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Bhadohi News: पांच से आठ फीसदी परिवारों को ही मिला 100 दिन काम
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ज्ञानपुर। सौ दिन काम की गारंटी वाले मनरेगा में तीन वर्ष में मात्र ढाई हजार परिवारों को काम मिला है। विभागीय उदासीनता कहें या मजदूरों का मोहभंग, लेकिन जिस उम्मीद से योजना शुरू की गई, वह फलीभूत नहीं हो पा रही है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में 1250, 2022-23 में करीब 1350 और 2023-24 में 1100 के करीब परिवारों को 100 दिन काम मिल सका है। वर्तमान समय में महज 80,224 सक्रिय जॉब कार्डधारक रह गए हैं।
मजदूरों का पलायन रोकने के लिए मनरेगा योजना वर्ष 2008 से जिले में प्रभावी हुई। शुरुआती दौर में तालाबों के सुंदरीकरण से लेकर अन्य काम तेजी से कराए गए, लेकिन समय के साथ ही विकास के दूसरे काम भी इसी से जोड़ दिए गए। प्रधानमंत्री आवास, खड़ंजा, संपर्क मार्गों की पटरियों, पौधरोपण, पंचायत भवन, सामुदायिक शौचालय से लेकर अन्य दूसरे कार्यों को भी मनरेगा में शामिल किया गया। इससे योजना ने गति जरूरी पकड़ी, लेकिन 100 दिन काम दिलाने की मुहिम से भटक गई। अधिसंख्य मजदूर काम ढूंढने के लिए जगह-जगह चक्कर लगा रहे हैं। कई गांवों में रोजगार की मांग बढ़ गई है, लेकिन बिना काम किए मस्टर रोल तैयार करने की जुगत में लगे प्रधान और सचिव लेखाजोखा भी प्रस्तुत नहीं कर सके। विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो पंजीकृत एक लाख 33 हजार जॉब कार्डधारकों में करीब 80 हजार ही सक्रिय हैं। तीन साल के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति ठीक नहीं है। साल दर साल 100 दिन काम देने के मामले में स्थिति बेहतर होने के बजाए खराब होती गई।
वर्तमान में आचार संहिता प्रभावी होने से नए काम नहीं हो पा रहे हैं। पूर्व में जो चल रहे हैं, उसे ही पूरा कराया जा रहा है। शासन से तय मानव दिवस को सृजित कर लिया जाता है, हालांकि परिवारों को 100 दिन काम देने में दिक्कतें आती हैं।
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- राजाराम, मनरेगा उपायुक्त
ज्ञानपुर। मनरेगा में मजदूरों को 225 रूपये मजदूरी मिलती है जबकि बाजार में उन्हें 300 से 400 रूपये मिल जाते है। इससे वह मनरेगा के बजाए अन्य काम में लगते हैं। अधिकारी भी परेशान हैं कि कार्डधारकों को कैसे योजना से जोड़ा जाए। उपायुक्त का कहना है कि शुरूआती दौर में मनमानी तरीके से जॉब कार्ड बना दिए गए थे। लोगों को यह जानकारी थी कि बगैर काम किए भी उन्हें पैसा मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं है। मजदूरों से कहा जा रहा कि अन्य लाभकारी योजनाएं इसी जॉब कार्ड के जरिये मिल रही हैं, काम नहीं करेंगे तो वह बंद हो जाएंगी। इसके बाद भी उनमें सुधार नहीं हो रहा।
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मजदूरों का पलायन रोकने के लिए मनरेगा योजना वर्ष 2008 से जिले में प्रभावी हुई। शुरुआती दौर में तालाबों के सुंदरीकरण से लेकर अन्य काम तेजी से कराए गए, लेकिन समय के साथ ही विकास के दूसरे काम भी इसी से जोड़ दिए गए। प्रधानमंत्री आवास, खड़ंजा, संपर्क मार्गों की पटरियों, पौधरोपण, पंचायत भवन, सामुदायिक शौचालय से लेकर अन्य दूसरे कार्यों को भी मनरेगा में शामिल किया गया। इससे योजना ने गति जरूरी पकड़ी, लेकिन 100 दिन काम दिलाने की मुहिम से भटक गई। अधिसंख्य मजदूर काम ढूंढने के लिए जगह-जगह चक्कर लगा रहे हैं। कई गांवों में रोजगार की मांग बढ़ गई है, लेकिन बिना काम किए मस्टर रोल तैयार करने की जुगत में लगे प्रधान और सचिव लेखाजोखा भी प्रस्तुत नहीं कर सके। विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो पंजीकृत एक लाख 33 हजार जॉब कार्डधारकों में करीब 80 हजार ही सक्रिय हैं। तीन साल के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति ठीक नहीं है। साल दर साल 100 दिन काम देने के मामले में स्थिति बेहतर होने के बजाए खराब होती गई।
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वर्तमान में आचार संहिता प्रभावी होने से नए काम नहीं हो पा रहे हैं। पूर्व में जो चल रहे हैं, उसे ही पूरा कराया जा रहा है। शासन से तय मानव दिवस को सृजित कर लिया जाता है, हालांकि परिवारों को 100 दिन काम देने में दिक्कतें आती हैं।
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- राजाराम, मनरेगा उपायुक्त
ज्ञानपुर। मनरेगा में मजदूरों को 225 रूपये मजदूरी मिलती है जबकि बाजार में उन्हें 300 से 400 रूपये मिल जाते है। इससे वह मनरेगा के बजाए अन्य काम में लगते हैं। अधिकारी भी परेशान हैं कि कार्डधारकों को कैसे योजना से जोड़ा जाए। उपायुक्त का कहना है कि शुरूआती दौर में मनमानी तरीके से जॉब कार्ड बना दिए गए थे। लोगों को यह जानकारी थी कि बगैर काम किए भी उन्हें पैसा मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं है। मजदूरों से कहा जा रहा कि अन्य लाभकारी योजनाएं इसी जॉब कार्ड के जरिये मिल रही हैं, काम नहीं करेंगे तो वह बंद हो जाएंगी। इसके बाद भी उनमें सुधार नहीं हो रहा।