{"_id":"5be5d7cabdec22695c1f64b2","slug":"151541789642-bijnor-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"सबसे ज्यादा बोई जाने वाली धान की शरबती प्रजाति को नहीं मिल रहा बाजार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सबसे ज्यादा बोई जाने वाली धान की शरबती प्रजाति को नहीं मिल रहा बाजार
Updated Sat, 10 Nov 2018 12:24 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
धान की शरबती प्रजाति को नहीं मिल रहा बाजार
बिजनौर। शासन की ओर से धान की खरीद के लिए लगाए गए केंद्र औपचारिक ही बनकर रह गए हैं। जिले में सबसे अधिक रकबे में बोई जाने वाली धान की प्रजाति शरबती को आज भी बाजार नहीं मिल पाया है। यह हाल तब है जबसबसे ज्यादा चावल भी इसी प्रजाति का खाया जाता है। इस बार तो जिला मुख्यालय पर शरबती धान की बिक्री बिल्कुल ही खत्म हो गई है। किसान अपनी फसल को दूसरे जिलों में ले जाकर बेचने को मजबूर हैं।
जिले में गन्ने व गेहूं के बाद धान तीसरी प्रमुख फसल है। जिले में करीब 57 हजार हेक्टेयर जमीन में धान बोया जाता है। धान की खरीद के लिए शासन की ओेर से केंद्र बनाए जाते हैं, लेकिन धान की खरीद प्रजाति के हिसाब से नहीं बल्कि ग्रेड के हिसाब से की जाती है। इस बार धान का मूल्य 1735 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इस मूल्य पर मोटा धान, किसान क्रय केंद्रों को बेचते हैं, जबकि जिले में सबसे ज्यादा रकबे में शरबती धान बोया जाता है। यह धान आधे से भी ज्यादा रकबे में जिले में बोया जाता है। इस धान की कीमत मोटे धान से कहीं अधिक होती है। इसके बाद भी इस धान की खरीद के लिए जिले में कोई व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि जिला मुख्यालय पर व्यापारियों ने भी शरबती धान खरीदना बंद कर दिया है। ऐसे में शरबती धान बोने वाले किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए मुजफ्फरनगर जिले के रामराज क्षेत्र की ओर रुख करना पड़ रहा है। शासन, प्रशासन द्वारा धान की फसल खरीदने की गारंटी तो है, लेकिन प्रजाति कोई भी या कितनी महंगी क्यों न हो, रेट एक ही दिया जाता है। शरबती धान जिले के किसानों की पहली पसंद है। मोटे धान का रेट 1735 से 1760 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है, जबकि शरबती धान की कीमत 2100 से 2150 रुपये प्रति क्विंटल तक है। मोटे धान के चावल को सरकार राशन में बांटती है।
बाकी फसलों के नहीं नहीं है बाजार
शरबती चावल का बाजार काफी ज्यादा है। शरबती धान चार से पांच क्विंटल प्रति बीघा तक निकल जाता है। इसमें रोग अन्य प्रजातियों के मुकाबले बहुत कम लगता है। इसकी पराली को पशु भी बहुत चाव से खाते हैं। सरकार व शासन चीनी उद्योग पर आए संकट को खत्म करने के लिए गन्ने के रकबे को कम करना चाहती है। लेकिन बाकी फसलों के लिए बाजार नहीं है। केवल गन्ना ही एक ऐसी फसल है जिसकी बिक्री के लिए बाजार है। चीनी मिलों को गन्ना खरीदना ही होता है। इस वजह से किसान गन्ने का मोह छोड़ नहीं पाते हैं।
विज्ञापन
धान की फसल किसानों के लिए रिस्क का है सौदा : व्यापारी नेता
व्यापारी नेता सुशील जिंदल के अनुसार मुख्यालय या आसपास बहुत कम व्यापारी धान की खरीद कर रहे हैं। किसान अपना धान रामराज क्षेत्र में लेकर जा रहे हैं।
