सील कर दी गईं। फिर बिना किसी सूचना के दोनों समितियों के ताले तोड़कर दूसरे को चार्ज दे दिया गया। राजेंद्रपाल के मुताबिक उन्होंने पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम करते हुए विभाग को 40 लाख रुपये का लाभ पहुंचाया। उन्होंने सौ प्रतिशत डिमांड की वसूली भी की। फिर भी उन्हें दोषी ठहरा दिया गया। हद तो तब हो गई कि जब उनका भुगतान किसी और को दे दिया गया। उन्होंने बताया कि उनके समिति पर 10 लाख रुपये निकलते हैं। ये रुपये खाते में पड़े भी थे। मगर कई बार कहने के बावजूद उन्हें रुपये नहीं दिए गए। आखिर में कह दिया गया कि उनका भुगतान कर दिया गया। उन्होंने इसका जिम्मेदार एडीओ प्रदीप यादव, एडीसीओ मनोज कुमार उत्तम, पीसीएफ डीएसओ संजीव को ठहराया है। उन्होंने इसकी जांच कराने की मांग की है।
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राजेंद्रपाल शर्मा ने बताया कि उन्हें पांच हजार तीन सौ रुपये वेतन दिया जाता था। विभागीय अधिकारियों ने वेतन बढ़ाकर 11 हजार छह सौ रुपये कर दिया था। इसके आदेश भी दिए गए, लेकिन उनका वेतन नहीं बढ़ाया गया। इसकी वजह यह थी कि उन्हें पद से हटाना और उनका भुगतान न करना था।
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निलंबित सचिव राजेंद्रपाल के बेटे मनोज का आरोप है कि वर्ष 2019-2020 में साढ़े सात हजार कट्टे खाद आई थी। इसका खर्चा 16 रुपये प्रति कट्टा मिलना था, लेकिन उन्हें केवल आठ रुपये प्रति कट्टे के हिसाब से भुगतान किया गया। उनका एक लाख 25 हजार रुपये भाड़ा था। उसमें 42 हजार रुपये का ही भुगतान किया गया।
घोटाले की बुनियाद पर खड़ी हैं सहकारी समितियां
जिले में संचालित सहकारी समितियां घोटाले की बुनियाद पर खड़ी हैं। इनमें लाखों करोड़ों रुपये का घोटाला हो चुका है। तीन साल पहले पीसीएफ गोदामों में तीन करोड़ रुपये का खाद घोटाला हुआ था। इसमें कई बड़े अधिकारी फंस रहे थे, लेकिन मामला आकर चौकीदार पर अटक गया। फिर उसी को दोषी करार देकर चार्जशीट दाखिल कर दी गई। अभी तक ये खुलासा नहीं किया गया कि इसमें आरोपी परिवहन ठेकेदार आखिर कौन था? जब तक विवेचना चली तब तक परिवहन ठेकेदार पद ही लिखा गया। इसके अलावा डेढ़ करोड़ रुपये का खाद घोटाला और हुआ था। उसमें भी गोदाम प्रभारी और चौकीदार ही आरोपी बनाए गए।
तमाम नेताओं ने खींचे कदम, नहीं दिलाया न्याय
निलंबित सचिव राजेंद्रपाल के बेटे ने कई नेताओं के नाम गिनाए। उनका कहना है कि वह सबसे पहले अपने इलाके के भाजपा विधायक के पास पहुंचे। सांसद से भी शिकायत की थी। एक चेयरमैन को भी समस्या के बारे में बताया था, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला।
समिति सचिव का निलंबन हमने नहीं बल्कि बोर्ड ने किया था। उन पर दो लाख रुपये का गबन का आरोप है। हमसे तो वह वेतन मांग रहे थे। जबकि भाड़े का भुगतान पीसीएफ करती है। इन्होंने खाद बिक्री का पैसा जमा नहीं किया था। इससे कमेटी गठित कर समिति में ताले डाले गए थे। जब इन्होंने चार्ज नहीं छोड़ा तो दूसरे सचिव को चार्ज दिया गया। फिर इनके खिलाफ गबन की तहरीर इस्लामनगर थाने में कई दिन पहले दे दी गई। पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी तो हम क्या कर सकते हैं। यह पूरा घटनाक्रम अधिकारियों और व्यवस्था पर दबाव बनाने के लिए किया गया है। - मनोज कुमार उत्तम, एडीसीओ