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हास्य व्यंग्य से हिंदी को बढ़ावा दे रहे हुक्का बिजनौरी
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हुक्का बिजनौरी।
- फोटो : BIJNOR
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हास्य व्यंग्य से हिंदी को बढ़ावा दे रहे हुक्का बिजनौरी
बिजनौर। अशोक कुमार जैन हुक्का बिजनौरी के नाम से साहित्य जगत में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने जीवन भर हास्य व्यंग्य की कविताएं लिखीं और लोगों को गुदगुदाया। वह कवि सम्मेलनों के कुशल मंच संचालक भी रहे। वह आज भी लेखनी के माध्यम से हिंदी की सेवा कर रहे हैं।
1945 में नगीना में जन्मे हुक्का बिजनौरी का बचपन बेहद अभाव में बीता। उन्होंने अखबार बेचकर अपना गुजारा किया। उन्होंने रश्मि के नाम से कविताएं लिखनी शुरू की, जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। वर्धमान कॉलेज में अध्ययन के दौरान हिंदी विभागाध्यक्ष डा. राम स्वरूप आर्य के वह शिष्य रहे। हुक्का बिजनौरी बताते हैं कि उनकी पहली कविता ‘हलवाई की बेटी’ के नाम से पद्मश्री गोपाल प्रसाद व्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तक हास्य रस के हल्के में छपी थी। एक कवि सम्मेलन में हास्य कवि सत्यदेव शास्त्री भोंपू ने अशोक जैन का नाम हुक्का बिजनौरी रख दिया। जीवन के 76 बसंत देख चुके हुक्का बिजनौरी आज भी अपनी कविताओं से श्रोताओं को गुदगुदा रहे हैं।
हुक्का बिजनौरी की अब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये हुक्का की गुड़ गुड़, ललकार और सुमन संचय है। हुक्का बिजनौरी कई टीवी कार्यक्रमों तथा आकाशवाणी कार्यक्रमों में भी प्रस्तुति दे चुके हैं। उन्हें उनकी काव्य प्रस्तुतियों के लिए अब तक डेढ़ दर्जन से अधिक सम्मान मिल चुके हैं। हुक्का बिजनौरी बताते हैं कि उन्होंने देश के कई राज्यों में काव्य प्रस्तुतियां दीं। वह अहिंदी भाषी राज्यों में भी काव्य प्रस्तुतियां देने के लिए गए, जहां उन्हें खूब पसंद किया गया। हुक्का बिजनौरी बताते हैं कि वर्तमान में छात्र-छात्राओं का ध्यान हिंदी की तरफ से हटा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि काफी छात्र हिंदी में फेल हो जाते हैं। हमने हिंदी को मातृभाषा के रूप में अपनाया है। हिंदी भाषा को रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने भ्रष्टाचार पर जमकर कविताएं लिखी हैं। वह अखबार के शीर्षकों को काव्यात्मक शैली में लिखकर व्यंग्य का रूप देने में माहिर है।
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उनकी एक प्रसिद्ध कविता- रात के अंधेरे में एक अधिकारी, एक इंजीनियर तथा ठेकेदार में, पता नहीं क्या करार हो गया कि सुबह होते ही एक पुल नदी को लेकर फरार हो गया।
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बिजनौर। अशोक कुमार जैन हुक्का बिजनौरी के नाम से साहित्य जगत में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने जीवन भर हास्य व्यंग्य की कविताएं लिखीं और लोगों को गुदगुदाया। वह कवि सम्मेलनों के कुशल मंच संचालक भी रहे। वह आज भी लेखनी के माध्यम से हिंदी की सेवा कर रहे हैं।
1945 में नगीना में जन्मे हुक्का बिजनौरी का बचपन बेहद अभाव में बीता। उन्होंने अखबार बेचकर अपना गुजारा किया। उन्होंने रश्मि के नाम से कविताएं लिखनी शुरू की, जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। वर्धमान कॉलेज में अध्ययन के दौरान हिंदी विभागाध्यक्ष डा. राम स्वरूप आर्य के वह शिष्य रहे। हुक्का बिजनौरी बताते हैं कि उनकी पहली कविता ‘हलवाई की बेटी’ के नाम से पद्मश्री गोपाल प्रसाद व्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तक हास्य रस के हल्के में छपी थी। एक कवि सम्मेलन में हास्य कवि सत्यदेव शास्त्री भोंपू ने अशोक जैन का नाम हुक्का बिजनौरी रख दिया। जीवन के 76 बसंत देख चुके हुक्का बिजनौरी आज भी अपनी कविताओं से श्रोताओं को गुदगुदा रहे हैं।
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हुक्का बिजनौरी की अब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये हुक्का की गुड़ गुड़, ललकार और सुमन संचय है। हुक्का बिजनौरी कई टीवी कार्यक्रमों तथा आकाशवाणी कार्यक्रमों में भी प्रस्तुति दे चुके हैं। उन्हें उनकी काव्य प्रस्तुतियों के लिए अब तक डेढ़ दर्जन से अधिक सम्मान मिल चुके हैं। हुक्का बिजनौरी बताते हैं कि उन्होंने देश के कई राज्यों में काव्य प्रस्तुतियां दीं। वह अहिंदी भाषी राज्यों में भी काव्य प्रस्तुतियां देने के लिए गए, जहां उन्हें खूब पसंद किया गया। हुक्का बिजनौरी बताते हैं कि वर्तमान में छात्र-छात्राओं का ध्यान हिंदी की तरफ से हटा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि काफी छात्र हिंदी में फेल हो जाते हैं। हमने हिंदी को मातृभाषा के रूप में अपनाया है। हिंदी भाषा को रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने भ्रष्टाचार पर जमकर कविताएं लिखी हैं। वह अखबार के शीर्षकों को काव्यात्मक शैली में लिखकर व्यंग्य का रूप देने में माहिर है।
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उनकी एक प्रसिद्ध कविता- रात के अंधेरे में एक अधिकारी, एक इंजीनियर तथा ठेकेदार में, पता नहीं क्या करार हो गया कि सुबह होते ही एक पुल नदी को लेकर फरार हो गया।