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Budaun News: मोबाइल की गिरफ्त में बचपन... बढ़ रहा वर्चुअल ऑटिज्म का खतरा
Sun, 23 Nov 2025 02:27 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
Updated Sun, 23 Nov 2025 02:27 AM IST
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बदायूं। छोटे बच्चों को चुप कराने या दूध पिलाते समय मोबाइल थमा देना, आजकल माता-पिता की आम आदत बन गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह आदत बच्चों के लिए खतरा साबित हो रही है। लगातार मोबाइल स्क्रीन के संपर्क में रहने से बच्चों में स्क्रीन एडिक्शन, धीमा विकास, भाषा सीखने में बाधा और परिजनों से भावनात्मक दूरी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई बच्चों में तो इसका प्रभाव इतना गंभीर हो गया कि उन्हें वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षण तक दिखाई देने लगे।
जिला अस्पताल में ऐसे बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जिन्हें स्क्रीन से दूर करने पर वे रोते, चिढ़ते या प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं। जनरल फिजिशियन डॉ. अलंकार सोलंकी ने कहा कि दो वर्ष तक के बच्चों को मोबाइल फोन बिल्कुल नहीं दिखाना चाहिए। अधिक स्क्रीन उपयोग से बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म जैसी स्थिति पैदा हो जाती है, जिसमें बच्चा परिवार के सदस्यों के बुलाने पर प्रतिक्रिया नहीं देता, लेकिन मोबाइल पर बोले गए डायलॉग या आवाज पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है।
वरिष्ठ बालरोग विशेषज्ञ डॉ. शुकुमार के अनुसार बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम उनकी आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचा रहा है। कई मामलों में बच्चे केवल मोबाइल हाथ में मिलने पर ही शांत होते हैं। यहां तक की अस्पताल में चेकअप तक करने नहीं देते जब तक कि उन्हें स्क्रीन न दिखाई जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति माता-पिता की ओ से ही बनाई गई है, क्योंकि वे बच्चों को चुप कराने के लिए मोबाइल को आसान समाधान की तरह इस्तेमाल करते हैं।
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आंखों, दिमाग और व्यवहार पर बढ़ रहा खतरा
-क्लीनिकल साइक्लोजिस्ट ने डॉ. सर्वेश कुमारी ने बताया कि मां-बाप की ओर से दूध की बोतल लगाकर बच्चे के हाथ में मोबाइल थमाना उसके खाने की आदतों, आत्म-नियमन क्षमता, और संवेग नियंत्रण को कमजोर कर रहा है। उन्होंने कहा कि कई माता-पिता खुद भी स्क्रीन एडिक्शन का शिकार हैं, जिस कारण बच्चों की समस्या और बढ़ जाती है। अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से बच्चों में आंखों की समस्याएं, दिमागी दवाब, और व्यावहारिक परिवर्तन तेजी से बढ़ रहे हैं।
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ये हो रही परेशानी
-भाषा विकास बाधित
-स्वाद और भोजन पहचानने में दिक्कत
-मोटापा बढ़ने की संभावना
-मानसिक सहन क्षमता कम होना
-आंखों की रोशनी पर प्रभाव
-परिवार से भावनात्मक दूरी
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बचाव के उपाय
-बच्चा रोए तो फोन देने के बजाय उसकी समस्या समझें।
-दो वर्ष तक बच्चों को मोबाइल बिल्कुल न दिखाएं।
-बोतल से बच्चे को दूध पिलाते समय उसे गोद में रखें, स्क्रीन न दिखाएं।
-खाना खिलाते समय बच्चे से बातचीत करें।
-माता-पिता खुद भी स्क्रीन से दूरी रखें ताकि बच्चे अनुकरण न करें।
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जिला अस्पताल में ऐसे बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जिन्हें स्क्रीन से दूर करने पर वे रोते, चिढ़ते या प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं। जनरल फिजिशियन डॉ. अलंकार सोलंकी ने कहा कि दो वर्ष तक के बच्चों को मोबाइल फोन बिल्कुल नहीं दिखाना चाहिए। अधिक स्क्रीन उपयोग से बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म जैसी स्थिति पैदा हो जाती है, जिसमें बच्चा परिवार के सदस्यों के बुलाने पर प्रतिक्रिया नहीं देता, लेकिन मोबाइल पर बोले गए डायलॉग या आवाज पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है।
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वरिष्ठ बालरोग विशेषज्ञ डॉ. शुकुमार के अनुसार बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम उनकी आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचा रहा है। कई मामलों में बच्चे केवल मोबाइल हाथ में मिलने पर ही शांत होते हैं। यहां तक की अस्पताल में चेकअप तक करने नहीं देते जब तक कि उन्हें स्क्रीन न दिखाई जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति माता-पिता की ओ से ही बनाई गई है, क्योंकि वे बच्चों को चुप कराने के लिए मोबाइल को आसान समाधान की तरह इस्तेमाल करते हैं।
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आंखों, दिमाग और व्यवहार पर बढ़ रहा खतरा
-क्लीनिकल साइक्लोजिस्ट ने डॉ. सर्वेश कुमारी ने बताया कि मां-बाप की ओर से दूध की बोतल लगाकर बच्चे के हाथ में मोबाइल थमाना उसके खाने की आदतों, आत्म-नियमन क्षमता, और संवेग नियंत्रण को कमजोर कर रहा है। उन्होंने कहा कि कई माता-पिता खुद भी स्क्रीन एडिक्शन का शिकार हैं, जिस कारण बच्चों की समस्या और बढ़ जाती है। अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से बच्चों में आंखों की समस्याएं, दिमागी दवाब, और व्यावहारिक परिवर्तन तेजी से बढ़ रहे हैं।
ये हो रही परेशानी
-भाषा विकास बाधित
-स्वाद और भोजन पहचानने में दिक्कत
-मोटापा बढ़ने की संभावना
-मानसिक सहन क्षमता कम होना
-आंखों की रोशनी पर प्रभाव
-परिवार से भावनात्मक दूरी
बचाव के उपाय
-बच्चा रोए तो फोन देने के बजाय उसकी समस्या समझें।
-दो वर्ष तक बच्चों को मोबाइल बिल्कुल न दिखाएं।
-बोतल से बच्चे को दूध पिलाते समय उसे गोद में रखें, स्क्रीन न दिखाएं।
-खाना खिलाते समय बच्चे से बातचीत करें।
-माता-पिता खुद भी स्क्रीन से दूरी रखें ताकि बच्चे अनुकरण न करें।