भाकियू जिलाध्यक्ष दिगंबर सिंह के अनुसार धान की फसल किसानों के लिए सबसे ज्यादा रिस्क का सौदा है। इस फसल में रोगों, कीटों का सबसे ज्यादा नुकसान होता है। इसके बाद भी धान की सबसे ज्यादा बोई जाने वाली प्रजाति के लिए जिले में बाजार नहीं है और न ही शासन की ओर से फसल बिकवाने की कोई व्यवस्था की गई है। किसान रामराज में जाकर फसल बेचने को मजबूर है।
विज्ञापन
बिजनौर। शासन की ओर से धान की खरीद के लिए लगाए गए केंद्र औपचारिक ही बनकर रह गए हैं। जिले में सबसे अधिक रकबे में बोई जाने वाली धान की प्रजाति शरबती को आज भी बाजार नहीं मिल पाया है। यह हाल तब है जबसबसे ज्यादा चावल भी इसी प्रजाति का खाया जाता है। इस बार तो जिला मुख्यालय पर शरबती धान की बिक्री बिल्कुल ही खत्म हो गई है। किसान अपनी फसल को दूसरे जिलों में ले जाकर बेचने को मजबूर हैं।
जिले में गन्ने व गेहूं के बाद धान तीसरी प्रमुख फसल है। जिले में करीब 57 हजार हेक्टेयर जमीन में धान बोया जाता है। धान की खरीद के लिए शासन की ओेर से केंद्र बनाए जाते हैं, लेकिन धान की खरीद प्रजाति के हिसाब से नहीं बल्कि ग्रेड के हिसाब से की जाती है। इस बार धान का मूल्य 1735 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इस मूल्य पर मोटा धान, किसान क्रय केंद्रों को बेचते हैं, जबकि जिले में सबसे ज्यादा रकबे में शरबती धान बोया जाता है। यह धान आधे से भी ज्यादा रकबे में जिले में बोया जाता है। इस धान की कीमत मोटे धान से कहीं अधिक होती है। इसके बाद भी इस धान की खरीद के लिए जिले में कोई व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि जिला मुख्यालय पर व्यापारियों ने भी शरबती धान खरीदना बंद कर दिया है। ऐसे में शरबती धान बोने वाले किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए मुजफ्फरनगर जिले के रामराज क्षेत्र की ओर रुख करना पड़ रहा है। शासन, प्रशासन द्वारा धान की फसल खरीदने की गारंटी तो है, लेकिन प्रजाति कोई भी या कितनी महंगी क्यों न हो, रेट एक ही दिया जाता है। शरबती धान जिले के किसानों की पहली पसंद है। मोटे धान का रेट 1735 से 1760 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है, जबकि शरबती धान की कीमत 2100 से 2150 रुपये प्रति क्विंटल तक है। मोटे धान के चावल को सरकार राशन में बांटती है।
विज्ञापन
बाकी फसलों के नहीं नहीं है बाजार
शरबती चावल का बाजार काफी ज्यादा है। शरबती धान चार से पांच क्विंटल प्रति बीघा तक निकल जाता है। इसमें रोग अन्य प्रजातियों के मुकाबले बहुत कम लगता है। इसकी पराली को पशु भी बहुत चाव से खाते हैं। सरकार व शासन चीनी उद्योग पर आए संकट को खत्म करने के लिए गन्ने के रकबे को कम करना चाहती है। लेकिन बाकी फसलों के लिए बाजार नहीं है। केवल गन्ना ही एक ऐसी फसल है जिसकी बिक्री के लिए बाजार है। चीनी मिलों को गन्ना खरीदना ही होता है। इस वजह से किसान गन्ने का मोह छोड़ नहीं पाते हैं।
विज्ञापन
धान की फसल किसानों के लिए रिस्क का है सौदा : व्यापारी नेता
व्यापारी नेता सुशील जिंदल के अनुसार मुख्यालय या आसपास बहुत कम व्यापारी धान की खरीद कर रहे हैं। किसान अपना धान रामराज क्षेत्र में लेकर जा रहे हैं।
भाकियू जिलाध्यक्ष दिगंबर सिंह के अनुसार धान की फसल किसानों के लिए सबसे ज्यादा रिस्क का सौदा है। इस फसल में रोगों, कीटों का सबसे ज्यादा नुकसान होता है। इसके बाद भी धान की सबसे ज्यादा बोई जाने वाली प्रजाति के लिए जिले में बाजार नहीं है और न ही शासन की ओर से फसल बिकवाने की कोई व्यवस्था की गई है। किसान रामराज में जाकर फसल बेचने को मजबूर है।