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ममता ने बदल दी गांव की महिलाओं की तकदीर
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ममता पाल।
- फोटो : BIJNOR
ममता ने बदल दी गांव की महिलाओं की तकदीर
बिजनौर। गांव खतापुर की ममता पाल ने गांव की महिलाओं को सखी समूह से जोड़कर स्वावलंबी बनाया। उन्होंने 250 से ज्यादा औरतों को स्वावलंबन से जोड़ा है। आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों को दिया जाने वाले पोषाहार को बनाने का काम भी उनके गांव की सखी समूह को ही दिया गया है।
गांव खतापुर निवासी ममता पाल एक गृहिणी हैं। कुछ समय पहले उनके गांव में आईसीआरपी के सदस्य आए और स्वरोजगार के बारे में बताया। टीम तो चली गई लेकिन ममता पाल में एक जज्बा जगा गई। ममता ने गांव की महिलाओं को स्वावलंबन से जोड़ने के बारे में सोचा। उन्होंने भागदौड़ की तो पता चला कि महिलाएं सखी समूह बनाकर रोजगार से जुड़ सकती हैं। उन्होंने गांव की महिलाओं को स्वरोजगार से जुड़ने को कहा। शुरूआत में महिलाओं ने काम करने से मना कर दिया, लेकिन कुछ ने पहल की तो एक के बाद महिलाएं जुड़ती चली गईं। केवल उनके ही गांव में 11-11 महिलाओं के 22 समूह बन गए। दूसरे गांव में जाकर भी उन्होंने कई समूह बनाए और स्वरोजगार से जुड़ने को प्रेरित किया।
महिलाओं के बैंक में खाते खुलवाए और काम के लिए ऋण दिलाया। आज उनके द्वारा खोले गए समूह की महिलाएं कपड़े के थैले, चप्पल आदि बना रही हैं। कपड़े भी सिल रही हैं। अब इन सखी समूह को बड़े स्तर पर काम मिलने लगा है। खतापुर की महिला समूह को पोषाहार बनाने का काम दिया गया है। गांव की महिलाएं कॉस्मेटिक पार्लर आदि भी खोल रही हैं और आमदनी करके अपने परिवार को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने में लगी हुई हैं। एडीओ आईएसडी अजय पाल का कहना है कि ममता ने महिलाओं के लिए उल्लेखनीय कार्य किया है। अगर हर ब्लॉक में इस तरह की आठ-दस महिलाएं भी हों तो वे पूरे जिले की महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत कर सकती हैं।
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स्वरोजगार से जुड़कर ही स्वावलंबन
ममता पाल का कहना है कि आर्थिक रूप से मजबूत महिला ही मजबूत परिवार का आधार होती है। उनकी समझ में ये बात आई तो उन्होंने बाकी महिलाओं को भी समझाया है। स्वरोजगार से जुड़कर महिलाओं को पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना चाहिए।
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बिजनौर। गांव खतापुर की ममता पाल ने गांव की महिलाओं को सखी समूह से जोड़कर स्वावलंबी बनाया। उन्होंने 250 से ज्यादा औरतों को स्वावलंबन से जोड़ा है। आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों को दिया जाने वाले पोषाहार को बनाने का काम भी उनके गांव की सखी समूह को ही दिया गया है।
गांव खतापुर निवासी ममता पाल एक गृहिणी हैं। कुछ समय पहले उनके गांव में आईसीआरपी के सदस्य आए और स्वरोजगार के बारे में बताया। टीम तो चली गई लेकिन ममता पाल में एक जज्बा जगा गई। ममता ने गांव की महिलाओं को स्वावलंबन से जोड़ने के बारे में सोचा। उन्होंने भागदौड़ की तो पता चला कि महिलाएं सखी समूह बनाकर रोजगार से जुड़ सकती हैं। उन्होंने गांव की महिलाओं को स्वरोजगार से जुड़ने को कहा। शुरूआत में महिलाओं ने काम करने से मना कर दिया, लेकिन कुछ ने पहल की तो एक के बाद महिलाएं जुड़ती चली गईं। केवल उनके ही गांव में 11-11 महिलाओं के 22 समूह बन गए। दूसरे गांव में जाकर भी उन्होंने कई समूह बनाए और स्वरोजगार से जुड़ने को प्रेरित किया।
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महिलाओं के बैंक में खाते खुलवाए और काम के लिए ऋण दिलाया। आज उनके द्वारा खोले गए समूह की महिलाएं कपड़े के थैले, चप्पल आदि बना रही हैं। कपड़े भी सिल रही हैं। अब इन सखी समूह को बड़े स्तर पर काम मिलने लगा है। खतापुर की महिला समूह को पोषाहार बनाने का काम दिया गया है। गांव की महिलाएं कॉस्मेटिक पार्लर आदि भी खोल रही हैं और आमदनी करके अपने परिवार को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने में लगी हुई हैं। एडीओ आईएसडी अजय पाल का कहना है कि ममता ने महिलाओं के लिए उल्लेखनीय कार्य किया है। अगर हर ब्लॉक में इस तरह की आठ-दस महिलाएं भी हों तो वे पूरे जिले की महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत कर सकती हैं।
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स्वरोजगार से जुड़कर ही स्वावलंबन
ममता पाल का कहना है कि आर्थिक रूप से मजबूत महिला ही मजबूत परिवार का आधार होती है। उनकी समझ में ये बात आई तो उन्होंने बाकी महिलाओं को भी समझाया है। स्वरोजगार से जुड़कर महिलाओं को पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना चाहिए।