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चांदपुर को पहचान दिला रहा मंगलौरी लड्डू
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चांदपुर क्षेत्र में संचालित पावर कोल्हू पर गुड़ बनाते कारीगर।
- फोटो : BIJNOR
चांदपुर को पहचान दिला रहा ‘मंगलौरी लड्डू’
चांदपुर। चांदपुर मंडी कभी खांडसारी मंडी के नाम से देश में प्रसिद्ध थी। आज ये गुड़ मंडी के रूप में पहचान बना रही है। मंडी में करीब 25 गुड़ आढ़ती हैं। मंडी में आने वाले गुड़ को आढ़ती देश के अन्य राज्यों में भेजते हैं। इसके साथ मंगलौरी लड्डू के नाम से बनाया जा रहा गुड़ अपनी खास पहचान बना रहा है। इसे लोग बड़ी रुचि से खाते हैं।
क्षेत्र में लगे पावर कोल्हू पर तीन तरह का गुड़ मंगलौरी पीला, हल्का पीला, दड़ा तैयार किया जाता है। रुड़की क्षेत्र के कारीगरों द्वारा बनाया जा रहा छोटे आकार का लड्डू गुड़ देश के विभिन्न क्षेत्रों में मंगलौरी लड्डू के नाम से पहचान बनाए हुए है। मंगलौरी लड्डू का स्वाद अच्छा होने के कारण लोग इसे रुचि से खा रहे हैं। चांदपुर क्षेत्र में गुड का बड़ा कारोबार है। क्षेत्र के गांव अकौंधा, रौनिया, बास्टा, सिंघा, अम्हेड़ा, पैजनिया, गोयली, हल्लानंगला, सिसौना, खल्लासपुर आदि में बड़ी तादाद में पावर कोल्हू का संचालन हो रहा है। जिसमें गुड़ का लड्डू बनाया जाता है। जो कि ट्रकों में लोड होकर देश के अनेक राज्यों पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में जाता है।
उत्तराखंड के रुड़की क्षेत्र के गांव पुहाना, किशनपुर, खेड़ामुगल, पुरकाजी, लिब्बाहेड़ी, सिरचंदी, बरेड़ा, मंगलौर, चुड़ियाला आदि के लोग क्षेत्र में आकर पावर कोल्हू किराए पर लेकर गुड़ बनाते हैं। ये लोग कोल्हू पर काम करने वाले कारीगरों को भी अपने साथ ही लाते हैं। इनके कोल्हू पर आम गुड़ के साइज से छोटे साइज में गुड़ बनता है। जो कि मंगलौरी लड्डू के नाम से अपनी पहचान बना रहा है।
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गन्ना महंगा होने से बंद हो रहे कोल्हू
गांव पुहाना निवासी कोल्हू संचालक सोनू ने बताया कि करीब 12 साल से वे इस काम को कर रहे हैं। गुड़ के गत वर्ष के कारोबार को देखते हुए इस वर्ष क्षेत्र में कोल्हू की संख्या बहुत अधिक है। लेकिन पिछले साल के मुकाबले इस समय गन्ने का भाव अधिक होने से क्षेत्र में कई कोल्हू बंद होने के कगार पर हैं। पिछले साल करीब दो सौ, सवा दो सौ रुपये क्ंिटल गन्ना मिलता था। अब गन्ने के दाम 280 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक हैं। किशनपुर निवासी कोल्हू संचालक मोहम्मद मोबिन ने बताया कि करीब तीन साल से वे इस क्षेत्र में कोल्हू चला रहे हैं। इस गुड़ की ज्यादा मांग है। सिरचंदी निवासी मोहम्मद फरमान ने बताया कि वे क्षेत्र में करीब दस वर्ष से कोल्हू चला रहे हैं। उनका कहना है कि गुड़ बनाने का तरीका उसे स्वादिष्ट बनाता है।
मंगलौरी लड्डू के दाम हैं ज्यादा
सामान्य गुड़ में एक किलो में 10 से 12 लड्डू आते हैं। जबकि मंगलौरी गुड़ में एक किलोग्राम में 14 से 16 लड्डू चढ़ते हैं। इसका दाम भी सामान्य गुड़ से अधिक होता है। सामान्य आकार वाले गुड़ का दाम व मंगलौरी गुड़ की कीमत करीब 50 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर रहता है।
अधिक टैक्स के कारण खत्म हुआ खांडसारी उद्योग
किसी समय में चांदपुर में खांडसारी की बड़ी मंडी हुआ करती थी। पूरे जनपद व बाहर के जिलों से खांड चांदपुर मंडी में आढ़त पर आती थी जो देश के अन्य राज्यों में जाती थी। सन 1970 से सन 2000 तक चांदपुर में खांड का कारोबार भरपूर रहा। उसके बाद हल्का होता गया। 2005 तक चांदपुर से खांडसारी का काम खत्म सा हो गया। शिव दयाल गर्ग और अशोक कर्णवाल बताते हैं कि उस समय में जिले में खांडसारी की 400 इकाई से ज्यादा संचालित थीं और चीनी मिल कम थीं। चीनी मिल से अतिरिक्त गन्ना खांडसारी इकाइयों को शुगर मिल के मुकाबले कम दाम में मिल जाता था। चीनी मिल में गन्ने में करीब 11 प्रतिशत की रिकवरी रहती थी, जबकि खांडसारी में करीब 6 प्रतिशत रिकवरी होती है। सरकारी टैक्स अधिक होता था। इसलिए धीरे-धीरे खांडसारी उद्योग खत्म हो गया।
