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दूध का बाजार धड़ाम, किसानों को नुकसान
Updated Wed, 20 Jun 2018 11:20 PM IST
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दूध का बाजार धड़ाम, किसानों को नुकसान
बिजनौर। किसान के लिए आड़े वक्त का व्यापार माने जाने वाला दुग्ध व्यवसाय पटरी से उतर गया है। मिल्क पाउडर पर विदेशों में कम मात्रा में निर्यात करने के कारण दूध के दामों में गिरावट आई है। इससे किसानों को नुकसान झेलना पड़ रहा है। पिछले साल दूध की कीमत 40 रुपये प्रति लीटर थी, लेकिन इस साल किसानों को दूध का मूल्य 34.5 रुपये प्रति लीटर ही मिल रहा है।
कभी किसान केवल परंपरा के तौर पर ही पशु पालते थे। लेकिन करीब दो दशक पहले पशुपालन में आमदनी के लिए काम करना शुरू किया। दुग्ध उत्पादन से किसानों को अच्छी खासी आमदनी होने लगी और दुग्ध व्यवसाय खेती के साथ-साथ किसानों का सहायक व्यवसाय बन गया। शासन ने भी दुग्ध पालन के लिए अनेक योजनाएं चलाईं। डेरियों की स्थापना कराई गई। किसानों को दुग्ध उत्पादन में महारत हासिल करने को दूसरे राज्यों में भेजकर तकनीकी ज्ञान भी दिलाया गया।
गांव बसेड़ी निवासी राजवीर सिंह सरीखे किसानों ने दुग्ध उत्पादन में रिकॉर्ड कायम कर दिए। लेकिन अब किसानों का यह सहायक व्यवसाय नुकसान देने लगा है। दूध के दाम और सालों की तुलना में बहुत घट गए हैं। पिछले साल आजकल के समय में डेरियां किसानों से 40 रुपये प्रति लीटर पर दूध खरीद रहीं थीं, लेकिन इस समय दूध के दाम 34.5 रुपये से 36 रुपये प्रति लीटर तक हैं। जबकि पशुओं के चारे तथा खल-चोकर आदि पर महंगाई बहुत बढ़ी है।
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हर रोज नौ लाख लीटर दूध का उत्पादन
खेती से जुड़कर किसान शहद उत्पादन आदि भी कर सकते हैं। लेकिन किसानों का रुझान दुग्ध उत्पादन पर ही रहता है। इसकी वजह है कि पशु पालना किसानों की परंपरा रही है। इस परंपरा को किसान नहीं छोड़ सकते। किसानों ने अपनी परंपरा से ही आमदनी को बढ़ाया है। एक अनुमान के अनुसार जिले में हर रोज करीब नौ लाख लीटर दुग्ध का उत्पादन होता है। अधिकतर दूध की खपत जिले में ही हो जाती है। बाकी दूध को खरीदने के लिए जिले भर में आधा दर्जन से अधिक डेरी हैं। डेरियों में प्रतिस्पर्धा होने के बाद भी तथा बाजार में दूध कम होने के बाद भी दूध के दाम बहुत कम हैं।
घाटे के लिए सरकारी नीति जिम्मेदार
डेरी से जुड़े कर्मचारियों की मानें तो अधिकतर डेरियां दूध का पाउडर बनाकर विदेशों को निर्यात करती हैं। लेकिन अब निर्यात में किन्हीं कारणों से कमी की गई है। डेरियों के पास पहले से ही बहुत मिल्क पाउडर है। दूध की किल्लत होने के बाद भी डेरियों में दूध की डिमांड ज्यादा नहीं है। किसान गांव गजरौला अचपल निवासी मुकुल कुमार का कहना है कि सरकारी नीति की वजह से दूध की कीमत गिरी हैं। नकली दूध और मिलावटी मावा बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है। उपभोक्ताओं को बड़े स्तर पर मिलावटी माल बेचा जा रहा है।
दूध की मांग कम
पराग डेरी के जीएम आनंद कुमार तिवारी के अनुसार इस समय दूध की मांग कम देखने को मिल रही है। मांग और पूर्ति के सिद्धांत पर दूध के मूल्य तय किए गए हैं।
