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Basti News: गैर ब्रांड में अच्छी कमाई... दो की दवा 20 रुपये में खरीदना मजबूरी

Mon, 09 Sep 2024 10:51 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती Updated Mon, 09 Sep 2024 10:51 PM IST
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Good earning in non-brand... compulsion to buy two medicines for Rs 20
सरकारी अस्पताल में भी लिखी जा रही बाहर की दवाएं
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निजी अस्पतालों में सेटिंग की दवाएं लिखने की होड़
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। साहब! यह गैर ब्रांड की दवा है। सेटिंग पर बिकती है। इसलिए हर जगह नहीं मिलेगी। इसी फार्मूले की ब्रांडेड कंपनियों की दवा देने पर आप लेंगे भी नहीं। क्योंकि पर्चे पर डॉक्टर ने नहीं लिखा है। जिला अस्पताल के गेट नंबर दो के पास एक दवा दुकानदार इसी तरह की सफाई अपने ग्राहक से पेश करते नजर आ रहे हैं। ग्राहक अस्पताल के अंदर एक हड्डी रोग विशेषज्ञ को दिखाकर लौटे हैं। सरकारी पर्चे पर अस्पताल की कुछ दवाएं मिलीं। साथ में छोटी पर्ची दी गई, जिस पर कुछ बाहर की दवाएं लिखी गई थीं। इसी सिलसिले में दुकानदार ग्राहक को समझा रहे हैं।
ऐसा वाकया एक नहीं कई है। अस्पताल आने वाले मरीज को बाहर से दवा लिखी जा रही है। इसमें सेटिंग की दवाएं ज्यादा रहती हैं। मुंडेरवा से आए रामप्रकाश ने बताया कि उनकी पत्नी खांसी-बुखार से पीड़ित थी। अस्पताल से कुछ ही दवाएं मिली हैं। बाकी दवा बाहर से लिखी गई है। यह दवा भी केवल दो नंबर गेट के बाहर स्थित दुकानों पर ही मिल पा रहा है। गेट नंबर एक के बाहर दवा लेने गए तो कहीं नहीं मिली। दो नंबर के बाहर आए तो तुरंत मिल गई। वजह पूछने पर दुकानदार ने बताया कि सेटिंग की दवा है, यह हर जगह नहीं मिलेगी। ब्रांड की होती तो मिल जाती।
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इस तरह के खेल सरकारी अस्पतालों से लेकर निजी अस्पतालों तक खुलेआम चल रहे हैं। दवा माफिया का संजाल चौतरफा फैला हुआ है। यही वजह है कि मरीजों के पर्चे पर ब्रांड की दवाएं कम लिखी जहा रही हैं। कुछ पेटेंट दवाओं को छोड़ दें तो ज्यादातर सेटिंग की दवाएं लिखी जा रही हैं। इनके रैपर चमकीले और साफ्ट होते हैं। मूल्य भी ब्रांडेड से ज्यादा होता है। जबकि लागत मामूली होती है। इन दवाओं में मुनाफा बांडेड दवाओं की अपेक्षा कई गुना है।
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मुनाफाखोरी के चक्कर में दवा माफिया डॉक्टरों से सेटिंग कर यह दवा लिखवा रहे हैं। इसमें एंटीबॉयोटिक, मल्टी बिटामिन, दर्द नाशक, पैरासीटामॉल, प्रोटीन-कार्बोहाईड्रेट युक्त पाउडर, लैक्टोलूज सिरप, खासी सिरप आदि दवाएं शामिल हैं। दवा माफिया अपनी खुद के फर्म पर गुजरात, हिमाचल, देहरादून की कंपनियों से इस तरह की दवाओं का निर्माण करवाकर थोक में मंगा रहे हैं। कुछ तो ऐसे निजी अस्पताल हैं, जहां केवल एक से दो दवा माफिया की गहरी पैठ हैं। यहां ब्रांडेड के साथ सेटिंग की कंपनियों की दवाएं मरीजों के पर्चे पर खूब लिखी जा रही है।
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एक अस्पताल की दवा दूसरे जगह उपलब्ध नहीं
चिकित्सक के पर्चे पर ब्रांडेड दवाओं की संख्या कम होने से हर जगह यह उपलब्ध नहीं रहती है। ऐसे में मरीज को उसी अस्पताल में दवा लेने पहुंचना पड़ता है, जहां पहले चिकित्सक को दिखाया था। निजी नर्सिंग होम में लोकल कंपनियों की दवाओं को लिखने का खेल ज्यादा है। यहां एक-दो की संख्या में ही ब्रांडेड दवाएं लिखी जाती हैं। इसके अलावा अधिकतर दवाएं लोकल कंपनियों की रहती हैं।
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50 प्रतिशत मुनाफा, शेष में लागत और कमीशन
लोकल कंपनियों की सेटिंग वाली दवाओं में कारोबारियों को 50 प्रतिशत का मुनाफा है। जानकार बताते हैं कि दो रुपये लागत वाली दवा बाजार में 20 रुपये में बिक रही है। प्रिंट मूल्य इससे भी अधिक रहता है। इसमें 50 प्रतिशत दवा माफिया की जेब में मुनाफा के रूप में पहुंचता है। बाकी में डॉक्टर का कमीशन और 20 प्रतिशत दवा दुकानदार का फायदा शामिल रहता है। इतना ही नहीं, निजी अस्पतालों में साधारण बीमारी में भी हजार रुपये से अधिक की दवाएं लिखी जा रही हैं। पिकौरा शिवगुलाम के देवेंद्र कुमार ने बताया कि वह जुकाम, बुखार से पीड़ित थे। एक नर्सिंग होम में दिखाने पहुंचे तो उनके पर्चे पर 1200 रुपये की दवा लिखी गई। इसमें अधिकतर दवाएं लोकल कंपनियों की थी।
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डॉक्टर के चेंबर में रहते हैं दवा माफियाओं के एजेंट
जिला अस्पताल से लेकर प्रमुख सीएचसी तक दवा माफिया के एजेंट डॉक्टर के चेंबर में अक्सर बैठे रहते हैं, ताकि मरीज के पर्चे पर उनकी दवाएं लगातार लिखी जाएं। जिला अस्पताल की ओपीडी में चिकित्सक कक्ष के अंदर दवा एजेंट अक्सर मौजूद रहते हैं। मरीज को जैसे ही बाहर का पर्चा मिलता है यह एजेंट उन्हें उस दुकान का पता बताते हैं जहां सेटिंग की दवाएं उपलब्ध हैं।

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कोट
सरकारी अस्पताल में बाहर की दवा लिखने की अनुमति नहीं है। शासन स्तर से हर तरह की दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित हो रही है। यदि कोई सरकारी चिकित्सक बाहर की दवा लिखते पाया गया तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।
-डॉ. आरएस दुबे, सीएमओ
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