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सरकारी स्कूल अब प्राइवेट स्कूलों को देने लगे मात
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स्कूल है सरकारी, सुविधा हैं प्राइवेट से बेहतर
स्योहारा। सरकारी स्कूल अब प्राइवेट स्कूलों को मात देने लगे हैं। संसाधन, ग्रीनरी, विद्यालयीय सौंदर्य, स्वच्छता, अनुशासन, स्तरीय पढ़ाई व सामान्य ज्ञान सरकारी प्राइमरी स्कूल की पहचान बनने लगा है। स्कूल में अब कक्षा में प्रोजेक्टर से पढ़ाई कराई जाती है। स्योहारा ब्लाक क्षेत्र में जटनंगला का प्राथमिक विद्यालय इसका उदाहरण बना है। जहां बच्चों की संख्या भी साल दर साल बढ़ी है।
यूं तो अनुशासनहीनता, अस्वच्छता, स्तरहीन शिक्षा के लिए सरकारी प्राइमरी स्कूल पहचाने जाते हैं। लेकिन यदि शिक्षक के मन में लगन हो तो सरकारी स्कूलों में भी बदलाव दिखाई देने लगाता है। ऐसा ही बदलाव हुआ है जटनंगला के प्राइमरी स्कूल में। यहां शिक्षा आधुनिक ज्ञान के साथ कदमताल कर रही है। स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए कोर्स के साथ साथ शिक्षक द्वारा अंग्रेजी स्पीकिंग का कोर्स भी कराया जा रहा है। विद्यालय में प्रवेश द्वार से ही बहुत करीने से कटी घास की बाउंड्रीवाल, सौंदर्य को बढ़ाने के लिए शानदार पेड़ पौधे स्वागत करते हैं। बच्चे पूर्ण रूप से ड्रेस कोड में आते हैं। स्कूल में दीवारों, क्लास रूम में मनोरंजक ज्ञानवर्द्धक पेंटिंग लगी हैं। बच्चों में अपनी कक्षा के अनुरूप अंग्रेजी बोलने समझने का ज्ञान है। किसी भी बच्चे से अंग्रेजी में सामान्य संवाद किया जा सकता है। राष्ट्रपिता, राज्यपाल का नाम, पिता का नाम, फलों, फूलों, जानवरों, पक्षियों आदि के नाम पूछे जा सकते हैं। बच्चों को 30 तक पहाड़े याद हैं।
प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक वैभव चौधरी का कहना है कि 2014 में यह विद्यालय भी अन्य विद्यालयों जैसा ही था। गांव में ओबीसी व सामान्य जाति के बच्चे तो इस विद्यालय में प्रवेश ही नहीं लेते थे। जिसे मैंने चुनौती के रूप में लिया। चार वर्ष पूर्व अपने खर्च से एक प्रोजेक्टर खरीदकर बच्चों को कथा - कहानियों के माध्यम से पढ़ाना शुरू किया। विद्यालय में सौंदर्यीकरण हेतु हेज लगाई, उसकी कटिंग कराई और पौधे लगाए। शौचालय नहीं था। इसलिए अपने पास से 30 हजार रुपये खर्च करके शौचालय बनवाया। बाद में ग्राम प्रधान द्वारा शौचालय की धनराशि दे दी, साथ ही इंटरलॉकिंग करा दी।
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- पांच साल पूर्व सिर्फ 9 बच्चे पढ़ते थे
जटनंगला के प्राइमरी स्कूल में वर्ष 2014 में सिर्फ 9 बच्चे पढ़ाई करने आते थे। जैसे जैसे स्कूल की हालत में सुधार हुआ, तो बच्चों की संख्या भी बढ़ गई। वैभव चौधरी ने बताया कि गांव में छह वर्ष से लेकर 11 वर्ष तक की आयु के 41 बच्चे हैं, जिनमें से 31 बच्चे प्राइमरी स्कूल में ही शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। मात्र 10 बच्चे ही प्राइवेट स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि शिक्षा अनुशासन, सामान्य ज्ञान आदि में उच्च स्तरीय मुकाम हासिल कर इस स्थिति में लाया जाए कि अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला किसी कान्वेंट स्कूल में ना कराकर गांव के प्राथमिक विद्यालय में ही कराएं।
- चार छात्रों को पढ़ाने के लिए तीन शिक्षक तैनात
स्योहारा। एक ओर जहां गांव जटनंगला का प्राथमिक विद्यालय मिसाल कायम कर रहा है। वहीं क्षेत्र के गांव मकनपुर के प्राथमिक विद्यालय की स्थिति इसके एकदम उलट है। इस स्कूल का न तो सौंदर्यीकरण हुआ है और न ही साफ-सफाई की व्यवस्था है। स्कूल में केवल चार ही छात्र पंजीकृत है। ये छात्र भी अधिकांश दिन विद्यालय से अनुपस्थित रहते हैं, जबकि इन छात्रों को पढ़ाने के लिए तीन अध्यापक तैनात हैं। इनमें एक प्रधानाध्यापिका, एक सहायक अध्यापक एवं एक शिक्षामित्र तैनात है। इसके अलावा एक आंगनबाड़ी केंद्र है। चार छात्रों की शिक्षा पर प्रतिमाह लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
