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सरकारी धन का हुआ था बंदरबांट
ब्यूरो/अमर उजाला, बिजनौर
Updated Wed, 28 Dec 2016 12:28 AM IST
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बिजनौर में बिजनौर के स्वास्थ्य विभाग में जून और जुलाई माह 2016 में करीब तीन करोड़ का घोटाला हुआ। सरकारी धन का इस तरह बंदरबांट हुआ कि कोई सोच भी नहीं सकता। घोटाले से स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया था। यह घोटाला स्वास्थ्य विभाग में ही नहीं पूरे जनपद में चर्चाओं में रहा।
घोटाले में अन्य जिले की चार कंपनियों को बिना कोई समान लिए ही तीन करोड़ से अधिक रुपये का भुगतान कर दिया गया था। भुगतान के अप्रूवल पूर्व सीएमओ डा.एमएम अग्रवाल व पूर्व एसीएमओ डा.पीआर नायर के हस्ताक्षर से किए गए। जिसे दोनों ही अधिकारियों ने अपने फर्जी हस्ताक्षर होना बताया था। यह भुगतान चारो कंपनियों को करीब दस बार में किया गया था। इस मामले में पुलिस ने जांच मे ंदोषी मानते हुए एनआरएच के बाबू कैलाश ठाकुर व पूर्व लेखाधिकारी पंकज को जेल भेजा था, लेकिन दोनों को जेल भेजने के बाद भी निलंबन नहीं किया गया। पुलिस ने जांच में कंपनियों को अस्तित्व में नहीं पाया था। इस मामले में लखनऊ की टीम ने भी जांच की । उसने तैनात डाटा आपरेटर को दोषी माना ।
लेनदेन के मामले में विशेष बात यह रही की सामान के न तो टेंडर लिए, न ही माल की आपूर्ति हुई और भुगतान हो गया। जिला स्तर पर मामले को दबाने की ही कोशिश हुई किंतु शासन स्तर पर सख्ती के कारण मामला रंग लाया और कार्रवाई शुरू हुई। आरोपी अधिकारियों की संपत्ति की कुर्की की भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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घोटाले में अन्य जिले की चार कंपनियों को बिना कोई समान लिए ही तीन करोड़ से अधिक रुपये का भुगतान कर दिया गया था। भुगतान के अप्रूवल पूर्व सीएमओ डा.एमएम अग्रवाल व पूर्व एसीएमओ डा.पीआर नायर के हस्ताक्षर से किए गए। जिसे दोनों ही अधिकारियों ने अपने फर्जी हस्ताक्षर होना बताया था। यह भुगतान चारो कंपनियों को करीब दस बार में किया गया था। इस मामले में पुलिस ने जांच मे ंदोषी मानते हुए एनआरएच के बाबू कैलाश ठाकुर व पूर्व लेखाधिकारी पंकज को जेल भेजा था, लेकिन दोनों को जेल भेजने के बाद भी निलंबन नहीं किया गया। पुलिस ने जांच में कंपनियों को अस्तित्व में नहीं पाया था। इस मामले में लखनऊ की टीम ने भी जांच की । उसने तैनात डाटा आपरेटर को दोषी माना ।
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लेनदेन के मामले में विशेष बात यह रही की सामान के न तो टेंडर लिए, न ही माल की आपूर्ति हुई और भुगतान हो गया। जिला स्तर पर मामले को दबाने की ही कोशिश हुई किंतु शासन स्तर पर सख्ती के कारण मामला रंग लाया और कार्रवाई शुरू हुई। आरोपी अधिकारियों की संपत्ति की कुर्की की भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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