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एडमिशन का बहाना, भर रहे खजाना
ब्यूरो/ अमर उजाला ,भदोही
Updated Fri, 01 Apr 2016 01:08 AM IST
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स्कूल
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30 रुपये की किताब 300 और 50 रुपये की 500 में। बच्चे का एडमिशन कराना है तो जेब ढीली करिए, वरना आगे बढ़िए। नए शिक्षा सत्र में कान्वेंट स्कूलों में एडमिशन तो केवल एक बहाना है, हकीकत में अभिभावकों की जेब हल्की कर प्रबंधक अपना खजाना भरने में लगे हैं। स्कूलों की मनमानी वसूली से सामान्य लोगों की तो बात छोड़िए, 30 से 40 हजार हर माह वेतन पाने वालों के भी पसीने छूट रहे है। प्रबंधकों की खुलेआम लूट के आगे अफसर भी चुप्पी साधे हुए हैं। शिक्षा विभाग से लेकर प्रशासनिक अधिकारी भी ऐसे प्रबंधकों पर सख्ती नहीं बरत रहे हैं। सबसे मजे की बात है कि मान्यता के समय एनसीईआरटी की पुस्तकें चलाने की बात कहते हैं, लेकिन मान्यता मिलने के बाद शासन की नियमावली को भी दरकिनार कर देते हैं।
शिक्षा को लेकर सरकार भले ही हर साल अरबों रुपये पानी की तरह बहा रही है, लेकिन अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए अच्छे और नामी कान्वेंट स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। सभी को सस्ते दर पर शिक्षा मिले इसके लिए सरकार एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) की पुस्तकें चलाने के लिए शासनादेश में अंकित किया है। एनसीईआरटी की किताबें 30 से लेकर 50 रुपए में ही उपलब्ध होती हैं लेकिन जिले में कान्वेंट स्कूल के प्रबंधक नियमों को ताख पर रखकर किताबें पढ़ने में अपनी नियमावली को लागू करते हैं। प्ले ग्रुप से लेकर आठवीं तक में एनसीईआरटी के स्थान पर खुद की तय किताबों को ही चलाते हैं। अप्रैल महीने में एडमिशन के बहाने अभिभावकों की जमापूंजी भी जवाब देने लगती है। प्ले ग्रुप, पहली और दूसरी की कक्षाओं में एडमिशन और फीस में ही करीब 10 हजार खर्च होता है, जबकि किताब और यूनिफार्म पर भी 10 हजार खर्च आ जाता है।
इनसेट
प्रकाशकों से सेटिंग, 40 फीसदी कमीशन
ज्ञानपुर। कान्वेंट स्कूलों में नया शिक्षा सत्र शुरू होने से पहले ही प्रबंधकों का मायाजाल फैल जाता है। प्रकाशकों से तय रेट के हिसाब से किताबें छप जाती है। किताबों पर प्रकाशक कम से कम 40 फीसदी तक कमीशन देते हैं। औसतन एक स्कूल का प्रबंधक अप्रैल माह में किताबों से 15 लाख और यूनिफार्म से 10 लाख की कमीशन कमाता है। शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 50 पन्ने की किताब पर 300 मूल्य अंकित कराकर वसूली की जाती है। सरकार को इस पर कदम उठाने की जरूरत है।
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इनसेट
हर साल बदलता है पाठ्यक्रम और ड्रेस
ज्ञानपुर। कान्वेंट स्कूलों की मनमानी कमीशनखोरी और कमाई के पीछे हर साल कक्षाओं का बदलता पाठ्यक्रम और यूनिफार्म है। वर्ष 2014 में जो पाठ्यक्रम था वह 2015 में नहीं है। इसी तरह कक्षाओं में हर साल यूनिफार्म भी बदले जाते हैं। पहली से आठवीं तक की कक्षाओं की किताबों का सेट पहले से ही बंधा रहता है। पैसे दीजिए और किताबें ले जाइए।
इनसेट
काम करती है एक लॉबी
ज्ञानपुर। कान्वेंट स्कूलों पर अंकुश न लगने के पीछे एक लॉबी को माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों से लेकर कुछ अफसर तक ऐसे स्कूल संचालकों को पूरा संरक्षण देते हैं। शासन तक बेहतर पकड़ होने के चलते स्कूलों पर शिकंजा कसने के लिए कोई ठोस नियम-कानून भी नहीं बन सके हैं।
इनसेट
उठाएंगे कड़ा कदम: डीएम
ज्ञानपुर। कान्वेंट स्कूलों में मनमानी फीस वसूली और हर साल किताबों में बदलाव करने का मामला डीएम प्रकाश बिंदु ने संज्ञान में लिया है। उन्होंने कहा कि ऐसे स्कूलों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाएगी।
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अभिभावकों की बात-
अभिभावक दीनानाथ यादव ने कहा कि कान्वेंट स्कूलों की मनमानी से ज्यादातर कमाई बच्चों की पढ़ाई पर ही खर्च हो जाता है। सरकार और अधिकारी ऐसे स्कूलों पर लगाम कसें तो बेहतर हो।
अभिभावक मनीष श्रीवास्तव ने बताया कि अप्रैल माह का बजट तीन माह की कमाई पर असर डालता है। दो बच्चों की पढ़ाई पर 20 से 25 हजार रुपये अप्रैल में ही खर्च हो जाते हैं।
