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हर वर्ष पुस्तकें बदल देते हैं निजी स्कूल
ब्यूरो/ अमर उजाला ,भदोही
Updated Fri, 22 Apr 2016 02:08 AM IST
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भदोही शहर के स्टेशन रोड स्थित एक दुकान पर पाठ्य पुस्तकों की खरीदारी करता छात्र
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शहर की पुस्तक दूकानों पर इन दिनों पाठ्य पुस्तकें खरीदने के लिए राजकीय विद्यालयों के साथ-साथ दूसरे बोर्डों से संबद्ध स्कूलों के छात्र पहुंच रहे हैं। राजकीय विद्यालयों की पुस्तकें तो दूकानों पर सहजता से उपलब्ध हैं, लेकिन सीबीएसई बोर्ड की पुस्तकें बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। यह पुस्तकें अभिभावकों को विद्यालय से ही खरीदने का दबाव होता है। विद्यालय प्रशासन हर वर्ष इसलिए पुस्तकें बदल देते हैं ताकि बच्चे पुरानी किताबों से काम न चला सकें और महंगी किताबें खरीदने के लिए विवश हो जाएं।
नगर के सीबीएसई स्कूलों में कक्षा नौवीं से लेकर बारहवीं तक राष्ट्रीय स्वैच्छिक अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की पुस्तकें चलाई जा रही हैं। हलांकि आठवीं और इसके नीचे की कक्षाओं की पुस्तकों में एनसीईआरटी की पुस्तकें नहीं चलाए जाने से अभिभावकों का भारी दोहन हो रहा है। यही कारण है कि नगर में राजकीय स्कूलों के पुस्तक विक्रेता बड़ी संख्या में हैं, लेकिन सीबीएसई से संबद्ध विद्यालयों की पुस्तकों केे विक्रेता न के बराबर हैं। स्टेशन रोड, गर्ल्स इंटर कॉलेज के पास पुस्तक विक्रेता तनबीर हयात खां बताते हैं कि निजी अंग्रेजी विद्यालयों के छात्र कम ही किताबें लेने आते हैं। वह इसलिए कि उन्हें अपने स्कूल से ही पुस्तकें लेनी पड़ती हैं। इसकी उन्हें भारी भरकम कीमत अदा करनी होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ स्कूल तो सीधे सीधे पुस्तकों का ठेका देने के लिए लाखों रुपये की मांग करते हैं। बताया कि एनसीईआरटी की पुस्तकें सस्ती होती हैं। नौवीं कक्षा के बाद निजी स्कूल एनसीईआरटी की पुस्तकें चलाते तो हैं, लेकिन उसके साथ साथ कुछ महंगी पुस्तकें भी लेने पर जोर देते हैं ताकि उनकी कमाई हो सके। ऐसी पुस्तकों को उन्होंने बोलचाल में साइड पुस्तक का नाम दिया है। अभिभावक राजेंद्र यादव ने कहा कि सर्वप्रथम सरकार यह नीति बनाए कि विद्यालय पाठ्य पुस्तक को हर वर्ष बदल न सकें। क्योंकि पुरानी पुस्तकें दूसरे सैकड़ों छात्रों के काम आ सकती हैं। उन्होंने कहा कि यह छोटा सा कानून बहुत से गरीब अभिभावकों के लिए भारी राहत वाला हो सकता है। उधर जीवीपीएस भदोही के प्रिंसिपल विभव श्रीवास्तव का कहना है कि हम नौवीं से लेकर बारहवीं कक्षा तक एनसीआरटी की पुस्तकें ही चलाते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि बाजार में एनसीईआरटी की पुस्तकें नहीं मिलतीं। ऐसी दशा में दूसरे प्रकाशक की पुस्तकें लेने को कहते हैं। कक्षा एक से आठवीं तक हमें पुस्तकों के चयन में सीबीएसई और एनसीईआरटी के गाइड लाइन का पालन करना होता है। वह हम करते हैं। एनसीईआरटी को इतना सुनिश्चित करना चाहिए कि बाजार में उसकी पुस्तकें उपलब्ध हों।
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नगर के सीबीएसई स्कूलों में कक्षा नौवीं से लेकर बारहवीं तक राष्ट्रीय स्वैच्छिक अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की पुस्तकें चलाई जा रही हैं। हलांकि आठवीं और इसके नीचे की कक्षाओं की पुस्तकों में एनसीईआरटी की पुस्तकें नहीं चलाए जाने से अभिभावकों का भारी दोहन हो रहा है। यही कारण है कि नगर में राजकीय स्कूलों के पुस्तक विक्रेता बड़ी संख्या में हैं, लेकिन सीबीएसई से संबद्ध विद्यालयों की पुस्तकों केे विक्रेता न के बराबर हैं। स्टेशन रोड, गर्ल्स इंटर कॉलेज के पास पुस्तक विक्रेता तनबीर हयात खां बताते हैं कि निजी अंग्रेजी विद्यालयों के छात्र कम ही किताबें लेने आते हैं। वह इसलिए कि उन्हें अपने स्कूल से ही पुस्तकें लेनी पड़ती हैं। इसकी उन्हें भारी भरकम कीमत अदा करनी होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ स्कूल तो सीधे सीधे पुस्तकों का ठेका देने के लिए लाखों रुपये की मांग करते हैं। बताया कि एनसीईआरटी की पुस्तकें सस्ती होती हैं। नौवीं कक्षा के बाद निजी स्कूल एनसीईआरटी की पुस्तकें चलाते तो हैं, लेकिन उसके साथ साथ कुछ महंगी पुस्तकें भी लेने पर जोर देते हैं ताकि उनकी कमाई हो सके। ऐसी पुस्तकों को उन्होंने बोलचाल में साइड पुस्तक का नाम दिया है। अभिभावक राजेंद्र यादव ने कहा कि सर्वप्रथम सरकार यह नीति बनाए कि विद्यालय पाठ्य पुस्तक को हर वर्ष बदल न सकें। क्योंकि पुरानी पुस्तकें दूसरे सैकड़ों छात्रों के काम आ सकती हैं। उन्होंने कहा कि यह छोटा सा कानून बहुत से गरीब अभिभावकों के लिए भारी राहत वाला हो सकता है। उधर जीवीपीएस भदोही के प्रिंसिपल विभव श्रीवास्तव का कहना है कि हम नौवीं से लेकर बारहवीं कक्षा तक एनसीआरटी की पुस्तकें ही चलाते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि बाजार में एनसीईआरटी की पुस्तकें नहीं मिलतीं। ऐसी दशा में दूसरे प्रकाशक की पुस्तकें लेने को कहते हैं। कक्षा एक से आठवीं तक हमें पुस्तकों के चयन में सीबीएसई और एनसीईआरटी के गाइड लाइन का पालन करना होता है। वह हम करते हैं। एनसीईआरटी को इतना सुनिश्चित करना चाहिए कि बाजार में उसकी पुस्तकें उपलब्ध हों।
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