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स्वच्छ और निर्मल गंगा में बाधक बने भूमाफिया
ब्यूरो/ अमर उजाला, बिजनौर
Updated Sat, 20 Feb 2016 12:31 AM IST
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बिजनौर में स्वच्छ एवं निर्मल गंगा अभियान को भूमाफिया खुले आम पलीता लगा रहे हैं। गंगा किनारे सरकारी भूमि पर अवैध फसल उगाकर व पलेज लगाकर धड़ल्ले से जहरीला कीटनाशक घोल रहे हैं।
जहरीले कीटनाशक से जलीय जीवों का अस्तित्व भी संकटग्रस्त हो गया, वही गंगा को स्वच्छ निर्मल बनाने के सारे प्रयास फेल हो रहे है। इस मामले से जिला स्तरीय अधिकारी सभी कुछ जानते हुए भी चुप्पी साधे बैठे हैं।
बिजनौर में बालावाली से लेकर गंगा किनारे दत्तियाना तक करीब 50 किलोमीटर की दूरी है। गंगा किनारे वन विभाग, सिंचाई विभाग व राजस्व विभाग की भूमि पर भूमाफिया का कब्जा है। भूमाफिया धड़ल्ले से गन्ना, गेहूं की फसल उगा रहे हैं और पलेज लगा रहे हैं। अधिक पैदावार के लिए फसल व पलेज में खुलेआम यूरिया, एनपीके, नाईट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, कूड़ी की खाद, जेक्सेन पाउडर को डाला जा रहा है।
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खड़ी फसल में कीटनाशकों को मारने के लिए अन्य जहरीले कीटनाशकों का छिड़काव कर रहे हैं। ये सभी जहरीले कीटनाशक व खाद जमीन में मिल जाते है। बारिश होने अथवा बरसात के मौसम में गंगा का जलस्तर बढ़ने पर जमीन में घुले जहरीले तत्व स्वच्छ व निर्मल गंगा जल में मिल जाता है। यह पूरा मामला वन विभाग व प्रशासन के अधिकारियों के संज्ञान में है। लेकिन अधिकारी सभी कुछ जानते हुए भी आंखें बंद किए बैठे हैं। बार-बार मामला उठाने पर अधिकारी एक-दूसरे पर विभागीय अधिकारी को जिम्मेदार बताकर पल्ला झाड़ देते हैं।
जलीय जीवों के अस्तित्व पर संकट
गंगा कई जलीय जीवों का वासस्थल है। गंगा किनारे कीटनाशकों का छिड़काव होने व खाद का अंधाधुंध उपयोग होने से गंगा का पानी दूषित होता जा रहा है। गंगा में रहने वाली कई जीवों का जीवन संकटग्रस्त हो चला है। गंगा में घड़ियाल, डाल्फिन, कई प्रजातियों की मछलियां, कछुये आदि कई प्रजातियों के जलीय जीव रहते हैं। पहले के मुकाबले उनकी संख्या में कमी आई है।
कछुओं की पांच प्रजातियां संकटग्रस्त
डब्ल्यूडब्ल्यूफ के प्रतिनिधि संजीव यादव ने बताया कि गंगा में कछुओं की 27 प्रजातियां पाई जाती है। गंगा जल के दूषित होने के कारण लगातार उनकी संख्या में कमी आ रही है। 27 में से कछुओं की पांच प्रजातियां दुर्लभ हो गए। उनकी संख्या न के बराबर रह गई तथा उनके दुर्लभ श्रेणी में रखा गया है।
जोत में कीटनाशक डालना है प्रतिबंधित
गंगा किनारे हजारों हेक्टेयर भूमि सरकारी है। अधिकांश भूमि पर भूमाफिया का कब्जा है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के संजीव यादव ने बताया कि गंगा को स्वच्छ व निर्मल बनाने के लिए गंगा किनारे वाली किसानों की जोत की जमीन में जहरीले कीटनाशक डालना प्रतिबंधित है। वन विभाग व अन्य प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व है कि क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम चलाकर गांववासियों व किसानों को जागरूक करें और किसी तरह के उर्वरक व कीटनाशक का छिड़काव करने से रोकें।
वन विभाग अधिकांश भूमि पर विभाग का कब्जा है। कुछ ही क्षेत्र में विवाद है। गंगा किनारे वाले क्षेत्रों में कीटनाशक व खाद का इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है। मामला उनके संज्ञान में आया है। गंगा क्षेत्र में कीटनाशक का इस्तेमाल करते पकड़े जाने पर कार्रवाई की जाएगी।
