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वैज्ञानिक शोध जीवन पर्यन्त की एक सतत प्रक्रिया
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वैज्ञानिक शोध जीवन पर्यंत सतत प्रक्रिया : डॉ. राजकुमार
बिजनौर। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम देहरादून के शोध वैज्ञानिक डॉ. राजकुमार सिंह ने कहा कि विज्ञान ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया है। शोध के लिए मानसिक परिपक्वता जरूरी है। खुली मानसिकता वाले व्यक्ति की सोच अधिक तथा क्रिएटिव होती है। उन्होंने शोधार्थी को शोध का लक्ष्य तय करने पर बल दिया।
वर्धमान कॉलेज में चल रहे फैकल्टी डेवलेपमेंट प्रोग्राम अर्थात एफडीपी कार्यक्रम के दूसरे दिन आईआईपी देहरादून के डॉ. राजकुमार सिंह ने सलेक्शन ऑफ टॉपिक एंड फार्मूलेशन ऑफ रिसर्च हाइपोथिसिस विषय पर टिप्स दिए। 19वीं सदी के वैज्ञानिक डार्विन को उद्धृत करते हुए कहा कि वैज्ञानिक सोच व्यक्ति की उच्च शिक्षा पर निर्भर नहीं करती है। शोध के लिए क्रिएटिव सोच होनी चाहिए। विज्ञान में कोई अंतिम शब्द नहीं है। शोध जीवन पर्यंत की सतत प्रक्रिया है। शोधार्थी शोध के लक्ष्य तय करें। कॉलेजों में छात्र-छात्राओं को शोध की बारीकियां बताई जाएं।
प्रथम सत्र के वार्ता समन्वयक डॉ. ओपी सिंह रहे। द्वितीय सत्र में मुख्य वक्ता चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के लाइब्रेरी एंड इंफोर्मेशन विभाग के हेड डॉ. जेडए सिद्दीकी रहे। उन्होंने कहा कि विश्व में भारत की शोध को लेकर रैंक गिरी है। भारत सरकार शोध को बढ़ावा दे रही है। यूजीसी ने शोध क्षेत्र में बदलाव किए हैं। ओरिजनल शोध को अनिवार्य किया गया है। नई शिक्षा नीति में इसके सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं। संयोजक डॉ. मुकेश कुमार ने आगामी कार्यक्रम की रूपरेखा बताई। डॉ. साबिर खान समन्वयक रहे। दोनों सेशन का संचालन डॉ. निदा खान ने किया।
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ये रहीं शोधार्थियों की जिज्ञासाएं
एफडीपी के संयोजक व वर्धमान कॉलेज बिजनौर में रसायन विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मुकेश कुमार ने बताया कि डॉ. गिरिराज सिंह ने पूछा कि विज्ञान और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं या विरोधी। इस पर डॉ. राजकुमार सिंह ने कहा कि शोधकर्ता को प्रगतिशील सोच का होना चाहिए। डॉ. बबिता चौधरी का सवाल था कि शिक्षा या शोध में किसे प्राथमिकता दें। जवाब था कि संसाधन के अनुसार निर्णय लें।
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बिजनौर। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम देहरादून के शोध वैज्ञानिक डॉ. राजकुमार सिंह ने कहा कि विज्ञान ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया है। शोध के लिए मानसिक परिपक्वता जरूरी है। खुली मानसिकता वाले व्यक्ति की सोच अधिक तथा क्रिएटिव होती है। उन्होंने शोधार्थी को शोध का लक्ष्य तय करने पर बल दिया।
वर्धमान कॉलेज में चल रहे फैकल्टी डेवलेपमेंट प्रोग्राम अर्थात एफडीपी कार्यक्रम के दूसरे दिन आईआईपी देहरादून के डॉ. राजकुमार सिंह ने सलेक्शन ऑफ टॉपिक एंड फार्मूलेशन ऑफ रिसर्च हाइपोथिसिस विषय पर टिप्स दिए। 19वीं सदी के वैज्ञानिक डार्विन को उद्धृत करते हुए कहा कि वैज्ञानिक सोच व्यक्ति की उच्च शिक्षा पर निर्भर नहीं करती है। शोध के लिए क्रिएटिव सोच होनी चाहिए। विज्ञान में कोई अंतिम शब्द नहीं है। शोध जीवन पर्यंत की सतत प्रक्रिया है। शोधार्थी शोध के लक्ष्य तय करें। कॉलेजों में छात्र-छात्राओं को शोध की बारीकियां बताई जाएं।
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प्रथम सत्र के वार्ता समन्वयक डॉ. ओपी सिंह रहे। द्वितीय सत्र में मुख्य वक्ता चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के लाइब्रेरी एंड इंफोर्मेशन विभाग के हेड डॉ. जेडए सिद्दीकी रहे। उन्होंने कहा कि विश्व में भारत की शोध को लेकर रैंक गिरी है। भारत सरकार शोध को बढ़ावा दे रही है। यूजीसी ने शोध क्षेत्र में बदलाव किए हैं। ओरिजनल शोध को अनिवार्य किया गया है। नई शिक्षा नीति में इसके सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं। संयोजक डॉ. मुकेश कुमार ने आगामी कार्यक्रम की रूपरेखा बताई। डॉ. साबिर खान समन्वयक रहे। दोनों सेशन का संचालन डॉ. निदा खान ने किया।
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ये रहीं शोधार्थियों की जिज्ञासाएं
एफडीपी के संयोजक व वर्धमान कॉलेज बिजनौर में रसायन विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मुकेश कुमार ने बताया कि डॉ. गिरिराज सिंह ने पूछा कि विज्ञान और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं या विरोधी। इस पर डॉ. राजकुमार सिंह ने कहा कि शोधकर्ता को प्रगतिशील सोच का होना चाहिए। डॉ. बबिता चौधरी का सवाल था कि शिक्षा या शोध में किसे प्राथमिकता दें। जवाब था कि संसाधन के अनुसार निर्णय लें।