पुस्तक विक्रेता पारस गुप्ता का कहना है कि प्रबंधकों की मांग पर वह प्रकाशकों से किताबों को मंगाते हैं। ज्यादातर प्रबंधक अपने स्कूलों से ही किताबों का वितरण करते हैं।
अभिभावक सतीश गुप्ता की मानें रूकान्वेंट स्कूलों को बंद कराने की जरूरत है। कहा कि शिक्षा विभाग ऐसे स्कूलों को संरक्षण देता है, जिससे परिषदीय स्कूलों की दशा सुधर नहीं रही है।
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शिक्षा को लेकर सरकार भले ही हर साल अरबों रुपये पानी की तरह बहा रही है, लेकिन अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए अच्छे और नामी कान्वेंट स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। सभी को सस्ते दर पर शिक्षा मिले इसके लिए सरकार एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) की पुस्तकें चलाने के लिए शासनादेश में अंकित किया है। एनसीईआरटी की किताबें 30 से लेकर 50 रुपए में ही उपलब्ध होती हैं लेकिन जिले में कान्वेंट स्कूल के प्रबंधक नियमों को ताख पर रखकर किताबें पढ़ने में अपनी नियमावली को लागू करते हैं। प्ले ग्रुप से लेकर आठवीं तक में एनसीईआरटी के स्थान पर खुद की तय किताबों को ही चलाते हैं। अप्रैल महीने में एडमिशन के बहाने अभिभावकों की जमापूंजी भी जवाब देने लगती है। प्ले ग्रुप, पहली और दूसरी की कक्षाओं में एडमिशन और फीस में ही करीब 10 हजार खर्च होता है, जबकि किताब और यूनिफार्म पर भी 10 हजार खर्च आ जाता है।
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प्रकाशकों से सेटिंग, 40 फीसदी कमीशन
ज्ञानपुर। कान्वेंट स्कूलों में नया शिक्षा सत्र शुरू होने से पहले ही प्रबंधकों का मायाजाल फैल जाता है। प्रकाशकों से तय रेट के हिसाब से किताबें छप जाती है। किताबों पर प्रकाशक कम से कम 40 फीसदी तक कमीशन देते हैं। औसतन एक स्कूल का प्रबंधक अप्रैल माह में किताबों से 15 लाख और यूनिफार्म से 10 लाख की कमीशन कमाता है। शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 50 पन्ने की किताब पर 300 मूल्य अंकित कराकर वसूली की जाती है। सरकार को इस पर कदम उठाने की जरूरत है।
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हर साल बदलता है पाठ्यक्रम और ड्रेस
ज्ञानपुर। कान्वेंट स्कूलों की मनमानी कमीशनखोरी और कमाई के पीछे हर साल कक्षाओं का बदलता पाठ्यक्रम और यूनिफार्म है। वर्ष 2014 में जो पाठ्यक्रम था वह 2015 में नहीं है। इसी तरह कक्षाओं में हर साल यूनिफार्म भी बदले जाते हैं। पहली से आठवीं तक की कक्षाओं की किताबों का सेट पहले से ही बंधा रहता है। पैसे दीजिए और किताबें ले जाइए।
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काम करती है एक लॉबी
ज्ञानपुर। कान्वेंट स्कूलों पर अंकुश न लगने के पीछे एक लॉबी को माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों से लेकर कुछ अफसर तक ऐसे स्कूल संचालकों को पूरा संरक्षण देते हैं। शासन तक बेहतर पकड़ होने के चलते स्कूलों पर शिकंजा कसने के लिए कोई ठोस नियम-कानून भी नहीं बन सके हैं।
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उठाएंगे कड़ा कदम: डीएम
ज्ञानपुर। कान्वेंट स्कूलों में मनमानी फीस वसूली और हर साल किताबों में बदलाव करने का मामला डीएम प्रकाश बिंदु ने संज्ञान में लिया है। उन्होंने कहा कि ऐसे स्कूलों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाएगी।
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अभिभावकों की बात-
अभिभावक दीनानाथ यादव ने कहा कि कान्वेंट स्कूलों की मनमानी से ज्यादातर कमाई बच्चों की पढ़ाई पर ही खर्च हो जाता है। सरकार और अधिकारी ऐसे स्कूलों पर लगाम कसें तो बेहतर हो।
अभिभावक मनीष श्रीवास्तव ने बताया कि अप्रैल माह का बजट तीन माह की कमाई पर असर डालता है। दो बच्चों की पढ़ाई पर 20 से 25 हजार रुपये अप्रैल में ही खर्च हो जाते हैं।
पुस्तक विक्रेता पारस गुप्ता का कहना है कि प्रबंधकों की मांग पर वह प्रकाशकों से किताबों को मंगाते हैं। ज्यादातर प्रबंधक अपने स्कूलों से ही किताबों का वितरण करते हैं।
अभिभावक सतीश गुप्ता की मानें रूकान्वेंट स्कूलों को बंद कराने की जरूरत है। कहा कि शिक्षा विभाग ऐसे स्कूलों को संरक्षण देता है, जिससे परिषदीय स्कूलों की दशा सुधर नहीं रही है।