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रेहड़ मे लगे गौरैया के कृत्रिम घोंसले
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रेहड़ में लगे गौरैया के कृत्रिम घोंसले, पर गौरैया नहीं आई
रेहड़। पशु पक्षी प्रेमियों ने पक्षियों के संरक्षण, संवर्धन और उनकी भूख, प्यास मिटाने के लिए काफी कार्य करने के दावे किए। लेकिन स्थिति विपरीत है। विलुप्त होती जा रहीं गौरैया जैसी चिड़ियों को बचाने के लिये विश्व पक्षी सुरक्षा एवं संवर्धन के लिए बना संगठन भी असहाय हैं।
क्षेत्र के अशोक शर्मा, दिनेश कुमार, मनोज कुमार, जयपाल सिंह ने बताया कि वर्ष 2018 से जनपद सहित अमानगढ़ रेंजकर्मियों ने जागरूकता के लिये गांवों, स्कूलों में भाषण, पेटिंग, वाद विवाद आदि प्रतियोगिता कराई थीं। गौरैया के लिए लकड़ी के कृत्रिम घोंसले बनवा कर जंगलों, गांवों में लगवाए थे। लेकिन इन घोंसलों को चिड़िया ने आवास बनाना तो दूर, बैठना भी पसंद नहीं किया। अशोक कुमार शर्मा, चेतराम सिंह तोमर आदि का कहना है कि ये घोंसले गौरैया की प्रतीक्षा में गल गल कर टूटने को तैयार हैं। इस मिशन में काफी रुपया बर्बाद हो गया।
यह बात गांव का भी व्यक्ति जानता है कि पक्षी कृत्रिम घोंसले में नहीं रह सकता। यहां तक कि उसके टूटे घोंसले से बाहर गिरे अंडे को पुन: वहीं रख दिया जाये। तब भी पक्षी उसे स्वीकार नहीं करता। इन पक्षियों के विलुप्त होने का कारण गांवों में मकानों, पशुशाला के छप्पर, कड़ी युक्त मकानों की छतों का समाप्त होना हैं। अन्य जगह घोंसला बनाने पर शिकारी पक्षी इनके अंडों, बच्चों को खा जाते हैं।
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रेहड़। पशु पक्षी प्रेमियों ने पक्षियों के संरक्षण, संवर्धन और उनकी भूख, प्यास मिटाने के लिए काफी कार्य करने के दावे किए। लेकिन स्थिति विपरीत है। विलुप्त होती जा रहीं गौरैया जैसी चिड़ियों को बचाने के लिये विश्व पक्षी सुरक्षा एवं संवर्धन के लिए बना संगठन भी असहाय हैं।
क्षेत्र के अशोक शर्मा, दिनेश कुमार, मनोज कुमार, जयपाल सिंह ने बताया कि वर्ष 2018 से जनपद सहित अमानगढ़ रेंजकर्मियों ने जागरूकता के लिये गांवों, स्कूलों में भाषण, पेटिंग, वाद विवाद आदि प्रतियोगिता कराई थीं। गौरैया के लिए लकड़ी के कृत्रिम घोंसले बनवा कर जंगलों, गांवों में लगवाए थे। लेकिन इन घोंसलों को चिड़िया ने आवास बनाना तो दूर, बैठना भी पसंद नहीं किया। अशोक कुमार शर्मा, चेतराम सिंह तोमर आदि का कहना है कि ये घोंसले गौरैया की प्रतीक्षा में गल गल कर टूटने को तैयार हैं। इस मिशन में काफी रुपया बर्बाद हो गया।
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यह बात गांव का भी व्यक्ति जानता है कि पक्षी कृत्रिम घोंसले में नहीं रह सकता। यहां तक कि उसके टूटे घोंसले से बाहर गिरे अंडे को पुन: वहीं रख दिया जाये। तब भी पक्षी उसे स्वीकार नहीं करता। इन पक्षियों के विलुप्त होने का कारण गांवों में मकानों, पशुशाला के छप्पर, कड़ी युक्त मकानों की छतों का समाप्त होना हैं। अन्य जगह घोंसला बनाने पर शिकारी पक्षी इनके अंडों, बच्चों को खा जाते हैं।
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