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मेला ककोड़ा को बसाने के लिए बनने लगीं कच्ची सड़कें
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बदायूं। रुहेलखंड के मिनी अर्द्धकुंभ मेला ककोड़ा की तैयारियां तेजी से चल रहीं हैं। मुख्य सड़क से मेला स्थल तक जाने वाले कच्चे रास्तों को बनवाने का भी काम शुरू हो गया है। इसके लिए कच्चे रास्तों पर पतेल डाली जाने लगी है। वहीं किसान खुद ही अपनी फसलों को काटने में लगे हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर गंगा के किनारे हजारों बीघा रेतीली भूमि पर हर साल ऐतिहासिक मेला लगता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन मुख्य स्नान के दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाते हैं। रेत की चादर पर लगने वाले मेले में कई राज्यों के दुकानदार आते हैं। पड़ोसी जिला कासगंज की जमीन पर भी मेला लगता है। जिला पंचायत की अगुवाई में लगने वाले इस मेले को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेजी से चल रहीं हैं। चूंकि मुख्य सड़क से मेला स्थल दो से तीन किलोमीटर तक दूर लगता है। इसलिए हर साल श्रद्धालुओं की सुविधा को कच्ची सड़क बनती है। आवागमन में श्रद्धालुओं की किसी तरह की असुविधा न हो और छोटे वाहन निर्धारित पार्किंग स्थल तक पहुंच सकें इसके लिए कच्ची सड़क को अच्छे तरीके से बनवाया जाता है। इसमें पतेल का भी इस्तेमाल किया जाता है। चूंकि मेला खत्म होने के कुछ दिन बाद यहां के किसान अपनी फसलों को बोने लगते हैं। अब मेले का समय नजदीक आ गया है। ऐसे में प्रशासन ने सभी किसानों को अपनी फसलें काट लेने को कह दिया था। किसानों के फसलें काटने के बाद कच्ची सड़कों को बनाने का भी काम तेजी पकड़ गया है।
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जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर गंगा के किनारे हजारों बीघा रेतीली भूमि पर हर साल ऐतिहासिक मेला लगता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन मुख्य स्नान के दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाते हैं। रेत की चादर पर लगने वाले मेले में कई राज्यों के दुकानदार आते हैं। पड़ोसी जिला कासगंज की जमीन पर भी मेला लगता है। जिला पंचायत की अगुवाई में लगने वाले इस मेले को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेजी से चल रहीं हैं। चूंकि मुख्य सड़क से मेला स्थल दो से तीन किलोमीटर तक दूर लगता है। इसलिए हर साल श्रद्धालुओं की सुविधा को कच्ची सड़क बनती है। आवागमन में श्रद्धालुओं की किसी तरह की असुविधा न हो और छोटे वाहन निर्धारित पार्किंग स्थल तक पहुंच सकें इसके लिए कच्ची सड़क को अच्छे तरीके से बनवाया जाता है। इसमें पतेल का भी इस्तेमाल किया जाता है। चूंकि मेला खत्म होने के कुछ दिन बाद यहां के किसान अपनी फसलों को बोने लगते हैं। अब मेले का समय नजदीक आ गया है। ऐसे में प्रशासन ने सभी किसानों को अपनी फसलें काट लेने को कह दिया था। किसानों के फसलें काटने के बाद कच्ची सड़कों को बनाने का भी काम तेजी पकड़ गया है।
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