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Basti News: वेंटिलेटर तो हैं, इलाज के लिए विशेषज्ञों का अकाल
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मेडिकल कॉलेज बस्ती के एनआईसीयू में भर्ती बच्चे संवाद
बस्ती। जिले के तीन सरकारी अस्पतालों में गंभीर नवजात और बच्चों के उपचार के लिए वेंटिलेटर समेत जीवन रक्षक उपकरण उपलब्ध हैं, लेकिन इन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित टेक्निशियन, ऑपरेटर और विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं हैं।
जिला महिला अस्पताल में दो वेंटिलेटर सेंट्रल ऑक्सीजन पाइपलाइन की सुविधा न होने से क्रियाशील नहीं हैं। मेडिकल कॉलेज में पीएम केयर फंड से मिले 10 वेंटिलेटर भी अभी चालू नहीं हो सके हैं। जिला अस्पताल के पीआईसीयू में 15 वेंटिलेटर उपलब्ध हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक ही किया जाता है। गंभीर नवजात और बच्चों के लिए तीनों अस्पतालों में एसएनसीयू, एनआईसीयू और पीआईसीयू की सुविधा है।
इसके बावजूद विशेषज्ञों और संसाधनों की कमी के कारण कई बार बच्चों को हायर सेंटर रेफर करना पड़ता है। खासकर जिला महिला अस्पताल में स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है, जहां एसएनसीयू सात बाल रोग विशेषज्ञों के स्वीकृत पद के मुकाबले एक नियमित विशेषज्ञ के सहारे चल रहा है।
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महिला अस्पताल में दो वेंटिलेटर लेकिन ऑक्सीजन पाइपलाइन नहीं
जिला महिला अस्पताल की एसएनसीयू में 18 बेड हैं। इनमें 15 नवजात भर्ती थे। यहां सात बाल रोग विशेषज्ञों के मुकाबले सिर्फ नियमित चिकित्सक डॉ. पंकज शुक्ल तैनात हैं। तीन इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर और तीन संविदा चिकित्सकों के पद भी रिक्त हैं। पीडियाट्रिक सर्जन का पद स्वीकृत नहीं है। दो एनेस्थेटिस्ट तैनात हैं। एसएनसीयू में दो वेंटिलेटर और एक सी-पैप मशीन उपलब्ध है, लेकिन सेंट्रल ऑक्सीजन पाइपलाइन नहीं होने के कारण दोनों वेंटिलेटर क्रियाशील नहीं हैं। ऑक्सीजन की जरूरत छोटे और जंबो सिलेंडरों से पूरी की जाती है। अस्पताल के अनुसार, करीब 200 छोटे और आठ से 10 जंबो सिलेंडर प्रतिमाह की जरूरत पड़ती है। एसएनसीयू के लिए तीन ऑपरेटर और तीन टेक्निशियन तैनात हैं। 12 स्टाफ नर्स की व्यवस्था है, जिसमें एक की ड्यूटी डिलीवरी रूम में लगाई गई है। पिछले माह एसएनसीयू में 148 बच्चे भर्ती हुए, जिनमें 136 को डिस्चार्ज किया गया। चार से छह गंभीर बच्चों को प्रतिमाह रेफर किया जाता है।
सीएमएस डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि बहुत गंभीर स्थिति होने या बेड उपलब्ध नहीं होने पर ही बच्चों को रेफर किया जाता है। वेंटिलेटर को क्रियाशील करने के लिए प्रयास किया जा रहा है।
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जिला अस्पताल में 15 बेड का पीआईसीयू, एनआईसीयू नहीं
जिला अस्पताल में 15 बेड का पीआईसीयू संचालित है। प्रत्येक बेड पर वेंटिलेटर की सुविधा उपलब्ध है। फिलहाल 10 बेड वाले विंग में गंभीर बच्चों को भर्ती किया जाता है, जबकि पांच बेड आरक्षित हैं। पीआईसीयू के लिए चार ऑपरेटर और एक टेक्निशियन तैनात हैं। कागजों में 15 वेंटिलेटर और एक सी-पैप मशीन उपलब्ध हैं। यहां सात बाल रोग विशेषज्ञ और एक एनेस्थेटिस्ट हैं, लेकिन पीडियाट्रिक सर्जन नहीं है। चिकित्सकों के अनुसार, गंभीर बच्चों को पहले सी-पैप के जरिये ऑक्सीजन दी जाती है। सुधार नहीं होने पर वेंटिलेटर का इस्तेमाल किया जाता है। पीआईसीयू के लिए 23 प्रशिक्षित स्टाफ नर्स की तैनाती की गई है, लेकिन इनमें से कई से सामान्य वार्ड में भी ड्यूटी ली जा रही है। गंभीर स्थिति वाले बच्चों को हायर सेंटर रेफर किया जाता है। हर महीने चार से छह बच्चों को रेफर किए जाने की बात सामने आई। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, 28 दिन से अधिक उम्र के बच्चों को पीआईसीयू में भर्ती किया जाता है। जीवन रक्षक उपकरण और चिकित्सकों की उपलब्धता का भी दावा किया गया है।
