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Basti News: निजी अस्पतालों की भारी भरकम ईएमआई मरीजों पर पड़ रही भारी

Sun, 02 Mar 2025 12:38 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती Updated Sun, 02 Mar 2025 12:38 AM IST
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The hefty EMIs of private hospitals are weighing heavily on patients
बस्ती। लोन लेकर बनाए गए निजी अस्पतालों की भारी भरकम ईएमआई मरीजों पर भारी पड़ रही है। इसकी भरपाई के लिए मरीजों को अनावश्यक जांच और महंगी दवाओं का खर्च उठाना पड़ रहा है।
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शहर में कई ऐसे निजी अस्पताल हैं, जो करोड़ों रुपये लोन लेकर बनवाया गया है। उसकी हर माह किस्त डेढ़ से दो लाख रुपये आ रही है। एक निजी डाॅक्टर ने बताया कि वह किस्त भरने को लेकर परेशान हैं। कई बार रूटीन का खर्च निकालने के बाद माह की ईएमआई भरने में मुश्किल हो जाती है।
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पूछने पर बताया कि मरीज से भरपाई कर हर माह की किस्त का प्रबंध किया जाता है। मरीज के पहुंचने पर डाॅक्टर फीस, जांच, भर्ती करने का चार्ज और दवाओं आदि का खर्च बढ़ाकर लिया जाता है। अगर यह न किया जाए तो किसी भी माह का किस्त और अन्य खर्च वहन करना मुश्किल हो जाएगा।
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शहर में दो सौ से अधिक निजी अस्पताल बैंकों से लोन लेकर बनवाया गया है। नर्सिंग होम चलाने वाले एक संचालक ने बताया कि सामान्य हॉस्पिटल का भवन तैयार करने में करीब एक करोड़ रुपये लग जाते हैं। इसके अलावा अगर जांच के लिए मशीनें लगवाई जाएं तो खर्च डेढ़ से दो करोड़ रुपये पहुंच जाता है। अगर कोई डॉक्टर अस्पताल खोलता है तो लोन भी आसानी से मिल जाता है।
संचालक ने बताया कि अस्पताल खुलने के बाद बैंक की प्रति माह की किस्त देना मुश्किल हो जाता है। शुरुआत में मरीज कम आते हैं, इसलिए अस्पताल चलाने में दिक्कत आती है। बाकी खर्चे तो जैसे-तैसे निकल जाते हैं। लेकिन, सबसे बड़ी दिक्कत ईएमआई भरने में आती है। इसलिए कोशिश यह रहती है कि जो मरीज पहुंचें उनसे अधिकाधिक रुपये निकाले जाएं।
10 से 30 लाख रुपये तक का हर माह खर्च ः नाम न छापने की शर्त पर एक निजी अस्पताल के संचालक ने बताया कि अगर कोई डाॅक्टर खुद निजी अस्पताल खोलता है तो भी दूसरे डॉक्टरों को हायर करना पड़ता है। एनेस्थीसिया, पैथोलॉजी, रेडियोलॉजिस्ट आदि की जरूरत सभी अस्पतालों को पड़ती है। साथ ही पैरा मेडिकल स्टाफ, सफाई, मेडिसिन स्टोर आदि पर कर्मचारी रखने पड़ते हैं।
नंबर लगाने के लिए काउंटर पर भी कम से कम दो कर्मचारी होते हैं। वार्ड में भर्ती मरीज की देखभाल के लिए स्टाफ नर्स और दाई भी रखना अनिवार्य है। इन सबके खर्च को जोड़ दिया जाए हॉस्पिटल की क्षमता के हिसाब से 10 से 30 लाख रुपये तक का हर माह का खर्च फिक्स है।
बुखार और पेट में इनफेक्शन के नाम पर थमाए 19 हजार रुपये का बिल ःपुरानी बस्ती निवासी विश्वनाथ गुप्ता ने बताया कि उनके पिता को बुखार और पेट में इनफेक्शन की शिकायत थी। एक नामी अस्पताल में उन्हें लेकर गए तो तुरंत भर्ती कर लिया गया। 65 वर्ष के मरीज की एचआईवी से लेकर कैंसर तक की जांच कराई गई। बताया गया कि स्थिति गंभीर है।

पांच दिन इलाज के बाद जब उनकी तबीयत और ज्यादा बिगड़ने लगी तो रूम का किराया जोड़कर 19 हजार रुपये बिला जमा करके केजीएमयू लखनऊ ले गए। वहां जांच में पता चला कि गलत दवा के कारण पेट में घाव बनने लगे थे।
दवा की पर्ची डॉक्टर ने देखा तो कहा कि इन्हें सिर्फ मलेरिया और पेट का संक्रमण था। अन्य जांच की कोई जरूरत नहीं थी।
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