- सलील कुमार शुक्ला, डीएफओ
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जहरीले कीटनाशक से जलीय जीवों का अस्तित्व भी संकटग्रस्त हो गया, वही गंगा को स्वच्छ निर्मल बनाने के सारे प्रयास फेल हो रहे है। इस मामले से जिला स्तरीय अधिकारी सभी कुछ जानते हुए भी चुप्पी साधे बैठे हैं।
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बिजनौर में बालावाली से लेकर गंगा किनारे दत्तियाना तक करीब 50 किलोमीटर की दूरी है। गंगा किनारे वन विभाग, सिंचाई विभाग व राजस्व विभाग की भूमि पर भूमाफिया का कब्जा है। भूमाफिया धड़ल्ले से गन्ना, गेहूं की फसल उगा रहे हैं और पलेज लगा रहे हैं। अधिक पैदावार के लिए फसल व पलेज में खुलेआम यूरिया, एनपीके, नाईट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, कूड़ी की खाद, जेक्सेन पाउडर को डाला जा रहा है।
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खड़ी फसल में कीटनाशकों को मारने के लिए अन्य जहरीले कीटनाशकों का छिड़काव कर रहे हैं। ये सभी जहरीले कीटनाशक व खाद जमीन में मिल जाते है। बारिश होने अथवा बरसात के मौसम में गंगा का जलस्तर बढ़ने पर जमीन में घुले जहरीले तत्व स्वच्छ व निर्मल गंगा जल में मिल जाता है। यह पूरा मामला वन विभाग व प्रशासन के अधिकारियों के संज्ञान में है। लेकिन अधिकारी सभी कुछ जानते हुए भी आंखें बंद किए बैठे हैं। बार-बार मामला उठाने पर अधिकारी एक-दूसरे पर विभागीय अधिकारी को जिम्मेदार बताकर पल्ला झाड़ देते हैं।
जलीय जीवों के अस्तित्व पर संकट
गंगा कई जलीय जीवों का वासस्थल है। गंगा किनारे कीटनाशकों का छिड़काव होने व खाद का अंधाधुंध उपयोग होने से गंगा का पानी दूषित होता जा रहा है। गंगा में रहने वाली कई जीवों का जीवन संकटग्रस्त हो चला है। गंगा में घड़ियाल, डाल्फिन, कई प्रजातियों की मछलियां, कछुये आदि कई प्रजातियों के जलीय जीव रहते हैं। पहले के मुकाबले उनकी संख्या में कमी आई है।
कछुओं की पांच प्रजातियां संकटग्रस्त
डब्ल्यूडब्ल्यूफ के प्रतिनिधि संजीव यादव ने बताया कि गंगा में कछुओं की 27 प्रजातियां पाई जाती है। गंगा जल के दूषित होने के कारण लगातार उनकी संख्या में कमी आ रही है। 27 में से कछुओं की पांच प्रजातियां दुर्लभ हो गए। उनकी संख्या न के बराबर रह गई तथा उनके दुर्लभ श्रेणी में रखा गया है।
जोत में कीटनाशक डालना है प्रतिबंधित
गंगा किनारे हजारों हेक्टेयर भूमि सरकारी है। अधिकांश भूमि पर भूमाफिया का कब्जा है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के संजीव यादव ने बताया कि गंगा को स्वच्छ व निर्मल बनाने के लिए गंगा किनारे वाली किसानों की जोत की जमीन में जहरीले कीटनाशक डालना प्रतिबंधित है। वन विभाग व अन्य प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व है कि क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम चलाकर गांववासियों व किसानों को जागरूक करें और किसी तरह के उर्वरक व कीटनाशक का छिड़काव करने से रोकें।
वन विभाग अधिकांश भूमि पर विभाग का कब्जा है। कुछ ही क्षेत्र में विवाद है। गंगा किनारे वाले क्षेत्रों में कीटनाशक व खाद का इस्तेमाल करना प्रतिबंधित है। मामला उनके संज्ञान में आया है। गंगा क्षेत्र में कीटनाशक का इस्तेमाल करते पकड़े जाने पर कार्रवाई की जाएगी।
- सलील कुमार शुक्ला, डीएफओ