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मेडिकल कॉलेज में 10 वेंटिलेटर खराब, मरम्मत का दावा
मेडिकल कॉलेज में बच्चों के उपचार के लिए एसएनसीयू, एनआईसीयू और पीआईसीयू संचालित हैं। तीनों में कुल 45 बेड आरक्षित हैं। एनआईसीयू में 10, एसएनसीयू में 15 और पीआईसीयू में 20 बेड की व्यवस्था है। एनआईसीयू और एसएनसीयू में तीन वेंटिलेटर तथा पीआईसीयू में दो वेंटिलेटर उपलब्ध हैं। इसके अलावा पीएम केयर फंड से पीआईसीयू के लिए 10 वेंटिलेटर मिले थे, जो अभी क्रियाशील नहीं हैं। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, इनकी मरम्मत कराई जा रही है और जल्द इन्हें चालू किया जाएगा। बाल रोग विभाग में एचओडी समेत पांच चिकित्सक तैनात हैं। पीडियाट्रिक सर्जन नहीं होने के कारण दिल में सुराख या अन्य जटिल मामलों में बच्चों को हायर सेंटर रेफर करना पड़ता है। बेड उपलब्ध नहीं होने पर भी बच्चों को बीआरडी मेडिकल कॉलेज भेजा जाता है। एनेस्थेटिस्ट और रात्रिकालीन सेवा उपलब्ध होने का दावा किया गया है। उप प्रधानाचार्य डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि पीएम केयर फंड से मिले 10 वेंटिलेटर की मरम्मत कराई जा रही है। जल्द ही उन्हें क्रियाशील कर दिया जाएगा।
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केस-1
सांस में तकलीफ पर नवजात रेफर
सांऊघाट क्षेत्र के ब्योतहरा निवासी रोशनी के प्रसव के बाद नवजात को सांस लेने में परेशानी हुई। जांच के बाद बच्चे को एसएनसीयू में भर्ती कराया गया। हालत में सुधार नहीं होने पर चिकित्सकों ने रेफर कर दिया। परिजन बच्चे को मेडिकल कॉलेज ले जाने के बजाय निजी चिकित्सक के पास लेकर चले गए।
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केस-2
600 ग्राम की बच्ची ने उपचार के दौरान दम तोड़ा
सदर क्षेत्र की एक गर्भवती का करीब साढ़े छह माह में प्रसव हुआ। नवजात बच्ची का वजन महज 600 ग्राम था। उसे जिला महिला अस्पताल की एसएनसीयू में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों ने जांच के बाद हायर सेंटर रेफर करने की सलाह दी। परिजनों ने अस्पताल में ही उपचार कराने की बात कहते हुए लिखित सहमति दी। बाद में बच्ची की धड़कन रुक गई।
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आंकड़ों में स्थिति
जिला महिला अस्पताल
एसएनसीयू में भर्ती नवजात : 1776
रेफर किए गए : 69
गंभीर नवजात : 16
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जिला अस्पताल, बस्ती
पीआईसीयू में भर्ती बच्चे : 1649
रेफर किए गए : 96
गंभीर हालत वाले बच्चे : 41
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मेडिकल कॉलेज, बस्ती
तीनों विंग में भर्ती बच्चे : 2364
रेफर किए गए : 57
गंभीर बच्चे : 11
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रात में ऑनकॉल बुलाए जाते हैं चिकित्सक
महिला अस्पताल की एसएनसीयू में भर्ती नवजात की रात में तबीयत बिगड़ने पर ऑनकॉल चिकित्सक को बुलाया जाता है। स्टाफ नर्स की ड्यूटी तीन शिफ्ट में रहती है। मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में चिकित्सकों की नाइट ड्यूटी लगती है। अस्पतालों में ऑक्सीजन और बिजली के लिए बैकअप की व्यवस्था होने का दावा किया गया है। एंबुलेंस भी उपलब्ध रहती हैं। रेफरल की स्थिति में जिला और महिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज बस्ती से संपर्क किया जाता है। मेडिकल कॉलेज से गंभीर बच्चों के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज और केजीएमयू लखनऊ से संपर्क किया जाता है।
