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जातीय जुगलबंदी में जीत का गणित तलाश रहे प्रत्याशी
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जातीय जुगलबंदी में जीत का गणित तलाश रहे प्रत्याशी
बिजनौर। मतदाता खामोश हैं, समर्थक अपनी अपनी जीत का हल्ला मचा रहे हैं। इनके जीत के आंकड़ों में जातीय गुणा भाग चल रहा है। यानी जातीय जुगलबंदी से ही जीत को आसान मान रहे हैं। गठबंधन को जाटों और मुसलमानों के वोट की आस है। भाजपा विकास के दम पर सभी वर्गों में अपना वोट होने का दावा कर रही है। जबकि बसपा अपने परंपरागत वोट समेत इनसे छिटक चुका वोट अपना मान रही है। खैर, नतीजे आने पर ही मालूम पड़ सकेगा कि किसको कितना किसका वोट मिला।
जनपद की आठों विधानसभा पर हर रोज समीकरण बदल रहे हैं। अभी तक किसी की भी राह आसान नहीं दिखाई दे रही है। वजह है, वोटरों की खामोशी। बता दें कि गठबंधन को अबकी बार किसान आंदोलन से सत्ताधारी दल के विरोध में चली हवा से राहत मिलने की उम्मीद है। गठबंधन मान रहा है कि जाट और मुस्लिम वोटों की जुगलबंदी चुनावी नैय्या को पार लगा देगी। हालांकि यह अभी पूरी तरह से साफ नहीं है कि किस बिरादरी का कितना प्रतिशत वोट किसे जाएगा। वहीं, भाजपा को भी सभी वर्गों में अपना वोट मानकर चल रही है। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाले मुस्लिमों से भी वोट मिलने की उम्मीद भाजपा के रणनीतिकार जाहिर कर रहे हैं। हालांकि सभी सीटों पर मुकाबला भाजपा उम्मीदवारों से ही होना तय माना जा रहा है।
बसपा का भी अपना गणित चल रहा है। बसपा उम्मीदवार और उनके समर्थक अपना परंपरागत वोट बैंक होने के साथ साथ मुस्लिम वर्ग में भी सेंधमारी करने की जद्दोजहद में हैं। वहीं, राजनीति के जानकारों का मानना है कि अभी तक किसी भी सीट पर एक तरफा रुझान वोटरों का दिखाई नहीं दे रहा है। ऊंट किस करवट बैठेगा, यह मतदाताओं का मन जानता है। बताया जा रहा है कि सभी सीटों पर कांटे की टक्कर रहेगी और रोमांचक मुकाबला होगा।
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बिजनौर। मतदाता खामोश हैं, समर्थक अपनी अपनी जीत का हल्ला मचा रहे हैं। इनके जीत के आंकड़ों में जातीय गुणा भाग चल रहा है। यानी जातीय जुगलबंदी से ही जीत को आसान मान रहे हैं। गठबंधन को जाटों और मुसलमानों के वोट की आस है। भाजपा विकास के दम पर सभी वर्गों में अपना वोट होने का दावा कर रही है। जबकि बसपा अपने परंपरागत वोट समेत इनसे छिटक चुका वोट अपना मान रही है। खैर, नतीजे आने पर ही मालूम पड़ सकेगा कि किसको कितना किसका वोट मिला।
जनपद की आठों विधानसभा पर हर रोज समीकरण बदल रहे हैं। अभी तक किसी की भी राह आसान नहीं दिखाई दे रही है। वजह है, वोटरों की खामोशी। बता दें कि गठबंधन को अबकी बार किसान आंदोलन से सत्ताधारी दल के विरोध में चली हवा से राहत मिलने की उम्मीद है। गठबंधन मान रहा है कि जाट और मुस्लिम वोटों की जुगलबंदी चुनावी नैय्या को पार लगा देगी। हालांकि यह अभी पूरी तरह से साफ नहीं है कि किस बिरादरी का कितना प्रतिशत वोट किसे जाएगा। वहीं, भाजपा को भी सभी वर्गों में अपना वोट मानकर चल रही है। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाले मुस्लिमों से भी वोट मिलने की उम्मीद भाजपा के रणनीतिकार जाहिर कर रहे हैं। हालांकि सभी सीटों पर मुकाबला भाजपा उम्मीदवारों से ही होना तय माना जा रहा है।
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बसपा का भी अपना गणित चल रहा है। बसपा उम्मीदवार और उनके समर्थक अपना परंपरागत वोट बैंक होने के साथ साथ मुस्लिम वर्ग में भी सेंधमारी करने की जद्दोजहद में हैं। वहीं, राजनीति के जानकारों का मानना है कि अभी तक किसी भी सीट पर एक तरफा रुझान वोटरों का दिखाई नहीं दे रहा है। ऊंट किस करवट बैठेगा, यह मतदाताओं का मन जानता है। बताया जा रहा है कि सभी सीटों पर कांटे की टक्कर रहेगी और रोमांचक मुकाबला होगा।
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