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चांदपुर। चांदपुर मंडी कभी खांडसारी मंडी के नाम से देश में प्रसिद्ध थी। आज ये गुड़ मंडी के रूप में पहचान बना रही है। मंडी में करीब 25 गुड़ आढ़ती हैं। मंडी में आने वाले गुड़ को आढ़ती देश के अन्य राज्यों में भेजते हैं। इसके साथ मंगलौरी लड्डू के नाम से बनाया जा रहा गुड़ अपनी खास पहचान बना रहा है। इसे लोग बड़ी रुचि से खाते हैं।
क्षेत्र में लगे पावर कोल्हू पर तीन तरह का गुड़ मंगलौरी पीला, हल्का पीला, दड़ा तैयार किया जाता है। रुड़की क्षेत्र के कारीगरों द्वारा बनाया जा रहा छोटे आकार का लड्डू गुड़ देश के विभिन्न क्षेत्रों में मंगलौरी लड्डू के नाम से पहचान बनाए हुए है। मंगलौरी लड्डू का स्वाद अच्छा होने के कारण लोग इसे रुचि से खा रहे हैं। चांदपुर क्षेत्र में गुड का बड़ा कारोबार है। क्षेत्र के गांव अकौंधा, रौनिया, बास्टा, सिंघा, अम्हेड़ा, पैजनिया, गोयली, हल्लानंगला, सिसौना, खल्लासपुर आदि में बड़ी तादाद में पावर कोल्हू का संचालन हो रहा है। जिसमें गुड़ का लड्डू बनाया जाता है। जो कि ट्रकों में लोड होकर देश के अनेक राज्यों पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में जाता है।
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उत्तराखंड के रुड़की क्षेत्र के गांव पुहाना, किशनपुर, खेड़ामुगल, पुरकाजी, लिब्बाहेड़ी, सिरचंदी, बरेड़ा, मंगलौर, चुड़ियाला आदि के लोग क्षेत्र में आकर पावर कोल्हू किराए पर लेकर गुड़ बनाते हैं। ये लोग कोल्हू पर काम करने वाले कारीगरों को भी अपने साथ ही लाते हैं। इनके कोल्हू पर आम गुड़ के साइज से छोटे साइज में गुड़ बनता है। जो कि मंगलौरी लड्डू के नाम से अपनी पहचान बना रहा है।
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गन्ना महंगा होने से बंद हो रहे कोल्हू
गांव पुहाना निवासी कोल्हू संचालक सोनू ने बताया कि करीब 12 साल से वे इस काम को कर रहे हैं। गुड़ के गत वर्ष के कारोबार को देखते हुए इस वर्ष क्षेत्र में कोल्हू की संख्या बहुत अधिक है। लेकिन पिछले साल के मुकाबले इस समय गन्ने का भाव अधिक होने से क्षेत्र में कई कोल्हू बंद होने के कगार पर हैं। पिछले साल करीब दो सौ, सवा दो सौ रुपये क्ंिटल गन्ना मिलता था। अब गन्ने के दाम 280 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक हैं। किशनपुर निवासी कोल्हू संचालक मोहम्मद मोबिन ने बताया कि करीब तीन साल से वे इस क्षेत्र में कोल्हू चला रहे हैं। इस गुड़ की ज्यादा मांग है। सिरचंदी निवासी मोहम्मद फरमान ने बताया कि वे क्षेत्र में करीब दस वर्ष से कोल्हू चला रहे हैं। उनका कहना है कि गुड़ बनाने का तरीका उसे स्वादिष्ट बनाता है।
मंगलौरी लड्डू के दाम हैं ज्यादा
सामान्य गुड़ में एक किलो में 10 से 12 लड्डू आते हैं। जबकि मंगलौरी गुड़ में एक किलोग्राम में 14 से 16 लड्डू चढ़ते हैं। इसका दाम भी सामान्य गुड़ से अधिक होता है। सामान्य आकार वाले गुड़ का दाम व मंगलौरी गुड़ की कीमत करीब 50 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर रहता है।
अधिक टैक्स के कारण खत्म हुआ खांडसारी उद्योग
किसी समय में चांदपुर में खांडसारी की बड़ी मंडी हुआ करती थी। पूरे जनपद व बाहर के जिलों से खांड चांदपुर मंडी में आढ़त पर आती थी जो देश के अन्य राज्यों में जाती थी। सन 1970 से सन 2000 तक चांदपुर में खांड का कारोबार भरपूर रहा। उसके बाद हल्का होता गया। 2005 तक चांदपुर से खांडसारी का काम खत्म सा हो गया। शिव दयाल गर्ग और अशोक कर्णवाल बताते हैं कि उस समय में जिले में खांडसारी की 400 इकाई से ज्यादा संचालित थीं और चीनी मिल कम थीं। चीनी मिल से अतिरिक्त गन्ना खांडसारी इकाइयों को शुगर मिल के मुकाबले कम दाम में मिल जाता था। चीनी मिल में गन्ने में करीब 11 प्रतिशत की रिकवरी रहती थी, जबकि खांडसारी में करीब 6 प्रतिशत रिकवरी होती है। सरकारी टैक्स अधिक होता था। इसलिए धीरे-धीरे खांडसारी उद्योग खत्म हो गया।