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कोट
मेडिकल कॉलेज में एसएनसीयू, एनआईसीयू और पीआईसीयू के साथ महिला अस्पताल में एसएनसीयू संचालित है। कुछ चिकित्सकों की कमी है, जिसकी व्यवस्था के लिए डॉक्टरों को अटैच किया गया है। रेफर मरीजों को एंबुलेंस की सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास रहता है। कोशिश होती है कि बच्चे का उपचार यहीं हो, गंभीर स्थिति में हायर सेंटर रेफर किया जाता है।
-डॉ. राजीव निगम, सीएमओ, बस्ती
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जिला महिला अस्पताल में दो वेंटिलेटर सेंट्रल ऑक्सीजन पाइपलाइन की सुविधा न होने से क्रियाशील नहीं हैं। मेडिकल कॉलेज में पीएम केयर फंड से मिले 10 वेंटिलेटर भी अभी चालू नहीं हो सके हैं। जिला अस्पताल के पीआईसीयू में 15 वेंटिलेटर उपलब्ध हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक ही किया जाता है। गंभीर नवजात और बच्चों के लिए तीनों अस्पतालों में एसएनसीयू, एनआईसीयू और पीआईसीयू की सुविधा है।
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इसके बावजूद विशेषज्ञों और संसाधनों की कमी के कारण कई बार बच्चों को हायर सेंटर रेफर करना पड़ता है। खासकर जिला महिला अस्पताल में स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है, जहां एसएनसीयू सात बाल रोग विशेषज्ञों के स्वीकृत पद के मुकाबले एक नियमित विशेषज्ञ के सहारे चल रहा है।
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महिला अस्पताल में दो वेंटिलेटर लेकिन ऑक्सीजन पाइपलाइन नहीं
जिला महिला अस्पताल की एसएनसीयू में 18 बेड हैं। इनमें 15 नवजात भर्ती थे। यहां सात बाल रोग विशेषज्ञों के मुकाबले सिर्फ नियमित चिकित्सक डॉ. पंकज शुक्ल तैनात हैं। तीन इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर और तीन संविदा चिकित्सकों के पद भी रिक्त हैं। पीडियाट्रिक सर्जन का पद स्वीकृत नहीं है। दो एनेस्थेटिस्ट तैनात हैं। एसएनसीयू में दो वेंटिलेटर और एक सी-पैप मशीन उपलब्ध है, लेकिन सेंट्रल ऑक्सीजन पाइपलाइन नहीं होने के कारण दोनों वेंटिलेटर क्रियाशील नहीं हैं। ऑक्सीजन की जरूरत छोटे और जंबो सिलेंडरों से पूरी की जाती है। अस्पताल के अनुसार, करीब 200 छोटे और आठ से 10 जंबो सिलेंडर प्रतिमाह की जरूरत पड़ती है। एसएनसीयू के लिए तीन ऑपरेटर और तीन टेक्निशियन तैनात हैं। 12 स्टाफ नर्स की व्यवस्था है, जिसमें एक की ड्यूटी डिलीवरी रूम में लगाई गई है। पिछले माह एसएनसीयू में 148 बच्चे भर्ती हुए, जिनमें 136 को डिस्चार्ज किया गया। चार से छह गंभीर बच्चों को प्रतिमाह रेफर किया जाता है।
सीएमएस डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि बहुत गंभीर स्थिति होने या बेड उपलब्ध नहीं होने पर ही बच्चों को रेफर किया जाता है। वेंटिलेटर को क्रियाशील करने के लिए प्रयास किया जा रहा है।
जिला अस्पताल में 15 बेड का पीआईसीयू, एनआईसीयू नहीं
जिला अस्पताल में 15 बेड का पीआईसीयू संचालित है। प्रत्येक बेड पर वेंटिलेटर की सुविधा उपलब्ध है। फिलहाल 10 बेड वाले विंग में गंभीर बच्चों को भर्ती किया जाता है, जबकि पांच बेड आरक्षित हैं। पीआईसीयू के लिए चार ऑपरेटर और एक टेक्निशियन तैनात हैं। कागजों में 15 वेंटिलेटर और एक सी-पैप मशीन उपलब्ध हैं। यहां सात बाल रोग विशेषज्ञ और एक एनेस्थेटिस्ट हैं, लेकिन पीडियाट्रिक सर्जन नहीं है। चिकित्सकों के अनुसार, गंभीर बच्चों को पहले सी-पैप के जरिये ऑक्सीजन दी जाती है। सुधार नहीं होने पर वेंटिलेटर का इस्तेमाल किया जाता है। पीआईसीयू के लिए 23 प्रशिक्षित स्टाफ नर्स की तैनाती की गई है, लेकिन इनमें से कई से सामान्य वार्ड में भी ड्यूटी ली जा रही है। गंभीर स्थिति वाले बच्चों को हायर सेंटर रेफर किया जाता है। हर महीने चार से छह बच्चों को रेफर किए जाने की बात सामने आई। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, 28 दिन से अधिक उम्र के बच्चों को पीआईसीयू में भर्ती किया जाता है। जीवन रक्षक उपकरण और चिकित्सकों की उपलब्धता का भी दावा किया गया है।