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स्योहारा। सरकारी स्कूल अब प्राइवेट स्कूलों को मात देने लगे हैं। संसाधन, ग्रीनरी, विद्यालयीय सौंदर्य, स्वच्छता, अनुशासन, स्तरीय पढ़ाई व सामान्य ज्ञान सरकारी प्राइमरी स्कूल की पहचान बनने लगा है। स्कूल में अब कक्षा में प्रोजेक्टर से पढ़ाई कराई जाती है। स्योहारा ब्लाक क्षेत्र में जटनंगला का प्राथमिक विद्यालय इसका उदाहरण बना है। जहां बच्चों की संख्या भी साल दर साल बढ़ी है।
यूं तो अनुशासनहीनता, अस्वच्छता, स्तरहीन शिक्षा के लिए सरकारी प्राइमरी स्कूल पहचाने जाते हैं। लेकिन यदि शिक्षक के मन में लगन हो तो सरकारी स्कूलों में भी बदलाव दिखाई देने लगाता है। ऐसा ही बदलाव हुआ है जटनंगला के प्राइमरी स्कूल में। यहां शिक्षा आधुनिक ज्ञान के साथ कदमताल कर रही है। स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए कोर्स के साथ साथ शिक्षक द्वारा अंग्रेजी स्पीकिंग का कोर्स भी कराया जा रहा है। विद्यालय में प्रवेश द्वार से ही बहुत करीने से कटी घास की बाउंड्रीवाल, सौंदर्य को बढ़ाने के लिए शानदार पेड़ पौधे स्वागत करते हैं। बच्चे पूर्ण रूप से ड्रेस कोड में आते हैं। स्कूल में दीवारों, क्लास रूम में मनोरंजक ज्ञानवर्द्धक पेंटिंग लगी हैं। बच्चों में अपनी कक्षा के अनुरूप अंग्रेजी बोलने समझने का ज्ञान है। किसी भी बच्चे से अंग्रेजी में सामान्य संवाद किया जा सकता है। राष्ट्रपिता, राज्यपाल का नाम, पिता का नाम, फलों, फूलों, जानवरों, पक्षियों आदि के नाम पूछे जा सकते हैं। बच्चों को 30 तक पहाड़े याद हैं।
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प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक वैभव चौधरी का कहना है कि 2014 में यह विद्यालय भी अन्य विद्यालयों जैसा ही था। गांव में ओबीसी व सामान्य जाति के बच्चे तो इस विद्यालय में प्रवेश ही नहीं लेते थे। जिसे मैंने चुनौती के रूप में लिया। चार वर्ष पूर्व अपने खर्च से एक प्रोजेक्टर खरीदकर बच्चों को कथा - कहानियों के माध्यम से पढ़ाना शुरू किया। विद्यालय में सौंदर्यीकरण हेतु हेज लगाई, उसकी कटिंग कराई और पौधे लगाए। शौचालय नहीं था। इसलिए अपने पास से 30 हजार रुपये खर्च करके शौचालय बनवाया। बाद में ग्राम प्रधान द्वारा शौचालय की धनराशि दे दी, साथ ही इंटरलॉकिंग करा दी।
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- पांच साल पूर्व सिर्फ 9 बच्चे पढ़ते थे
जटनंगला के प्राइमरी स्कूल में वर्ष 2014 में सिर्फ 9 बच्चे पढ़ाई करने आते थे। जैसे जैसे स्कूल की हालत में सुधार हुआ, तो बच्चों की संख्या भी बढ़ गई। वैभव चौधरी ने बताया कि गांव में छह वर्ष से लेकर 11 वर्ष तक की आयु के 41 बच्चे हैं, जिनमें से 31 बच्चे प्राइमरी स्कूल में ही शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। मात्र 10 बच्चे ही प्राइवेट स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि शिक्षा अनुशासन, सामान्य ज्ञान आदि में उच्च स्तरीय मुकाम हासिल कर इस स्थिति में लाया जाए कि अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला किसी कान्वेंट स्कूल में ना कराकर गांव के प्राथमिक विद्यालय में ही कराएं।
- चार छात्रों को पढ़ाने के लिए तीन शिक्षक तैनात
स्योहारा। एक ओर जहां गांव जटनंगला का प्राथमिक विद्यालय मिसाल कायम कर रहा है। वहीं क्षेत्र के गांव मकनपुर के प्राथमिक विद्यालय की स्थिति इसके एकदम उलट है। इस स्कूल का न तो सौंदर्यीकरण हुआ है और न ही साफ-सफाई की व्यवस्था है। स्कूल में केवल चार ही छात्र पंजीकृत है। ये छात्र भी अधिकांश दिन विद्यालय से अनुपस्थित रहते हैं, जबकि इन छात्रों को पढ़ाने के लिए तीन अध्यापक तैनात हैं। इनमें एक प्रधानाध्यापिका, एक सहायक अध्यापक एवं एक शिक्षामित्र तैनात है। इसके अलावा एक आंगनबाड़ी केंद्र है। चार छात्रों की शिक्षा पर प्रतिमाह लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।