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जैविक खेती से जुड़े तो किसानों को गांव में ही मिल गया बाजार

Tue, 08 Dec 2020 12:06 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 08 Dec 2020 12:06 AM IST
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Farmers involved in organic farming, market found in village
बिजनौर के गांव सबलगढ़ में कोल्हू पर जैविक गन्ने से गुड बनाते कारीगर। - फोटो : BIJNOR
बिजनौर। गंगा किनारे जैविक खेती करने वाले किसानों को गांव में ही बाजार मिलने लगा है। गांव सबलगढ़ में इसकी शुरुआत हो गई है। गांव सबलगढ़ में जैविक विधि से पहली बार बिना रासायनिक खाद के गन्ना बोने वाले किसान गुड़ बनवाकर बेच रहे हैं। गांव से ही उनका गुड़ 65 रुपये प्रति किग्रा खरीदा जा रहा है जबकि रासायनिक खाद के इस्तेमाल से तैयार गन्ने का गुड़ 26 रुपये प्रति किग्रा तक बिक रहा है।
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केंद्र व प्रदेश सरकार किसान को जैविक खेती से जोड़ने के लिए अभियान चला रही है। खासतौर से गंगा किनारे बसे गांवों को रासायनिक खेती के बजाए जैविक खेती करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। ऐसे किसानों को बाजार भी शासन खुद मुहैया कराने की बात कह रहा है। नमामि गंगे जैविक खेती परियोजना के अंतर्गत इस बार गंगा किनारे बसे जिले में गंगा की पांच किमी की परिधि के 46 गांवों में पहली बार जैविक खेती शुरू कराई गई थी। किसानों ने करीब 1300 हेक्टेअर जमीन में जैविक खेती की। इसमें 900 हेक्टेअर जमीन में केवल गन्ना बोया गया। सरकार भी इन किसानों को बाजार उपलब्ध करा रही है। किसानों का अनुबंध शील बायोटेक लिमिटेड से कराया गया है। पहली बार ही जैविक खेती करने वाले किसानों का गुड़ 65 रुपये प्रति किग्रा बिक रहा है। किसान गांव में ही कोल्हू पर गुड़ बनवा रहे हैं। जैविक खेती करने वाले किसानों को भारी मुनाफा होगा। शील बायोटेक कंपनी ने किसानों को गुड़ बनाने के लिए मांग देनी शुरू कर दी है।
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यह है लाभ का गणित
रासायनिक खेती में गन्ना प्रति बीघा 70 क्विंटल निकलता है। इससे किसान को करीब 23 हजार रुपये मिलते हैं। इस बार गन्ने की पैदावार कम है। जैविक खेती से बोया गन्ना 50 क्विंटल तक निकल रहा है। 50 क्विंटल गन्ने में सवा पांच क्विंटल तक गुड़ निकल रहा है। यह 6500 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक रहा है। इसकी कीमत 34 हजार रुपये से अधिक है। प्रति क्विंटल गुड़ बनाने के प्रति क्विंटल 1100 रुपये तक ले रहे हैं। प्रति बीघा गन्ने के साढ़े पांच हजार रुपये तक खर्च आता है। लागत निकालने के बाद भी किसान को रासायनिक गन्ने के मुकाबले साढ़े पांच हजार रुपये बीघा अतिरिक्त मिलेंगे।
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तो और बढ़ेगा मुनाफा
पहले साल में ही किसानों को फसल के बंपर रेट मिले हैं। तीन साल तक लगातार जैविक खेती करने पर किसानों को कृषि विभाग से जैविक खेती के प्रमाण पत्र मिल जाएंगे। जो जैविक गुड़ अब 65 रुपये प्रति किग्रा बिक रहा है इसके रेट 100 रुपये प्रति किग्रा तक मिल सकते हैं।
जैविक पेस्टीसाइट भी मिलेंगे
जैविक खेती करने वाले किसानों को अब जैविक पेस्टीसाइट, जैविक खाद आदि के बारे में भी बताया जाएगा। किसानों को इस साल हरी खाद और केंचुए से तैयार खाद का लाभ ही बताया गया था। बाकी जैविक उर्वरकों से भी जोड़ा जाएगा।
यह है रासायनिक खेती का खर्च