मेडिकल कॉलेज में 10 वेंटिलेटर खराब, मरम्मत का दावा
मेडिकल कॉलेज में बच्चों के उपचार के लिए एसएनसीयू, एनआईसीयू और पीआईसीयू संचालित हैं। तीनों में कुल 45 बेड आरक्षित हैं। एनआईसीयू में 10, एसएनसीयू में 15 और पीआईसीयू में 20 बेड की व्यवस्था है। एनआईसीयू और एसएनसीयू में तीन वेंटिलेटर तथा पीआईसीयू में दो वेंटिलेटर उपलब्ध हैं। इसके अलावा पीएम केयर फंड से पीआईसीयू के लिए 10 वेंटिलेटर मिले थे, जो अभी क्रियाशील नहीं हैं। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, इनकी मरम्मत कराई जा रही है और जल्द इन्हें चालू किया जाएगा। बाल रोग विभाग में एचओडी समेत पांच चिकित्सक तैनात हैं। पीडियाट्रिक सर्जन नहीं होने के कारण दिल में सुराख या अन्य जटिल मामलों में बच्चों को हायर सेंटर रेफर करना पड़ता है। बेड उपलब्ध नहीं होने पर भी बच्चों को बीआरडी मेडिकल कॉलेज भेजा जाता है। एनेस्थेटिस्ट और रात्रिकालीन सेवा उपलब्ध होने का दावा किया गया है। उप प्रधानाचार्य डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि पीएम केयर फंड से मिले 10 वेंटिलेटर की मरम्मत कराई जा रही है। जल्द ही उन्हें क्रियाशील कर दिया जाएगा।
केस-1
सांस में तकलीफ पर नवजात रेफर
सांऊघाट क्षेत्र के ब्योतहरा निवासी रोशनी के प्रसव के बाद नवजात को सांस लेने में परेशानी हुई। जांच के बाद बच्चे को एसएनसीयू में भर्ती कराया गया। हालत में सुधार नहीं होने पर चिकित्सकों ने रेफर कर दिया। परिजन बच्चे को मेडिकल कॉलेज ले जाने के बजाय निजी चिकित्सक के पास लेकर चले गए।
केस-2
600 ग्राम की बच्ची ने उपचार के दौरान दम तोड़ा
सदर क्षेत्र की एक गर्भवती का करीब साढ़े छह माह में प्रसव हुआ। नवजात बच्ची का वजन महज 600 ग्राम था। उसे जिला महिला अस्पताल की एसएनसीयू में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों ने जांच के बाद हायर सेंटर रेफर करने की सलाह दी। परिजनों ने अस्पताल में ही उपचार कराने की बात कहते हुए लिखित सहमति दी। बाद में बच्ची की धड़कन रुक गई।
आंकड़ों में स्थिति
जिला महिला अस्पताल
एसएनसीयू में भर्ती नवजात : 1776
रेफर किए गए : 69
गंभीर नवजात : 16
जिला अस्पताल, बस्ती
पीआईसीयू में भर्ती बच्चे : 1649
रेफर किए गए : 96
गंभीर हालत वाले बच्चे : 41
मेडिकल कॉलेज, बस्ती
तीनों विंग में भर्ती बच्चे : 2364
रेफर किए गए : 57
गंभीर बच्चे : 11
रात में ऑनकॉल बुलाए जाते हैं चिकित्सक
महिला अस्पताल की एसएनसीयू में भर्ती नवजात की रात में तबीयत बिगड़ने पर ऑनकॉल चिकित्सक को बुलाया जाता है। स्टाफ नर्स की ड्यूटी तीन शिफ्ट में रहती है। मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में चिकित्सकों की नाइट ड्यूटी लगती है। अस्पतालों में ऑक्सीजन और बिजली के लिए बैकअप की व्यवस्था होने का दावा किया गया है। एंबुलेंस भी उपलब्ध रहती हैं। रेफरल की स्थिति में जिला और महिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज बस्ती से संपर्क किया जाता है। मेडिकल कॉलेज से गंभीर बच्चों के लिए बीआरडी मेडिकल कॉलेज और केजीएमयू लखनऊ से संपर्क किया जाता है।
कोट
मेडिकल कॉलेज में एसएनसीयू, एनआईसीयू और पीआईसीयू के साथ महिला अस्पताल में एसएनसीयू संचालित है। कुछ चिकित्सकों की कमी है, जिसकी व्यवस्था के लिए डॉक्टरों को अटैच किया गया है। रेफर मरीजों को एंबुलेंस की सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास रहता है। कोशिश होती है कि बच्चे का उपचार यहीं हो, गंभीर स्थिति में हायर सेंटर रेफर किया जाता है।
-डॉ. राजीव निगम, सीएमओ, बस्ती