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सोचा नहीं था कि विकलांग पिता पर बोझ बन जाऊंगा
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भदोही। ब्लॉक के मूंसीलाटपुर के रमाशंकर शर्मा पैर से विकलांग हैं। दो बेटे समाचार पत्र वितरक हैं। जिसमे से एक बेटे चंदन को गांव के ही एक व्यक्ति के साथ कमाने के लिए सूरत भेज दिया था। बेटे ने वहां लेडीज सूट बनाने वाली कंपनी में 11 हजार रुपये पगार पर नौकरी कर ली।
लगभग छह माह वहां काम करने के बाद कोरोना का ऐसा साया देश पर पड़ा कि काम ठप हो गया और बेटा वहीं पर फंस गया। बेटे ने वहां से लौटने के लिए पिताजी से तीन हजार रुपये मांगे। जिसकी व्यवस्था करने में दो सप्ताह लग गए। जब घर से उसके खाते में तीन हजार रुपये भेजे गए तब जाकर एक ट्रक पर सवार होकर चंदन घर लौटा है। चंदन ने बताया कि जो पगार मिलता था वह खोली के किराए और खाने में खर्च हो जाता था मैं इतना अभागा हूं कि घर बूढ़े मां बाप के लिए आसरा बनने का सपना लेकर सूरत गया था लेकिन अंतत: उन्हीं पर बोझ बन गया।
उधर महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में ट्रांसफार्मर के पुर्जे बनाने वाली कंपनी में काम करने वाले बोरी बोझ दुर्गागंज के मुलायम बिंद (27) मंगलवार को रेल से बस्ती लौटे हैं। वहां से बस से भदोही आए हैं। उनके पास किराया के नाम पर जेब में एक भी पैसे नहीं थे। कहा कि धन्य हो कि भाड़ा नहीं लगा और अपने घर पर पहुंच गए। कहा कि यह पहली बार होगा जब पिता, पत्नी और दो बच्चों के लिए कुछ लेकर नहीं आया हूं। फैक्ट्री मालिक ने दो महीने का वेतन देने का भरोसा दिलाया है यदि ईश्वर की दया रही तो वापस जाऊंगा। फिलहाल तो परिवार की जीविका के लिए यहां करेंगे यह समझ से बाहर है।
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लगभग छह माह वहां काम करने के बाद कोरोना का ऐसा साया देश पर पड़ा कि काम ठप हो गया और बेटा वहीं पर फंस गया। बेटे ने वहां से लौटने के लिए पिताजी से तीन हजार रुपये मांगे। जिसकी व्यवस्था करने में दो सप्ताह लग गए। जब घर से उसके खाते में तीन हजार रुपये भेजे गए तब जाकर एक ट्रक पर सवार होकर चंदन घर लौटा है। चंदन ने बताया कि जो पगार मिलता था वह खोली के किराए और खाने में खर्च हो जाता था मैं इतना अभागा हूं कि घर बूढ़े मां बाप के लिए आसरा बनने का सपना लेकर सूरत गया था लेकिन अंतत: उन्हीं पर बोझ बन गया।
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उधर महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में ट्रांसफार्मर के पुर्जे बनाने वाली कंपनी में काम करने वाले बोरी बोझ दुर्गागंज के मुलायम बिंद (27) मंगलवार को रेल से बस्ती लौटे हैं। वहां से बस से भदोही आए हैं। उनके पास किराया के नाम पर जेब में एक भी पैसे नहीं थे। कहा कि धन्य हो कि भाड़ा नहीं लगा और अपने घर पर पहुंच गए। कहा कि यह पहली बार होगा जब पिता, पत्नी और दो बच्चों के लिए कुछ लेकर नहीं आया हूं। फैक्ट्री मालिक ने दो महीने का वेतन देने का भरोसा दिलाया है यदि ईश्वर की दया रही तो वापस जाऊंगा। फिलहाल तो परिवार की जीविका के लिए यहां करेंगे यह समझ से बाहर है।
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