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बिजनौर। किसान के लिए आड़े वक्त का व्यापार माने जाने वाला दुग्ध व्यवसाय पटरी से उतर गया है। मिल्क पाउडर पर विदेशों में कम मात्रा में निर्यात करने के कारण दूध के दामों में गिरावट आई है। इससे किसानों को नुकसान झेलना पड़ रहा है। पिछले साल दूध की कीमत 40 रुपये प्रति लीटर थी, लेकिन इस साल किसानों को दूध का मूल्य 34.5 रुपये प्रति लीटर ही मिल रहा है।
कभी किसान केवल परंपरा के तौर पर ही पशु पालते थे। लेकिन करीब दो दशक पहले पशुपालन में आमदनी के लिए काम करना शुरू किया। दुग्ध उत्पादन से किसानों को अच्छी खासी आमदनी होने लगी और दुग्ध व्यवसाय खेती के साथ-साथ किसानों का सहायक व्यवसाय बन गया। शासन ने भी दुग्ध पालन के लिए अनेक योजनाएं चलाईं। डेरियों की स्थापना कराई गई। किसानों को दुग्ध उत्पादन में महारत हासिल करने को दूसरे राज्यों में भेजकर तकनीकी ज्ञान भी दिलाया गया।
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गांव बसेड़ी निवासी राजवीर सिंह सरीखे किसानों ने दुग्ध उत्पादन में रिकॉर्ड कायम कर दिए। लेकिन अब किसानों का यह सहायक व्यवसाय नुकसान देने लगा है। दूध के दाम और सालों की तुलना में बहुत घट गए हैं। पिछले साल आजकल के समय में डेरियां किसानों से 40 रुपये प्रति लीटर पर दूध खरीद रहीं थीं, लेकिन इस समय दूध के दाम 34.5 रुपये से 36 रुपये प्रति लीटर तक हैं। जबकि पशुओं के चारे तथा खल-चोकर आदि पर महंगाई बहुत बढ़ी है।
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हर रोज नौ लाख लीटर दूध का उत्पादन
खेती से जुड़कर किसान शहद उत्पादन आदि भी कर सकते हैं। लेकिन किसानों का रुझान दुग्ध उत्पादन पर ही रहता है। इसकी वजह है कि पशु पालना किसानों की परंपरा रही है। इस परंपरा को किसान नहीं छोड़ सकते। किसानों ने अपनी परंपरा से ही आमदनी को बढ़ाया है। एक अनुमान के अनुसार जिले में हर रोज करीब नौ लाख लीटर दुग्ध का उत्पादन होता है। अधिकतर दूध की खपत जिले में ही हो जाती है। बाकी दूध को खरीदने के लिए जिले भर में आधा दर्जन से अधिक डेरी हैं। डेरियों में प्रतिस्पर्धा होने के बाद भी तथा बाजार में दूध कम होने के बाद भी दूध के दाम बहुत कम हैं।
घाटे के लिए सरकारी नीति जिम्मेदार
डेरी से जुड़े कर्मचारियों की मानें तो अधिकतर डेरियां दूध का पाउडर बनाकर विदेशों को निर्यात करती हैं। लेकिन अब निर्यात में किन्हीं कारणों से कमी की गई है। डेरियों के पास पहले से ही बहुत मिल्क पाउडर है। दूध की किल्लत होने के बाद भी डेरियों में दूध की डिमांड ज्यादा नहीं है। किसान गांव गजरौला अचपल निवासी मुकुल कुमार का कहना है कि सरकारी नीति की वजह से दूध की कीमत गिरी हैं। नकली दूध और मिलावटी मावा बनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है। उपभोक्ताओं को बड़े स्तर पर मिलावटी माल बेचा जा रहा है।
दूध की मांग कम
पराग डेरी के जीएम आनंद कुमार तिवारी के अनुसार इस समय दूध की मांग कम देखने को मिल रही है। मांग और पूर्ति के सिद्धांत पर दूध के मूल्य तय किए गए हैं।