एक बीघा जमीन में किसान दस किग्रा डाया, 25 किलो यूरिया डालते हैं। इसके अलावा पेस्टीसाइट का छिड़काव भी करते हैं। इसमे प्रति बीघा 500 रुपये तक की लागत आती है। जैविक खेती में रासायनिक खाद बिलकुल नहीं डाली जाती।
जैविक गन्ने से बने गुड़ के मिल रहे अच्छे दाम
गांव सबलगढ़ में जैविक खेती कर रहे इरफान अंसारी का कहना है कि जैविक गन्ने से बने गुड़ से अच्छे दाम मिल रहे हैं। नगद भुगतान मिल रहा है और चीनी मिल पर निर्भरता कम हुई है। इस साल फसल हलकी रही। अगले साल और मेहनत करेंगे।
बाकी को भी बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश
जिला कृषि अधिकारी डा.अवधेश मिश्र के अनुसार जैविक खेती से जुड़ने वाले किसानों को बाजार उपलब्ध कराया गया है। बाकी गांवों के किसानों की फसल बिकवाने के लिए भी योजना है। दूूूसरी कंपनी को भी किसानों के बीच लाया जाएगा। प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तो कंपनियां अधिक कीमत पर गुड़ खरीदेंगी। किसानों के जैविक उत्पाद जिला, तहसील व ब्लॉक स्तर पर भी बेचने की योजना है। कोशिश की जा रही है कि किसानों को अधिक से अधिक मूल्य मिले।
जैविक खेती में लागत कम, प्राकृतिक संसाधनों से ही हो जाती है खेती
बिजनौर। रासायनिक खेती के दौर में जिले के किसान जैविक खेती भी अपना रहे हैं। नजीबाबाद के गांव वीरूवाला के रहने वाले किसान सुरजीत सिंह चीमा दो साल से जैविक खेती कर रहे हैं। वे गन्ने से लेकर पशुओं के चारे तक सभी फसल जैविक बोते हैं। उनसे प्रभावित होकर गांव के कई और किसान भी जैविक खेती अपना चुके हैं। सुरजीत सिंह चीमा का कहना है कि जैविक खेती में लागत बहुत कम है। सारी खेती केवल प्राकृतिक संसाधनों से ही पूरी हो जाती है।
गांव मुकीमपुर धर्मसी के विनोद कुमार कई साल से गन्ने और हल्दी की जैविक खेती कर रहे हैं। वे गन्ने को मिल में नहीं बेचते हैं बल्कि उसका रस निकालकर शीरा बनाकर बेचते हैं। विनोद कुमार एक क्विंटल गन्ने से 50 लीटर शीरा निकालते हैं। शीरा 50 रुपये लीटर तक आराम से बिक जाता है। जैविक शीरे की बहुत डिमांड है। वे एक क्विंटल गन्ने से ढाई हजार रुपये तक कमा रहे हैं। इसके अलावा हल्दी भी वे दिल्ली जाकर बेच रहे हैं। हल्दी 500 रुपये प्रति किग्रा तक बिक रही है। जैविक खेती की वजह से ही वे मोटी आमदनी कमा रहे हैं।
जीरो बजट खेती है फायदेमंद
फोटो
अफजलगढ़। अफजलगढ़ स्थित रामगंगा कृषिफार्म के प्रबंधक करुण अग्रवाल कई साल से जैविक खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि रासायनिक खादों से खेती का क्षणिक लाभ तो है लेकिन इस के प्रयोग से जमीन उर्वरक क्षमता क्षीण हो जाने के कारण धीरे धीरे धीरे भूमि बंजर होने की संभावना बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि वह शत-प्रतिशत जैविक खेती पर जोर दे रहे है। जैविक खेती के तहत गन्ना, गेहूं, लाई, धान, तथा सभी प्रकार की सब्जियों की खेती कर रहे हैं। उन्होंने जैविक उत्पादों की बिक्री के लिए सरकार द्वारा व्यवस्था किये जाने पर जोर दिया।

गांव प्रेमपुरी निवासी सरदार अमरीक सिंह ने बताया कि बीते कुछ साल से अचानक उनका रुझान जैविक खेती की ओर बढ़ने लगा इसके बाद उसने मुख्य फसल गन्ना धान व गेहूँ खासकर काला गेहूं तथा सहफसली के रूप में इनके साथ अदरक, हल्दी, प्याज, लहसुन, गोभी तथा आलू की जैविक खेती शुरू कर दी।

बिजनौर के गांव सबलगढ़ में कोल्हू पर जैविक गन्ने से गुड बनाते कारीगर।

बिजनौर के गांव सबलगढ़ में कोल्हू पर जैविक गन्ने से गुड बनाते कारीगर।- फोटो : BIJNOR

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