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Bhadohi News: महिला प्रधानों को नहीं पता अधिकार, पुरूष चला रहे गांव की सरकार
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ज्ञानपुर। सरकार महिलाओं को राजनीतिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए गंभीर है। धरातल पर हकीकत उलट है। जिले की अधिकत्तर महिला ग्राम प्रधानों को अपना अधिकार नहीं पता है। पुरूष ही गांव की सरकार चला रहे हैं। जिले की 230 ग्राम पंचायतों का प्रतिनिधित्व कर रहीं महिलाएं रबर स्टांप बनकर रह गई हैं। पति, बेटे या परिवार के पुरूष सदस्य ही ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी पूरी करते है। वे खुली बैठक से लेकर शासन-प्रशासन स्तर पर होने वाले कार्यक्रम में शामिल होते हैं। इसपर हाईकोर्ट ने मंगलवार को तीखी टिप्पणी की है। इसके बाद बुधवार को जिले में दिनभर महिला प्रधानों की भूमिका पर चर्चाओं का बाजार गर्म रहा।
जिले में 546 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें से 230 ग्राम पंचायत की बागडोर महिलाओं के हाथ में है। एकाक ही महिला प्रधान अपने अधिकार के प्रति जागरूक हैं। वह गांव में सरकार चला रही हैं, लेकिन, अधिकांश पंचायतों में महिला के पति ही पुरूष परिजन बागडोर थामे हुए हैं। पंचायत में होने वाले विकास कार्य का खांका पति या परिवार के पुरूष सदस्य ही खींचते हैं। वे खाता संचालन, पंचायत की बैठक, जिला मुख्यालय के आयोजन तक में शामिल होते हैं। पंचायती राज एक्ट में प्राविधान है कि महिला जनप्रतिनिधि ही सभी कार्य करेंगी, लेकिन वह सिर्फ कागजों पर रही ही सीमित है। जिले में अधिकत्तर महिला ग्राम प्रधान घर में चूल्हा-चौका करते हुए मिल जाएगी। कोर्ट की टिप्पणी के बाद बुधवार को अमर उजाला की टीम ने औराई की दो, भदोही की दो और डीघ ब्लॉक की दो ग्राम पंचायतों में पहुंचकर महिला ग्राम प्रधानों से बात की तो उन्हें अपनी ग्रामसभा के मजरे का नाम तक ही नहीं मालूम है। ऐसे में तमाम सवाल खड़े होते हैं कि जब प्रधान को अपने गांव की जानकारी नहीं तो वह कैसे गांव से जुड़े कार्य कर सकेंगी।
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केस-एक- चौरी गांव में महिला प्रधान से पिछली खुली बैठक के बारे में जानकारी मांगी तो वह कुछ बताने में असमर्थ दिखीं। कहा कि उनका बेटा ही सबकुछ देखता है।
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केस- जंगीगंज से सटे एक गांव की महिला प्रधान अपने ग्राम सभा के मजरों का नाम तक नहीं बता सकीं। कितने दिन प्रधान बने हुए यह भी बताने में वह असमर्थ रहीं।
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वर्जन
पंचायती राज एक्ट में निर्वाचित प्रधान को ही सभी कार्य करना होता है। ज्यादातर कार्यक्रमों में प्रधान आती हैं, समस्या होने पर वे घर रहती है। बतौर प्रतिनिधि पति या बेटे को भेजती है। एक्ट के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए जल्द ही पत्र लिखा जाएगा। - राकेश कुमार यादव, जिला पंचायत राज अधिकारी
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इनसेट
शासनादेश और एक्ट का नहीं होता पालन
ज्ञानपुर। महिला प्रधान, बीडीसी, जिपं सदस्य एवं ब्लॉक प्रमुख तक को कामकाज देखने की जिम्मेदारी है। पति या बेटे की सहभागिता पर कार्रवाई को लेकर कई एक्ट एवं शासनादेश भी जारी हुए, लेकिन कभी उसका पालन धरातल पर नहीं हो सका।
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जिले में 546 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें से 230 ग्राम पंचायत की बागडोर महिलाओं के हाथ में है। एकाक ही महिला प्रधान अपने अधिकार के प्रति जागरूक हैं। वह गांव में सरकार चला रही हैं, लेकिन, अधिकांश पंचायतों में महिला के पति ही पुरूष परिजन बागडोर थामे हुए हैं। पंचायत में होने वाले विकास कार्य का खांका पति या परिवार के पुरूष सदस्य ही खींचते हैं। वे खाता संचालन, पंचायत की बैठक, जिला मुख्यालय के आयोजन तक में शामिल होते हैं। पंचायती राज एक्ट में प्राविधान है कि महिला जनप्रतिनिधि ही सभी कार्य करेंगी, लेकिन वह सिर्फ कागजों पर रही ही सीमित है। जिले में अधिकत्तर महिला ग्राम प्रधान घर में चूल्हा-चौका करते हुए मिल जाएगी। कोर्ट की टिप्पणी के बाद बुधवार को अमर उजाला की टीम ने औराई की दो, भदोही की दो और डीघ ब्लॉक की दो ग्राम पंचायतों में पहुंचकर महिला ग्राम प्रधानों से बात की तो उन्हें अपनी ग्रामसभा के मजरे का नाम तक ही नहीं मालूम है। ऐसे में तमाम सवाल खड़े होते हैं कि जब प्रधान को अपने गांव की जानकारी नहीं तो वह कैसे गांव से जुड़े कार्य कर सकेंगी।
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केस-एक- चौरी गांव में महिला प्रधान से पिछली खुली बैठक के बारे में जानकारी मांगी तो वह कुछ बताने में असमर्थ दिखीं। कहा कि उनका बेटा ही सबकुछ देखता है।
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केस- जंगीगंज से सटे एक गांव की महिला प्रधान अपने ग्राम सभा के मजरों का नाम तक नहीं बता सकीं। कितने दिन प्रधान बने हुए यह भी बताने में वह असमर्थ रहीं।
वर्जन
पंचायती राज एक्ट में निर्वाचित प्रधान को ही सभी कार्य करना होता है। ज्यादातर कार्यक्रमों में प्रधान आती हैं, समस्या होने पर वे घर रहती है। बतौर प्रतिनिधि पति या बेटे को भेजती है। एक्ट के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए जल्द ही पत्र लिखा जाएगा। - राकेश कुमार यादव, जिला पंचायत राज अधिकारी
इनसेट
शासनादेश और एक्ट का नहीं होता पालन
ज्ञानपुर। महिला प्रधान, बीडीसी, जिपं सदस्य एवं ब्लॉक प्रमुख तक को कामकाज देखने की जिम्मेदारी है। पति या बेटे की सहभागिता पर कार्रवाई को लेकर कई एक्ट एवं शासनादेश भी जारी हुए, लेकिन कभी उसका पालन धरातल पर नहीं हो सका।