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इमरजेंसी सेवा तक सिमटा जिला अस्पताल का ट्रामा सेंटर
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इमरजेंसी सेवा तक सिमटा जिला अस्पताल का ट्रामा सेंटर
स्थापना के एक दशक बाद भी ट्रामा सेंटर को नहीं मिल सकीं सुविधाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। जिला अस्पताल का ट्रामा सेंटर केवल इमरजेंसी सेवा तक ही सिमट कर रह गया है। यहां तक ट्रामा सेंटर के लिए अनुमन्य चिकित्सकों तक की तैनाती नहीं हो सकी। ऐसे में सड़क दुर्घटना में घायल लोगों को समुचित उपचार के लिए गोरखपुर या लखनऊ रेफर होना मजबूरी बनी हुई है।
करीब डेढ़ दशक पूर्व शासन ने नेशनल हाईवे से जुड़े जिलों में ट्रामा सेंटर स्थापित करने को हरी झंडी दी। उद्देश्य था कि सड़क या अन्य दुर्घटनाओं में होने वाली मौत को त्वरित और बेहतर उपचार देकर कम किया जा सके। सरकार की मंशा के अनुसार जिले में इस पर काम शुरू हुआ और करीब एक दशक पहले मंडल मुख्यालय पर स्थित जिला अस्पताल में ट्रामा सेंटर का भवन बनकर तैयार भी हो गया। मगर भवन बनने के बाद संसाधनों की जरूरत पूरी करने में शायद विलंब हुआ। इस बीच अस्पताल प्रशासन ने ट्रामा सेंटर को इमरजेंसी सेवा के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। तब से लेकर अब तक यहां केवल इमरजेंसी सेवाएं ही दी जा रही हैं। यहां लगाया गया ट्रामा सेंटर का बोर्ड महज दिखावा बनकर रह गया है। जिला अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आलोक वर्मा ने कहा कि ट्रामा सेंटर संचालन के लिए जो सुविधाएं चाहिए, वह अभी मिल नहीं सकी हैं। हालांकि डिमांड किया गया, मगर जब तक सुविधा नहीं होगी, तब तक इसका संचालन संभव नहीं हो पाएगा। प्रयास है कि जल्द से जल्द सुविधाएं मिल जाएं।
ट्रामा सेंटर की टूट रही उम्मीद
जिले में कोई भी ऐसा उच्च तकनीक व व्यवस्था से सुसज्जित अस्पताल नहीं है, जहां दुर्घटना के बाद तत्काल बेहतर उपचार मिल सके। ऐसे में लोगों को मजबूरन गोरखपुर या लखनऊ तक जाना पड़ता है। कई बार तो मरीज इलाज के अभाव में रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। लोगों को जिले में ट्रामा सेंटर की उम्मीद धीरे-धीरे टूटने लगी है।
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ट्रामा सेंटर का मानक नहीं हुआ पूरा
- सेंटर में चार आपरेशन थियेटर होने चाहिए। इसमें न्यूरो, हड्डी व पेट के लिए अलग-अलग ऑपरेशन हो सकें।
- आइसीयू की सुविधा होनी चाहिए। ब्लड बैंक, एमआरआइ व सीटी स्कैन की सुविधा होनी चाहिए।
- 24 घंटे सिर से पैर तक की सर्जरी के लिए एक ही छत के नीचे पूरी सुविधा होनी चाहिए।
- न्यूरो सर्जन व आर्थोपेडिक सर्जन सहित दूसरे सभी सर्जन 24 घंटे ट्रामा सेंटर में ही मौजूद रहें। यानि आठ-आठ घंटे की ड्यूटी पर प्रत्येक विधा के तीन विशेषज्ञ होने चाहिए।
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स्थापना के एक दशक बाद भी ट्रामा सेंटर को नहीं मिल सकीं सुविधाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। जिला अस्पताल का ट्रामा सेंटर केवल इमरजेंसी सेवा तक ही सिमट कर रह गया है। यहां तक ट्रामा सेंटर के लिए अनुमन्य चिकित्सकों तक की तैनाती नहीं हो सकी। ऐसे में सड़क दुर्घटना में घायल लोगों को समुचित उपचार के लिए गोरखपुर या लखनऊ रेफर होना मजबूरी बनी हुई है।
करीब डेढ़ दशक पूर्व शासन ने नेशनल हाईवे से जुड़े जिलों में ट्रामा सेंटर स्थापित करने को हरी झंडी दी। उद्देश्य था कि सड़क या अन्य दुर्घटनाओं में होने वाली मौत को त्वरित और बेहतर उपचार देकर कम किया जा सके। सरकार की मंशा के अनुसार जिले में इस पर काम शुरू हुआ और करीब एक दशक पहले मंडल मुख्यालय पर स्थित जिला अस्पताल में ट्रामा सेंटर का भवन बनकर तैयार भी हो गया। मगर भवन बनने के बाद संसाधनों की जरूरत पूरी करने में शायद विलंब हुआ। इस बीच अस्पताल प्रशासन ने ट्रामा सेंटर को इमरजेंसी सेवा के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। तब से लेकर अब तक यहां केवल इमरजेंसी सेवाएं ही दी जा रही हैं। यहां लगाया गया ट्रामा सेंटर का बोर्ड महज दिखावा बनकर रह गया है। जिला अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आलोक वर्मा ने कहा कि ट्रामा सेंटर संचालन के लिए जो सुविधाएं चाहिए, वह अभी मिल नहीं सकी हैं। हालांकि डिमांड किया गया, मगर जब तक सुविधा नहीं होगी, तब तक इसका संचालन संभव नहीं हो पाएगा। प्रयास है कि जल्द से जल्द सुविधाएं मिल जाएं।
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ट्रामा सेंटर की टूट रही उम्मीद
जिले में कोई भी ऐसा उच्च तकनीक व व्यवस्था से सुसज्जित अस्पताल नहीं है, जहां दुर्घटना के बाद तत्काल बेहतर उपचार मिल सके। ऐसे में लोगों को मजबूरन गोरखपुर या लखनऊ तक जाना पड़ता है। कई बार तो मरीज इलाज के अभाव में रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। लोगों को जिले में ट्रामा सेंटर की उम्मीद धीरे-धीरे टूटने लगी है।
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ट्रामा सेंटर का मानक नहीं हुआ पूरा
- सेंटर में चार आपरेशन थियेटर होने चाहिए। इसमें न्यूरो, हड्डी व पेट के लिए अलग-अलग ऑपरेशन हो सकें।
- आइसीयू की सुविधा होनी चाहिए। ब्लड बैंक, एमआरआइ व सीटी स्कैन की सुविधा होनी चाहिए।
- 24 घंटे सिर से पैर तक की सर्जरी के लिए एक ही छत के नीचे पूरी सुविधा होनी चाहिए।
- न्यूरो सर्जन व आर्थोपेडिक सर्जन सहित दूसरे सभी सर्जन 24 घंटे ट्रामा सेंटर में ही मौजूद रहें। यानि आठ-आठ घंटे की ड्यूटी पर प्रत्येक विधा के तीन विशेषज्ञ होने चाहिए।